भारतीय इतिहास के महान दानवीर कर्ण, राजा बलि, राजा शिवि, राजा मोरध्वज, महर्षि दधीचि

हमारे देश, धर्म और संस्कृति में दान का बहुत बड़ा  महत्व है। कहा जाता है आपके पास जो भी है उसमे से कुछ हिस्सा उन जरूरतमंदों को दान करते हैं तो ये सबसे बड़ा पुण्य का काम है। वो चीज चाहे आपकी विद्या हो, धन हो, शारीरिक श्रम हो या कुछ और। 

दान धन का ही हो, यह जरुरी नहीं, भूखे को रोटी, बीमार का उपचार, किसी व्यथित व्यक्ति को अपना समय, उचित परामर्श, आवश्यकतानुसार वस्त्र, सहयोग, विद्या जिसको जिस चीज की आवश्यकता हो और वो हमारे पास हो। जब हम  कुछ पाने  की अपेक्षा नहीं करते, यही सच्चा दान है।

रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि परहित के समान कोई धर्म नहीं है और दूसरों को कष्ट देने के समान कोई पाप नहीं है। इसी तरह संस्कृत में एक  श्लोक है “परोपकाराय पुण्याय, पापाय परपीड़नाम”।

दानो में विद्या दान सबसे बड़ा दान है क्योंकि ये आपके अंदर की ऐसी संपत्ति है देने से घटती नहीं है बल्कि बढ़ती जाती है। 

आजकल अंग दान का महत्व भी बहुत गया है। अंग दान और रक्त दान से आप किसी को  जीवन दान देते हैं। जो दान किसी जीव के प्राणों की रक्षा करे उससे उत्तम और क्या हो सकता है? हमारे शास्त्रों में ॠषि दधीची का वर्णन है जिन्होंने अपनी हड्डियाँ तक दान में दे दी थीं, कर्ण का वर्णन है जिसने अपने अन्तिम समय में भी अपना स्वर्ण दंत याचक को दान दे दिया था। देना तो हमें प्रकृति रोज सिखाती है, सूर्य अपनी रोशनी, फूल अपनी खुशबू, पेड़ अपने फल, नदियाँ अपना जल, धरती अपना सीना छलनी कर के भी दोनों हाथों से हम पर अपनी फसल लुटाती है। इसके बावजूद न तो सूर्य की रोशनी कम हुई, न फूलों की खुशबू, न पेड़ों के फल कम हुए न नदियों का जल, अत: दान एक हाथ से देने पर अनेकों हाथों से लौटकर हमारे ही पास वापस आता है बस शर्त यह है कि निस्वार्थ भाव से श्रद्धा पूर्वक समाज की भलाई के लिए किया जाए।

हमारे इतिहास और संस्कृति में हजारों लाखों महान पुरुष मिलेंगे जिन्होंने दानवीरता में बड़े कीर्तिमान स्थापित किये हैं। इनमे से कुछ प्रमुख नाम हैं राजा बलि, राजा शिवि, दानवीर कर्ण, महर्षि दधीचि और राजा मोरध्वज। 

  1. #राजा बलि की दानवीरता 

जब राजा बलि (भक्त प्रह्लाद के पोते)  शक्तियाँ  बहुत अधिक बढ़ गयी और देवों को युद्ध में पराजित होना पड़ा तो देवराज इंद्रा को चिंता हुई। (आपको पता होना चाहिए की देवराज इंद्रा का पद स्थायी नहीं है। कोई भी अपने सद्कर्मों से देवराज का पद प्राप्त कर सकता है ) देवराज भगवान विष्णु की शरण में गए। भगवन विष्णु वामन अवतार लेकर राजा बलि के दरबार में गए  और बलि से दान में तीन पग जमीन माँगा। राजा बलि बहुत बड़े दानवीर थे और फिर सोचे कि एक वामन तीन पग में कितनी जमीन ले सकता है ? बोले महाराज ये क्या मांग दिया आपने? कुछ बड़ी चीज मांगो। धन दौलत, सोना चाँदी, आभूषण, वस्त्र इत्यादि, पर भगवान ने बस तीन पग जमीन ही माँगा। बलि की स्वीकारोक्ति के बाद भगवान विष्णु अपने असली रूप में आ गए और एक पग में आसमान और दूसरे पग में पृथ्वी को माप दिया।  जब तीसरे पग की बारी आयी तो कुछ बचा ही नहीं था। पर राजा बलि इतने बड़े दानवीर थे की उन्होंने तीसरा पग अपने सर पर  लिया जिससे की उन्हें पृथ्वी छोड़कर पाताल लोक में जाना पड़ गया। अब भगवान विष्णु इतने बड़े दानवीर और भक्त को अकेला कैसे छोड़ सकते थे? उन्होनें उनकी रक्षा करने  निश्चय किया जब तक की राजा बलि को इंद्रा की गद्दी न मिल जाये। भगवान विष्णु उनके द्वारपाल बनकर रहने लगे। इस बात से वैकुण्ठ लोक में बैठे देवी लक्ष्मी चिंतित हो गयी। उन्होनें अपने पति को पाने के लिए एक ब्राह्मण स्त्री रूप  धरा और राजा बलि के पास पहुँच गयी और कहा की उनके पति एक लम्बी यात्रा पर गए हैं  और रहने के लिए एक स्थान की माँग की। राजा बलि नें उन्हें सच्चे मन से अपने घर में रखा तथा अपने बहन की तरह सुरक्षा प्रदान की। देवी लक्ष्मी के आने के बाद राजा बलि के घर में रौनक आ गई तथा घर धन दौलत और खुशियों से भर गया। फिर एक दिन सावन की पुर्णिमा के दिन राजा बलि को एक रक्षा सुत्र बांधा तथा अपनी खुशी और रक्षा का वचन लिया। इस बात से प्रसन्न होकर राजा बलि नें कोई भी मांग पुरी करने का वचन दिया। देवी लक्ष्मी नें द्वारपाल के रूप में खड़े भगवान विष्णु को मांगा। राजा बलि को बहुत आश्चर्य हुआ तभी देवी लक्ष्मी और भगवान विष्णु अपने असली रूप में आए। राजा बलि अपने दानवीर होने के लिए जाने जाते हैं इसलिए उन्होंने भगवान विष्णु को देवी लक्ष्मी को सौंप दिया। तभी से  इस दिन को रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाता है।

2. #कर्ण की दानवीरता 

दानवीर कर्ण के दानवीरता की ख्याति युगों युगों तक फैली हुई है। कर्ण के दान की कई कहानियाँ हैं जो उसे विश्व के महानतम दानवीरों में से एक बनाती हैं। पर उनमे से तीन कहानियों की बात करते हैं। पहली कहानी कर्ण द्वारा अपने कवच कुण्डल का दान और दूसरी सोने के दातों का दान और तीसरे अपने महल के  खिड़कियों और दरवाजों को तोड़कर उनमे से चन्दन की लकड़ियों का दान। 

कवच कुण्डल का दान 

सभी जानते हैं कि कर्ण सूर्य पुत्र था जिसे सूर्य ने एक ऐसा कवच कुण्डल दिया था जिसपर किसी भी अस्त्र शस्त्र का असर नहीं हो सकता था। महाभारत युद्ध में कर्ण कौरवों की तरफ से युद्ध लड़ रहा था जिसे हराना अर्जुन के लिए असंभव सिद्ध हो रहा था। कहा जाता है अर्जुन इंद्र पुत्र थे। इंद्रा को अर्जुन की चिंता हुई। फिर इन्द्र ने छल करके कर्ण के दानवीरता का फायदा उठाना चाहा। एक दिन जब कर्ण संध्या वंदन कर रहा था तभी इंद्र एक ब्राह्मण का वेश धरकर उसके पास गए। ब्राह्मण को देखकर कर्ण ने उनके आने का कारन पूछा। इंद्र ने उस से दान मांगने की।  कर्ण ने कहा की हे विप्र देव माँगो जो माँगना है। इंद्र भी बहुत शातिर और चालक थे। कहा की हे कर्ण मैं ऐसे कुछ नहीं मांग सकता। पहले तुम्हे वचन देना होगा की जो भी मैं मांगूंगा वो तुम मुझे दोगे। कर्ण ने हाथ में जल लेकर वचन दिया की हे विप्रवर मैं वचन देता हूँ की आप जो मांगेंगे वो मैं दूंगा।

तब इंद्रा ने कर्ण से उसके कवच कुण्डल मांग लिए। कर्ण को थोड़ा धक्का लगा पर उसने बिना देर किये वो कवच और कुण्डल दे दिए। 

जब इंद्र जाने लगे तब उनके रथ का पहिया धंस गया और आकाशवाणी हुई “देवराज इन्द्र, तुमने बड़ा पाप किया है। अपने पुत्र अर्जुन की जान बचाने के लिए तूने छलपूर्वक कर्ण की जान खतरे में डाल दी है। अब यह रथ यहीं धंसा रहेगा और तू भी यहीं धंस जाएगा। ” तब देवराज नें कर्ण को अमोघ अस्त्र दिए। 

कर्ण द्वारा सोने के दातों का दान 

जब कर्ण युद्ध भूमि में पड़ा अंतिम साँस ले रहा था तब भगवान श्री कृष्ण ने उसके दानवीरता की परीक्षा लेनी चाही। वो एक ब्राह्मण का वेश बनाकर कर्ण के पास पहुंच गए।  कहा की तुम्हारे बारे में बहुत सुना है। मुझे कुछ स्वर्ण की आवश्यकता है। क्या वो तुम दे सकते हो? कर्ण ने कहा की मेरे पास अभी सोना नही है पर मेरे दांत सोने के बने हैं। आप चाहें तो उन्हें ले सकते हैं। 

भगवान ने कहा मैं तुम्हारे दांत नहीं।  कर्ण ने स्वयं अपने दांत तोड़ दिए। भगवान ने उसे भी लेने से इंकार कर दिया। वो खून से सने दांत नहीं लेना चाहते थे। 

कर्ण ने अपने बाणों से वर्षा करके दांत धो कर दिए। 

कर्ण और चन्दन की लकड़ी

एक बार भीम और अर्जुन भगवान श्री कृष्ण से युधिष्ठिर के दानवीरता का बखान कर रहे थे। भगवान श्री कृष्ण मंद मंद मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने कहा की भाई  हमने तो कर्ण से बड़ा दानी नहीं देखा। पांडवों को ये बात पसंद नहीं आयी। 

भगवान ने कहा समय आने पर ये बात सिद्ध हो जाएगी। 

कुछ दिनों बाद युधिष्ठिर के पास एक याचक आया। उसे यज्ञ करने के लिए चन्दन की सुखी लकड़ी की आवश्यकता थी। उस समय मूसलाधार बारिश हो रही थी। सुखी लकड़ी नहीं मिल रही थी। युधिष्ठिर ने कोष से लकड़ी देने का आदेश दिया पर संयोग से कोष में सुखी लकड़ी नहीं थी। युधिष्ठिर ने बहुत प्रयास किया। पर सुखी लकड़ी की व्यवस्था नहीं हो पायी।

अंतत: याचक ने कहा की महाराज मेरा यज्ञ तो पूरा नहीं हो पायेगा और मैं भी भूखा प्यासा मर जाऊँगा क्योंकि यज्ञ पूरा किये बिना मैं कुछ खाता पीता नहीं हु।

तब भगवान श्री कृष्ण याचक को कर्ण के पास गए। याचक ने कर्ण से भी चन्दन की सुखी लकड़ी माँगी। कर्ण ने भी बहुत प्रयास किया पर चन्दन की सुखी लकड़ी नहीं मिली। फिर कर्ण ने अपने महल की खिड़कियों और दरवाजों को तोड़कर चन्दन की लकड़ियों का ढेर लगा दिया। 

भगवान श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि धर्मराज आपके महल में भी दरवाजे और खिड़कियां भी चन्दन के लकड़ी की हीं बनी हैं। अपने क्यों नहीं उन लकड़ियों को दिया? साधारण अवस्था में दान देना कोई विशेषता नहीं है, असाधारण परिस्थिति में किसी के लिए अपने सर्वस्व को त्याग देने का ही नाम दान है। 

3. #महाराजा शिवि और कबूतर की कहानी 

महाराज शिवि की दानवीरता और न्यायप्रियता की कहानी संसार भर में प्रसिद्द थी। देव, दानव, मानव सभी उनकी न्यायप्रियता का लोहा मानते थे। जब देवराज इंद्रा ने उनके न्यायप्रियता की कहानी सुनी तो उन्हें शंका हुई। और उन्होंने उनकी परीक्षा लेनी चाही। देवराज इंद्र और अग्नि देव ने मिलकर एक योजना बनाई। देवराज इंद्र ने बाज का और अग्नि देव ने कबूतर का रूप बनाया और परीक्षा लेने चले। 

एक दिन महाराज शिवि अपने महल के बगीचे में बैठे हुए थे। तभी उनकी गोद में एक घायल कबूतर गिरा। कबूतर का पीछा करते एक बाज भी आया। बाज ने शिवि से कहा की महाराज कबूतर मेरा भोजन है। इसे मुझे सौंप दीजिये। महाराज शिवि ने कहा कि ये कबूतर मेरी शरण में आया है और मैं अपने शरण में आये किसी भी जीव के प्राणों की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध हूँ। तब बाज ने कहा की महाराज ये मेरा आहार है और किसी के आहार को छीनना धर्म नहीं है। इसपर शिवि ने बाज को उसके आहार  व्यवस्था करने की बात कही तो बाज ने कहा की महाराज आप इस कबूतर के बराबर का मांस हमें दे दीजिये। हमें  और कुछ नहीं चाहिए। 

महाराज शिवि ने निश्चय किया की कबूतर की जगह वो अपना मांस उस बाज को खिलाएंगे। क्योंकि शिवि अपने राज्य के किसी और प्राणी को मरने नहीं दे सकते थे। 

वहां एक तराजू मंगाया गया। उस तराजू पर एक तरफ कबूतर को बैठाया गया और दूसरी तरफ महाराज शिवि अपने शरीर से मांस काटकर  रखते थे। पर हर बार कबूतर का पलड़ा भारी रहता था। अंत में तराजू के दूसरे पलड़े पर महाराज शिवि स्वयं बैठ गए। तब दूसरा पलड़ा भारी हो गया। 

अब देवराज इंद्र और अग्नि देव की शंका दूर हुई और वो अपने असली रूप में आये। दोनों महाराज शिवि की दानवीरता और न्यायप्रियता से प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद दिया और चले गए। 

4. #राजा मोरध्वज की कहानी 

एक बार अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण से कहा की हे भगवान आपका मुझसे बड़ा भक्त हमसे बड़ा दानी कौन है? भगवान ने कहा चलो देखते हैं। 

भगवान श्री कृष्ण और यमराज एक ब्राह्मण और सिंह  बनाकर  राजा मोरध्वज के दरबार में पहुँच गए। वहाँ जाकर भगवान ने मोरध्वज से कहा, “हे राजन, हमने आपके दानवीरता की कहानिया बहुत सुनी है। ” सुना है आपके दरबार से कोई खाली हाथ नहीं लौटा है। 

राजा ने कहा की हे ब्राह्मण देव ये नारायण की कृपा है की हमारे दरबार से कोई खाली हाथ  नहीं लौटा। मैं आपकी सेवा  करके स्वयं को धन्य महसूस करूँगा। कहिये क्या सेवा कर सकता हूँ। 

ब्राह्मण वेश में भगवान ने कहा की हे राजन हमें बस हमारे भोजन की व्यवस्था कर दीजिये। हम ब्राह्मण तो सात्विक भोजन कर लेंगे परन्तु हमारे साथ सिंह राज भी हैं तो उनके लिए आपको मांसाहार की व्यवस्था करनी होगी। 

राजा सोच में पड़ गए। एक धार्मिक राजा, नारायण का बड़ा भक्त जो मांसाहार के बारे में सोचता भी नहीं हो, वो कैसे मांसाहार की व्यवस्था कर सकता था।

बहुत सोचने के बाद राजा ने स्वयं को सिंह राज के सामने पेश करने का प्रस्ताव रखा। परन्तु भगवान नें कहा की हे राजन आपके मांस खाकर सिंह राज तृप्त नहीं होंगे। इन्हे किसी बूढ़े इंसान या जानवर का मांस नहीं चाहिए। आप अपने बेटे ताम्रध्वज का मांस इनके सामने रख सकते हैं।  परन्तु पुत्र को भोजन बनते  देख कर माता पिता की आंखों में आंसू नहीं आना चाहिए। 

इतना सुनकर पूरा दरबार आश्चर्यचकित हो गया। राजा को भी धक्का लगा। परन्तु राजा ने अपनी कीर्ति और कर्तव्य को ध्यान में रख कर राज दरबार में ही अपने बेटे को चीरकर सिंह राज के सामने रख दिया।

सिंहराज ने आगे बढ़कर ताम्रध्वज का दाया भाग खा लिया। तभी ताम्रध्वज की माता की बायीं आंख से आंसू टपक पड़े।

भगवान ने पूछा रानी की आँखों में आंसू क्यों? रानी ने कहा “सिंह राज ने मेरे पुत्र के दांये भाग को खा लिया पर बाएं भाग को नहीं खाया इसीलिए बायीं आँख से आँसूं निकल गए। 

तभी भगवान नें राजा मोरध्वज को अपने असली रूप का दर्शन कराया और कहा की आपके इस दानवीरता का फल मिल चूका है। 

राजा मोरध्वज ने देखा तो उनका बेटा जीवित खड़ा था। 

5. #महर्षि दधीचि की हड्डियों का वज्र 

एक बार इन्द्र लोक पर व्रतासुर नामक एक राक्षस ने कब्ज़ा कर लिया। उसने सभी देवताओं को देवलोक से बहार निकाल  दिया। इंद्र समेत सभी देव ब्रह्मा जी के पास गए। ब्रह्मा जी ने उन्हें एक उपाय बताया। कहा की व्रतासुर का वध केवल  वज्र से हो सकता है जो वज्र महर्षि दधीचि के अस्थियों से बना हो। 

इन्द्र ने एक बार महर्षि दधीचि का अपमान किया था। इस कारण उन्हें दधीचि के पास जाने में संकोच हो रहा था। 

इन्द्र महर्षि दधीचि से ब्रह्म ज्ञान लेना चाहते थे।  पर महर्षि दधीचि को इंद्र इस ज्ञान के लिए सुयोग्य नहीं लगे इसलिए महर्षि ने इंद्र को ब्रह्म ज्ञान देने से इंकार कर दिया। इंद्र को क्रोध आया और किसी को भी ये ज्ञान देने पर सर धड़ दे अलग करने की धमकी दी। पर महर्षि दधीचि ने कहा की कोई भी अगर सुयोग्य मिले तो मैं ये ज्ञान अवश्य दूंगा। 

बाद में अश्विनीकुमार महर्षि दधीचि के पास ब्रह्म विद्या लेने आये। दधीचि नें उन्हें ब्रह्म विद्या पाने के योग्य पाकर  विद्या दी। उन्होंने अश्विनीकुमारों को इन्द्र द्वारा कही गई बातें बताईं। तब अश्विनीकुमारों ने महर्षि दधीचि के अश्व का सिर लगाकर ब्रह्म विद्या प्राप्त कर ली। इन्द्र को जब यह जानकारी मिली तो वह पृथ्वी लोक में आये और अपनी घोषणा के अनुसार महर्षि दधीचि का सिर धड़ से अलग कर दिया। अश्विनीकुमारों ने महर्षि के असली सिर को फिर से लगा दिया। इन्द्र ने अश्विनीकुमारों को इन्द्रलोक से निकाल दिया। 

इसी कारण इन्द्र को महर्षि दधीचि के पास जाने में संकोच हो रहा था। परन्तु अंत में देवलोक की रक्षा के लिए अपने संकोच को त्याग कर इंद्र  दधीचि के पास पहुंच गए। 

महर्षि दधीचि को जब सारी बातें पता चली तो वो ख़ुशी ख़ुशी राजी हो गए।

उनकी हड्डियों वज्र जिस से व्रतासुर का वध हुआ। 

अगर आप भी इसमें अपना अनुभव और ज्ञान जोड़ना चाहते हैं या कुछ और भी लिखने का शौक रखते हैं तो Mail Us at ” [email protected] “साथ में अपना परिचय एक फोटो के साथ भी भेजें। आपकी रचना आपके नाम और फोटो के साथ प्रकाशित की जाएगी।

राजा दाहिर की कहानी – एक हीरो जिसे भुला दिया गया

राजा दाहिर, सिंध का एक ऐसा हिन्दू राजा जिसने 33 वर्षों तक युध्द लड़ते और उन्हें करारी शिकश्त देते हुए सिंध और पुरे हिंदुस्तान को मुस्लिम आक्रांताओं से बचाये रखा। अंत में कुछ बौद्ध गवर्नरों और कबीलों की गद्दारी की वजह से युद्ध मैदान में वीर गति को प्राप्त हुआ। उसके मरने के बाद ही सिंध पर अरब का कब्ज़ा हो सका और सिंध की विजय ने अरबों  के लिए हिंदुस्तान के दरवाजे खोल दिए। आगे का इतिहास हम सब को पता है किस तरह से हमारा देश अरबों और तुर्कों से लड़ता रहा। वीर पैदा होते रहे, साथ ही साथ गद्दार  भी पैदा होते रहे, वर्ना हम गुलाम  कैसे होते?

आज की पीढ़ी को  क्या पता है राजा दाहिर कौन हैं? क्या हमें हमारे इतिहास की पुस्तकों में राजा दाहिर के बारे में पढ़ाया जाता है? राजा दाहिर को हमने बिलकुल भुला दिया। उनकी जगह हम उनके बारे में पढ़ते हैं जिन्होंने हमारे देश को लुटा,  पढ़ते हैं बल्कि हमारे सिलेबस में  उनका महिमामंडन होता है। पता नहीं हमारी सरकारों की क्या  मज़बूरी है?  उनकी चाहे जो मज़बूरी हो, पर हमारा कर्तव्य बनता है की हम उनके बारे में पढ़ें और लोगों को पढ़ाएं। राजा दाहिर के बारे में  पूरी जानकारी के लिए पढ़ें। 

आज मैं उसी राजा दाहिर की कहानी (Raja Dahir ki kahani) सुनाने वाला हु। क्या  आपको पता है राजा दाहिर सेन कौन थे (Raja Dahir Sen Kaun The)? वो हैं राजा दाहिर (Raja Dahir a National Hero) जिनके बारे में हमें अपने इतिहास में कुछ भी नहीं पढ़ाया जाता है। एक ऐसा राजा जिसने तीन बार युद्ध में अरब को हराकर हिंदुस्तान को मुस्लिम आक्रांताओं  से बचाये रखा। पर जब कुछ लोगों की गद्दारी की वजह से उन्हें  हार का  सामना करना पड़ा और  वीर गति को प्राप्त हुए तब भी हमने उसको हीरो बना दिया जिसने उन्हें न सिर्फ धोखे से हराया बल्कि सिंध पर इतने अत्याचार किये की मानवता शर्मसार हो जाये।

अनुक्रम

  • राजा दाहिर की कहानी (Raja Dahir ki Kahani)
  • राजा दाहिर की बेटियाँ (Raja Dahir Daughter)
  • राजा दाहिर और इमाम हुसैन (Raja Dahir and Imam Hussain)

राजा दाहिर की कहानी (Raja Dahir ki Kahani)

भारत वर्ष में इस्लामी शाशन का प्रवेश 712 ईस्वी में राजा दाहिर की पराजय और राजा दाहिर की मृत्यु  के बाद सिंध के रस्ते हुआ। लगभग 33 वर्ष लड़ाइयां लड़ते लड़ते , बार बार अरबों को युद्ध में हराते हुए अन्तत: कुछ स्थानीय कबीलों और बौद्ध गवर्नरों की गद्दारी से युद्ध में राजा दाहिर वीर गति को प्राप्त हुए।

युद्ध क्षेत्र में जाते हुए राजा दाहिर ने कहा था “

“मै खुली लड़ाई में अरबों से लड़ने जा रहा हूँ और अपने पुरे सामर्थ्य के साथ लडूंगा। अगर मैं उन्हें कुचल देता हूँ तो मेरे साम्राज्य की नीव और मजबूत हो जाएगी लेकिन अगर मुझे सम्मान के साथ वीर गति प्राप्त हुई तो यह  अरब की किताबों में लिखा जायेगा। इसके बारे में महान से महान लोग बात करेंगे। दुनिया के अन्य राजा  इसके बारे में बात करेंगे।और कहा जायेगा कि सिंध के राजा दाहिर ने अपने देश के दुश्मन से लड़ते हुए अपनी अनमोल जिंदगी का बलिदान कर दिया। ” 

अफ़सोस की आज राजा दाहिर की महानता को याद नहीं किया जाता।
राजा दाहिर सिंध प्रान्त के आखिरी हिन्दू राजा थे जिनका जन्म 663 ईस्वी में सिंध  के अलोर में हुआ था। ये जगह आज रोहरी के नाम से जाना जाता है। इनके पिता का नाम चच तथा माता का नाम रानी सुहानदी था। चच की  मृत्यु के बाद 679 ईस्वी में महाराज दाहिर सेन सिंध के राजा बने। राजा दाहिर को शाशन सँभालने के साथ ही कई विरोधों का सामना करना पड़ा। उनके पिता द्वारा किये गए शासन से सिंधु देश के गुर्जर, जाट, लोहना और ब्राह्मण समाज नाराज था। इसके प्रमुख कारणों में  एक उनके पिता द्वारा बौद्ध धर्म को राज धर्म का दर्जा दिया जाना था। राजा दाहिर ने सबको साथ लेकर चलने का निश्चय किया और सिंध देश का राज धर्म सनातन हिन्दू वैदिक धर्म कर दिया।
दोस्तों क्या इस महान राजा के साथ ऐसा हुआ? नहीं। हमने राजा दाहिर के महान इतिहास (Raja Dahir Sen Great History) को भुला दिया। 

 राजा दाहिर के राज में सिंध देश बहुत संपन्न देश था। उसका व्यापर समुद्री रास्तों द्वारा पुरे  विश्व से था। सिंध का देवल बंदरगाह व्यापर का मुख्या केंद्र था। इराक ईरान से व्यापर इसी बंदरगाह से होता था। सिंध की सम्पन्नता और सिंध का भारत में प्रवेश करने का द्वार होना अरब देश को आकर्षित करता था। अरब अपने साम्राज्य का विस्तार कर रहे थे। उनलोगो ने ईरान, इराक, सीरिया, उत्तर अफ्रीका, स्पेन जैसे देशों को जीत लिया था। साथ ही साथ वो इस्लाम का प्रसार भी कर रहे थे। उनकी नजर भारत पर थी जिसके लिए लिए सिंध को जितना बहुत जरुरी था क्युकी सिंध ही भारत का प्रवेश द्वार था। सिंध पर कब्ज़ा किये बिना भारत जितने का और इतने बड़े देश में इस्लाम का प्रसार संभव नहीं था।

अरब का सिंध पर आक्रमण

तभी देवल बंदरगाह पर समुद्री लुटेरों ने अरब  के एक जहाज को लूट लिया। खलीफा उमर के अरब गवर्नर बसरा अल हज्जाज इब्न युसूफ (Basra Al Hajjaj Ibn Yusuf) ने मुआवजा माँगा जिसे राजा दाहिर ने ये कहकर इंकार कर दिया की समुद्री लुटेरों पर उनका नियंत्रण नहीं है। अरब खलीफा गुस्से से पागल हो गया। सिंध पर आक्रमण का सिलसिला चालू हो गया। पर राजा दाहिर के कुशल नेतृत्व और असाधारण युद्ध कौशल से हर बार अरब खलीफा की फ़ौज को हार का सामना करना पड़ा। 711 ईस्वी तक अरब फौजें राजा दाहिर को हरा नहीं पायी।

मोहम्मद बिन कासिम का सिंध पर आक्रमण 

712 ईस्वी में अरब शासक ने ये जिम्मेदारी मोहम्मद बिन कासिम (Mohammad Bin Qasim) को सौंपी। मोहम्मद  बिन कासिम ने सबसे पहले देवल बंदरगाह पर कब्ज़ा किया और लोगो का कत्लेआम करना शुरू किया। बच्चे, बूढ़े, जवान, औरतें किसी को नहीं बख्सा गया। पर राजा दाहिर सेन के रहते मोहम्मद बिन कासिम के लिए सिंधु नदी को पर करना असंभव था। इसलिए उसने हैदरपुर के बौद्ध राज्यपपाल मोक्षवास, देवल के राजा ज्ञान बुद्ध तथा जाट, गुर्जर और लोहना कबीलों को अपनी तरफ मिलाया। इसके बाद अरब सेना ने इरनकोट और राव नगर पर हमला करके जीत लिया। अंत में उसका मुकाबला राजा दाहिर  सेन से हुआ। कई दिनों तक लम्बे युद्ध चलने के बाद अरब सेना पराजय के कगार पर थी। 

युद्ध में पराजय निश्चित देखकर अरब सैनिकों ने सो रहे सिंध के सैनिकों पर धोखे से  हमला कर दिया। युद्ध कई दिनों तक चला। इस बार  भी अरब सेना को परास्त होना पड़ा।

राजा दाहिर की युद्ध भूमि में वीर गति  

बार बार पराजय से तंग आकर मोहम्मद बिन कासिम ने एक धोखे की साजिश रची। अपने कुछ सैनिकों को हिन्दू औरतों के वेश में राजा दाहिर में भेजा। वो औरतें (सैनिक) रोती बिलखती राजा दाहिर से मुस्लिम सैनिकों  उन्हें बचाने की गुहार लगाई। राजा दाहिर ने इन महिलाओं को सुरक्षित स्थान पर भेजने के बाद उस स्थान की ओर बढ़ गए जहा से उनकी रोने की आवाज आ रही थी। युध्द भूमि में वो अकेले पद गए जहाँ उनके हाथी पर बाण चलाये गए। जिस से वो खाई में गिर गया। राजा दाहिर अकेले बहुत वीरता से लड़े पर अंत में वीर गति को प्राप्त हुए। वो अपने मातृभूमि की रक्षा करते सदा के लिए मातृभूमि की गोद में सो गए। इधर औरतों के वेश महल में घुसे सैनिक अपने असली रूप में आ गए और कत्लेआम मचाना  शुरू किया। 

मोहम्मद बिन कासिम ने अंत में राजा दाहिर के सर काटकर खलीफा को भेट किया।  

राजा दाहिर की बेटियाँ (Raja Dahir Daughters)

राजा दाहिर की मृत्यु के बाद मोहम्मद बिन कासिम की सेना सिंध की और बढ़ी और राजमहल में घुसने का प्रयास किया। यहाँ भी  उनका स्वागत रानी लाडो और राजकुमारी सूर्य और परमाल के साथ महल के बाकि औरतों ने तीरों और भालों से किया। अरब सेना के लिए औरतों का युद्ध कौशल नया अनुभव था। अरब बहुत प्रयास करके भी  महल में घुस नहीं पाए। पर रानी को मोक्षवास के गद्दारी की भनक नहीं थी। इसी का फायदा उठाकर मोक्षवास महल में घुस गया तथा रात में चोरी से महल का दरवाजा खोल दिया जिस से अरब सैनिक महल में प्रवेश कर गए। रानी और बाकि औरतों ने जौहर की अग्नि में अपनी जान दे दी।

पर राजा की दो बेटियां पीछे रह गयी। उन्हे बंदी बना लिया गया। मोहम्मद बिन कासिम ने सोचा की इन राजकुमारियों को खलीफा को भेंट किया जाये। (इसी से बचने के लिए बाकि औरतों ने जौहर  कुंड में जान दी थी।) दोनों राजकुमारियों सूर्य और परमाल के ह्रदय में प्रतिशोध  की ज्वाला धधक रही थी।  उन्हें एक अवसर की तलाश थी। अब उन्हें अवसर मिला। राजकुमारियों को खलीफा के सामने पेश किया गया।  उनके रूप सौंदर्य को देखकर  खलीफा की ऑंखें चौंधिया गयी। ऐसी सुंदरता उसने पहले कभी नहीं देखी थी।

मोहम्मद बिन कासिम की मौत (Daith of Mohammad Bin Kasim)

जैसे ही उसने राजकुमारी को हाथ लगाया, राजकुमारी अचानक से पीछे हट गयी। रोते हुए बोली “महाराज हम आपके लायक नहीं है। आपके पास भेजने से पहले मोहम्मद बिन कासिम ने हमें तीन दिनों तक अपने साथ रखा। ” इस बात से खलीफा की ऑंखें गुस्से से लाल हो गयी। आँखों से अंगारे बरसने लगे। उसने तुरंत कासिम को बोरी में सिलकर लाने का हुक्म दिया। रास्ते में मोहम्मद बिन कासिम की दम  घुटने से मौत हो गयी। उसके बाद दोनों वीरांगनाओं ने भी “जय सिंध और जय दाहिर (Jai Sindh and Jai Dahir) कहते हुए अपनी जान दे दी। उनका प्रतिशोध पूरा हो चूका था। 

जौहर (Jauhar) – जब कोई मुस्लिम आक्रांता किसी हिन्दू राज्य पर आक्रमण करता था और जीत लेता था तो औरतें अपनी इज्जत बचाने और मुस्लिम सैनिकों के हाथ न आने पाए इसलिए अग्नि कुंड में कूद कर जान दे देती थी। 

राजा दाहिर और इमाम हुसैन (Raja Dahir and Imam Hussain)

राजा दाहिर का इस्लाम पर भी बहुत बड़ा उपकार रहा है। पैगम्बर मोहम्मद की मौत के बाद अरब कबीलों में खलीफा बनने की लड़ाई शुरू हो गयी। पैगम्बर मोहम्मद के खानदान के लोगों के खून के प्यासे  गए थे जिन्हें किसी भी कीमत पर इस्लाम का झंडाबरदार बनना था, पैगम्बर का उत्तराधिकारी बनना था। खलीफा  अल हज्जाज इब्न युसूफ ने पैगम्बर मोहम्मद के वंशजों को ढूंढ कर मारने  चलाई थी जिसमे उसने इमाम हुसैन (Imam Hussain) को मार भी दिया था। पर राजा दाहिर ने हुसैन एबीएन अली को शरण दी थी और उनकी रक्षा की थी जो पैगम्बर मोहम्मद के  वंशज थे। जिन्हे बाद में  पकड़ कर मौत के घाट उतर दिया गया था। 

उम्मीद है दोस्तों आपको Raja Dahir a National Hero की कहानी अच्छी लगी होगी। हमारे देश ने उन्हें भुला दिया है पर हमारा ये कर्त्तव्य है कि हम  रखे। अपने दिल में रखें  प्रेरणा ले। 

अगर आप भी इसमें अपना अनुभव और ज्ञान जोड़ना चाहते हैं या कुछ और भी लिखने का शौक रखते हैं तो Mail Us at ” [email protected] “साथ में अपना परिचय एक फोटो के साथ भी भेजें। आपकी रचना आपके नाम और फोटो के साथ प्रकाशित की जाएगी।

 

भारत की नई शिक्षा नीति 2020 की संपूर्ण जानकारी हिंदी में

हर देश की एक शिक्षा नीति होती है  जिसपर उस देश की पूरी शिक्षा व्यवस्था चलती है। हमारे भारत में भी हमेशा से एक नीति रही है शिक्षा की जिसपर हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था चलती रही है। इसमें समय समय पर परिवर्तन भी हुए है। 2020 में भारत सरकार 35 वर्षों से चल रही शिक्षा नीति को समाप्त करके एक नयी शिक्षा नीति लेकर आयी है। ऐसा नहीं है की स्वतंत्रता के बाद की  शिक्षा नीति है। हम अपनी शिक्षा नीति को दो बार पहले भी बदल चुके हैं।

नयी शिक्षा नीति क्या है इसमें  बदलाव हुए हैं? इन सब विषयों पर करेंगे।

टॉपिक्स

  • भारतीय शिक्षा नीति
  • इतिहास
  • घटना क्रम
  • बदलाव की जरुरत क्यों?
  • शिक्षा नीति में बदलाव
  • कन्क्लूसन

भारतीय शिक्षा नीति Indian Education Policy 

हमारे देश की शिक्षा नीति 10 + 2 पैटर्न पर आधारित रही है जिसमे बोर्ड परीक्षाओं में आये grades और numbers पर ज्यादा फोकस किया जाता रहा है। हम Practical Knowledge की जगह Theoretical Knowledge पर ज्यादा ध्यान दिए हैं। पर नयी शिक्षा नीति में Theoretical Knowledge की जगह Practical Knowledge पर ज्यादा ध्यान दिया गया है।

आज़ादी  के बाद भारतीय शिक्षा नीति  का इतिहास History of Indian Education Policy after Independence 

हमारे  देश में अब तक कुल 3 बार शिक्षा नीति लागु हो चुकी है।

1968 में इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री थी  दूसरी बार 1986 में जब राजीव गाँधी प्रधानमंत्री थे। आज़ादी  के बाद से हमारे देश में शिक्षा को नियंत्रित करने के लिए शिक्षा मंत्रालय काम करता था 1986 में बदल कर मानव संशाधन विकास मंत्रालय कर दिया गया।

1992 में 1986 के शिक्षा नीति में कुछ संशोधन किया गया  शिक्षा नीति को बदला नहीं गया।

भारत सरकार ने 1964 में तत्कालीन विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (University Grant Commission) के अध्यक्ष डॉक्टर दौलत सिंह कोठारी अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया जिसे आयोग कहा। कोठारी आयोग (Kothari Commission) की सिफारिश पर नयी शिक्षा नीति लागु हुई। इसमें आयोग की सभी सिफारिशों को मन लिया गया बस एक को छोड़कर। वो था शिक्षा पर अपने GDP का 6 % खर्च करना।

भारत सरकार के National Education Policy Draft 2019 के अनुसार भारत में 2017 -2018 में हमारे GDP का मात्रा 2.7 % ही शिक्षा पर खर्च हुआ। अब तक कभी भी हमने अपने GDP का 4 % से अधिक शिक्षा पर खर्च नहीं किया।

जबकि कई देश  GDP का 5 -6 % तक खर्च करते हैं शिक्षा पर जैसे भूटान, जिम्बाब्वे, स्वीडन और बाकि और भी कई देश।

 घटना क्रम

नयी शिक्षा नीति का ड्राफ्ट बनकर तैयार हो गया है। इसको कैबिनेट में पास किया जा  चूका है। अब ये लोकसभा और राज्यसभा में पास होने के बाद राष्ट्रपति का हस्ताक्षर होगा। उसके बाद ये लागु होगा।

ये ड्राफ्ट रातों रात बनकर तैयार नहीं हुआ है। इसपर काम बहुत दिनों से चल रहा था। इसका घटनाक्रम इस प्रकार है।

  • 2014 – भारतीय जनता पार्टी के घोषणा पत्र में शामिल।
  • 2015 – 31 अक्टूबर 2015 को पूर्व कैबिनेट सचिव T. S. R. Subramaniam  की अध्यक्षता में 5 सदस्यों की एक कमिटी का गठन।
  • 2016 – 27 मई 2016 को इस कमिटी ने अपनी रिपोर्ट दी।
  • 2017 – 24 जून 2017 को ISRO (Indian Space Research Organisation) के प्रमुख वैज्ञानिक K Kasturirangan  की अध्यक्षता में 9 सदस्यों की कमिटी को ड्राफ्ट बनाने की जिम्मेदारी दी गयी।
  • 2019 – 31 मई 2019 को इस कमिटी ने Human Resource Minister, रमेश पोखरियाल निशंक को ड्राफ्ट सौंप दिया। इसके बाद HRD मंत्रालय ने इस पर लोगों से सुझाव मांगे। कारोब 2 लाख लोगो ने इस ड्राफ्ट पर सुझाव दिए।
  • 29 जुलाई 2019 को केंद्रीय कैबिनेट ने इस ड्राफ्ट को मंजूरी दी।

बदलाव की जरुरत क्यों?

अब प्रश्न आता है की इस बदलाव की जरुरत क्या थी? केंद्र सरकार के अनुसार हमारी शिक्षा नीति पुरानी हो गयी थी। आज के ज़माने में जिस तरह की शिक्षा की लोगो को जरुरत है वो नहीं मिल पा रही थी। इसमें बदलाव के कई कारण थे।

बदलते समय की जरूरतों को पूरा करना

शिक्षा  की गुणवत्ता को बढ़ाना

Innovation और Research को बढ़ावा देना।

देश को ज्ञान का सुपर पावर बनाना।

सरकार के लक्ष्य

इस नयी नीति के द्वारा सरकार अपने लक्ष्य को प्राप्त करना चाहती है।

Making India a  Global Super Power

2035 तक सरकार कम से कम 50 % विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा तक पहुँचाना चाहती है। अभी ये आंकड़ा 25 – 26 % तक है।

शिक्षा नीति में बदलाव

अब सबसे बड़ा प्रश्न है कि आखिर शिक्षा नीति में बदलाव क्या किया गया है। हमारी शिक्षा नीति को समाप्त करके बिलकुल नयी नयी शिक्षा नीति लाया गया है। इसमें बहुत ही अहम् बदलाव किये गए हैं जो इस प्रकार हैं।

  • सबसे पहले मानव संशाधन विकास मंत्रालय का नाम बदल कर शिक्षा मंत्रालय कर दिया गया है। अब मानव संशाधन मंत्रालय को शिक्षा मंत्रालय के नाम से जाना जायेगा तथा मानव संशाधन विकास मंत्री को शिक्षा मंत्री के नाम से जाना जायेगा। (अभी मानव संशाधन विक्स मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक हैं।)
  • शिक्षा का बजट बढ़ा दिया गया है। अब पुरे GDP का 6 % शिक्षा पर खर्च किया जायेगा।
  • प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में दी जाने की कोशिश की जाएगी।
  • नयी शिक्षा नीति के तहत संस्कृत भाषा को भी बढ़ावा दिया जायेगा। संस्कृत के विश्वविद्यालयों में अलग अलग विषयों की पढाई संस्कृत माध्यम में होगी। 

अब हमारे शिक्षा का तरीका बदल जायेगा।

उच्च शिक्षा में बदलाव
  • Multiple Entry and Multiple Exit System 

अब अगर आप कभी बीच में पढाई छोड़ देते हैं तो जो पढाई अपने की है वो व्यर्थ नहीं जायेगा। अगर स्नातक में अपने 1 साल पढ़ कर छोड़  दिया तो आपको Certificate मिलेगा, 2 साल में Diploma, और 3 साल पूरा कर लिया तो Degree। इसमें Credit Transfer System लागु होगा।

स्नातक की डिग्री 3 साल और 4 साल की होगी। अगर आपको रिसर्च करना होगा तो आपको 4 साल की स्नातक डिग्री लेनी होगी। उसके बाद 1 Post Graduate और 4 साल Phd । M. Phil की डिग्री की आवश्यकता नहीं होगी।

  • Multi-Disciplinary Education System

कोई स्ट्रीम नहीं होगी जिसे Science, Arts और Commerce आदि। आप अपने मनचाहे विषयों की पढाई कर सकेंगे। अगर आपकी रूचि Physics के साथ History पढ़ने की है तो वो भी पढ़ सकते हैं।

ये बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक है।

  • College में Graded Autonomy होगी। मतलब College अपने स्तर से भी परीक्षा ले सकते हैं और डिग्री भी  दे सकते हैं।
  • College और University में नामांकन के लिए एक Common Admission Test लिया जायेगा।
  • उच्च शिक्षा को विनियमित (Regulate) करने के लिए एक Regulatory Body बनाई जाएगी। जैसे UGC, AICTE आदि अलग अलग Regulatory Body की जगह एक Body होगी।
  • चाहे केंद्रीय, राजकीय या Deemed विश्वविद्यालय हो, सबके लिए एक मानक तय होंगे।
  • निजी कॉलेज के Fee सरकार द्वारा निर्धारित किये जायेंगे और उसकी सीमा बानी रहेगी। अब निजी कॉलेज मनमानी फी नहीं ले सकेंगे।
  • Research की funding के लिए अमेरिका के तर्ज पर एक National Research Foundation बनाया जायेगा जो Science के अलावा Arts के रिसर्च के लिए भी फण्ड देगी।
  • तकनिकी द्वारा शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए Virtual Labs शुरू किये जायेंगे।

अया सोफ़िया (Hagia Sophia) विवाद क्या है और इसे मस्जिद में क्यों बदल दिया गया? 

स्कूली शिक्षा में बदलाव 

पहले हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था 10 + 2 के पैटर्न की जगह 5 + 3 + 3 + 4 कर दिया गया है।

  • 3 से 6 साल तक के बच्चे के लिए खेल के साथ पढाई का पाठ्यक्रम तैयार किया गया है। इसके लिए बालवाटिका तैयार किया गया है जिसमे  पढ़ाने के लिए शिक्षकों को विशेष ट्रेनिंग दी जाएगी।  को ECCE Qualification (Early Childhood Care) कहा जायेगा।
  • कक्षा 1 से 3 तक के बच्चों के लिखना पढ़ना सिखाने पर खास जोर।
  • छठी कक्षा से  बच्चों को Vocational Courses पढ़ाने की शुरुआत हो जाएगी। बच्चों को Computer Coding के साथ साथ उनकी रूचि वाली Skill सिखाई जाएगी। इसी कक्षा से Internship Programme की भी शुरुआत हो जाएगी। अगर किसी बच्चे को पेंटिंग का शौक है तो उसे किसी पेंटर से पेंटिंग की ट्रेनिंग  दी जाएगी। इसी तरह जिसको संगीत या चित्रकारी का शौक होगा तो उसे उसकी ट्रेनिंग दी जाएगी। 
  • कक्षा 6 से ही Project based learning शुरू हो जाएगी।
  • 9 से 12 कक्षा तक एक समान शिक्षा दी जाएगी। हर विषय गहराई  में पढाई जाएगी।
  • Multi-Stream System लागु होगा। इसमें बच्चे को ये आज़ादी रहेगी अपने पढाई वाले विषयों के साथ Extra Curricular Subject भी पढ़ सकता है। इस Extra Curricular Subject को अब अलग नहीं माना जायेगा। ये भी हर विषय की तरह बराबर महत्व के होंगे।
पाठ्यक्रम में बदलाव 
  • पुरे देश में एक तरह  पाठ्यक्रम होंगे जिसे NCERT द्वारा तैयार किया जायेगा।
  • कक्षा 5 तक बच्चों को मातृभाषा में शिक्षा देने की कोशिश की जाएगी।

अब बच्चों का मूल्यांकन 360 डिग्री Holistic Report Card के तर्ज पर किया जायेगा। इसमें बच्चों का मूल्यांकन सिर्फ शिक्षक नहीं बल्कि बच्चा खुद भी करेगा और साथ में उसके सहपाठी भी करेंगे।

जिओ ग्लास (Jio Glass) क्या है और कैसे काम करता है?

नयी नीति लागु कब से होगी?

इस बिल का नाम है National Higher Education Bill जिसे कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है। अब इसे संसद में पेश किया जायेगा। इसके बाद ये कानून का शक्ल लेगा। फिर राज्य सरकारें अपने अपने राज्यों में इसे कानून बनाकर लागु करेंगी। 

उम्मीद है आपको नए शिक्षा नीति के बारे में पूरी जानकारी मिल  गयी होगी।  अब देश की शिक्षा व्यवस्था ऐसी होगी जिस से अब छात्र कागज की डिग्री की जगह स्किल सीख कर आएंगे और उसको अपने विकास में इस्तेमाल करेंगे। अब जरुरत है इसको सही ढंग से लागु करने की। 

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जन्माष्टमी कब और क्यों मनाया जाता है ?

यदा यदा हि धर्मस्य: ग्लानिर्भवति भारत:।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहं।।

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम

धर्म संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।।

By <a href="//commons.wikimedia.org/wiki/User:AroundTheGlobe" title="User:AroundTheGlobe">AroundTheGlobe</a> - Swaminarayan Sampraday <a rel="nofollow" class="external autonumber" href="http://www.swaminarayan.info/events/images/janmastmi2005/73.jpg">[1]</a>, <a href="http://creativecommons.org/licenses/by-sa/3.0/" title="Creative Commons Attribution-Share Alike 3.0">CC BY-SA 3.0</a>, <a href="https://commons.wikimedia.org/w/index.php?curid=6948025">Link</a>

भावार्थः जब जब धर्म की हानि होने लगती है और अधर्म धर्म पर हावी होने लगता है, तब तब मैं स्वयं अवतार लेता हूँ, अर्थात् जन्म लेता हूं । सज्जनों की रक्षा, दुष्टों के संहार और धर्म की पुनःस्थापना के लिए मैं विभिन्न युगों में अवतरित होता हूं ।

इस श्लोक को हम सबने कभी न कभी सुना होगा। याद भले ही न हो, अर्थ की समझ भले ही न हो, पर इस श्लोक को सुनकर मन में जिसकी छवि बनती है उसके बारे में हम कितना जानते हैं? कौन हैं वो?

जी हाँ। सही पहचाना। ये श्लोक महाभारत के युद्ध के मैदान में श्रीमद्भगवत्गीता का उपदेश देते हुए भगवान श्री कृष्णा नें अर्जुन से कहा था।

जैसा कि हम सबको मालूम है कि हमारा देश पर्व त्योहारों का देश है। हम हर छोटी बड़ी बातो में ख़ुशी तलाश लेते है।

हम श्री कृष्णा जन्माष्टमी पर्व की प्रतीक्षा कर रहे हैं। बहुत धूम धाम से हम ये पर्व मनाते हैं।

पर क्या आपको पता है जन्माष्टमी पर्व क्यों मनाया जाता  है ? जाहिर सी बात है अधिकतर लोगों को पता होगा। जैसे की नाम से ही स्पष्ट है “श्री कृष्णा जन्माष्टमी (Shree Krishna Janmashtami)” भगवान श्री कृष्णा से ही सम्बंधित होगा।

इस article में श्री कृष्ण जन्माष्टमी के बारे में बहुत जानकारियाँ  मिलने वाली है। जैसे हम जन्माष्टमी कैसे मनाते हैं, किन किन जगहों पर किस किस तरह से मनाया जाता है, जन्माष्टमी का महत्व, क्या celebration करते हैं हम इस दिन?

  • जन्माष्टमी क्यों मनाई जाती है?
  • जन्माष्टमी कब मनाई जाती है?
  • 2020 में  जन्माष्टमी कब मनाई जाएगी?
  • जन्माष्टमी कैसे मनाई जाती है?
  • दही हांड़ी महोत्सव (Dahi Handi Mahotsav)
  • जन्माष्टमी के पीछे की कहानी (Story behind Janmashtami)
  • जन्माष्टमी के अलग अलग नाम।

“हम श्री कृष्णा जन्माष्टमी (Shree Krishna Janmashtami)” क्यों मनाते है ? Why Shree Krishna Jnamashtami is Celebrated ?

जब पुरे पृथ्वी पर राक्षसों का अत्याचार बढ़ गया था, लोग त्राहि त्राहि कर रहे थे, कंस के क्रूरता से पृथ्वी कराह रही थी तब भगवान विष्णु नें मनुष्य रूप में अवतार लेकर पृथ्वी को राक्षसों के जुल्म से मुक्त करने का निर्णय लिया। फिर कंस द्वारा जेल में बंदी बनाये उसी की बहन देवकी और वासुदेव के बेटे के रूप में भाद्रपद कृष्णा पक्ष अष्टमी के दिन मथुरा में अवतार लिया। फिर भगवन श्री कृष्ण ने दुष्ट राक्षसों का संहार करके पृथ्वी को बचाया। क्योंकि उस दिन भगवान का अवतार हुआ था इसलिए हजारों वर्षों से हम श्री कृष्ण जन्माष्टमी बहुत ही धूम धाम  खुशी से मनाते हैं।

जन्माष्टमी कब मनाई जाती है? When Janmashtami is Celebrated?

प्रत्येक वर्ष भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष के अष्टमी (आठवें दिन) को बड़े ही धूम धाम से जन्माष्टमी मनाया जाता है। आज के ही दिन भगवान श्री कृष्ण का अवतार हुआ था।

ये भी पढ़ें।    रक्षाबंधन क्यों मनाया जाता है?

  • 2020 में  जन्माष्टमी कब मनाई जाएगी? When Janmashtami will be Celebrated in 2020?

जन्माष्टमी 2020

11 अगस्त

निशिथ पूजा– 00:04 से 00:48

पारण– 11:15 (12 अगस्त) के बाद

रोहिणी समाप्त- रोहिणी नक्षत्र रहित जन्माष्टमी

अष्टमी तिथि आरंभ – 09:06 (11 अगस्त)

अष्टमी तिथि समाप्त – 11:15 (12 अगस्त)

जन्माष्टमी कैसे मनाई जाती है? How Janmashtami is Celebrated?

हिन्दू धर्म में जन्माष्टमी बड़े ही धूम धाम से मनाई जाती है। इस दिन लोग भगवान श्री कृष्ण के जन्म दिवस के रूप में मनाते हैं। भारत के साथ साथ विदेशो में रहने वाले  हिन्दू भी जन्माष्टमी के त्यौहार को उल्लास और भक्ति के साथ मनाते हैं। इसे धार्मिक तरीकों के साथ ही साथ एक जन्मदिन की तरह भी मनाया जाता है।  

जन्माष्टमी के दिन लोग घर में और मंदिरों में श्रद्धा भाव से पूजा पाठ करते हैं। भगवन श्री कृष्ण को लड्डू आदि का भोग लगाते हैं। भगवान श्री कृष्ण  की नगरी मथुरा में लोग बहुत दूर दूर से  आते हैं और श्रद्धा से अपने आराध्य की आराधना करते हैं। लोग जन्माष्टमी के दिन व्रत या उपवास (Fasting) भी रखते हैं। लड्डू गोपाल (लड्डू गोपाल भगवान श्री कृष्ण का ही एक नाम है) की मूर्ति को झूला झुलाया जाता है और भजन भी गया जाता है।

जन्माष्टमी के दिन स्कूल कॉलेज में श्री कृष्ण सम्बंधित फैंसी ड्रेस कम्पटीशन (Fancy Dress Competition) के साथ ही साथ नाट्य नाटिका और सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन भी किया जाता है।

दही हांड़ी महोत्सव (Dahi Handi Mahotsav)

इस दिन युवा  दही हांड़ी (Dahi Handi) का कार्यक्रम भी आयोजित करते हैं। दही हांड़ी में युवा दही से भरी हांड़ी को ऊँचाई पर तंग देते हैं फिर एक के ऊपर एक चढ़कर, एक पिरामिड बनाकर दही से भरी हांड़ी को फोड़ते हैं। इस आयोजन का युवाओ में बहुत उत्साह होता है। युवाओं की टोली इसकी प्रतियोगिता रखती है और जितने वाले को पुरष्कार भी दिया जाता है।

जन्माष्टमी के पीछे की कहानी (Story behind Janmashtami)

जब पृथ्वी पर कंस का अत्याचार  बढ़ गया था, लोग त्राहि त्राहि कर रहे थे तब कंस की बहन देवकी के गर्भ से कृष्णा का देवकी के आठवें पुत्र के रूप में जन्म हुआ। कंस को मालूम था की देवकी का आठवां पुत्र  उसका वध करेगा इसलिए उसने देवकी और वासुदेव को कारागार में बंद कर दिया था तथा देवकी के सभी पुत्रों को मार देता था।

जब कृष्ण का जन्म हुआ तब आँधी तूफान का कहर मच गया,  घनघोर अँधेरा छा गया, मूसलाधार बारिश होने लगी, कारागार के सभी पहरेदार बेहोश हो गए, यमुना नदी उफान मारने लगी।

वासुदेव एक टोकरी में लेकर बाल कृष्ण को कंस से बचाने के लिए यमुना पर कर अपने मित्र नन्द के पास गए। वहां कृष्ण का पालन पोषण नन्द और यशोदा  द्वारा किया गया। इसीलिए कृष्णा का एक नाम नन्दलाल भी है।

बचपन से ही भगवन श्री कृष्ण ने कंस द्वारा  भेजे गए हर राक्षस राक्षसी का संहार किया और अंत में कंस का संहार करके लोगो को कंस के अत्याचारों से मुक्ति दिलाई।

जन्माष्टमी के अलग अलग नाम (Different names of Janmashtami)

कृष्ण जन्माष्टमी (Krishna Janmashtami)

कृष्णाष्टमी (Krishnashtami)

गोकुलाष्टमी (Gokulashtami)

कन्हैया अष्टमी (Kanhaiyashtami)

कन्हैया आठें (Kanhaiya Athe)

श्री कृष्ण जयंती (Shree Krishna Jayanti)

श्रीजी जयंती (Shreeji Jayanti)

पूरी पृथ्वी को कंस जैसे क्रूर राक्षस अत्याचारों मुक्ति दिलाने और ब्रह्माण्ड के कल्याण हेतु भाद्रपद के कृष्ण पक्ष के अष्टमी को भगवान श्री कृष्ण का अवतार हुआ। इसीलिए प्रति वर्ष भाद्रपद के कृष्ण पक्ष के अष्टमी के दिन हम सभी भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाते हैं।

अगर आप भी इसमें अपना अनुभव जोड़ना चाहते हैं या कुछ और भी लिखने का शौक रखते हैं तो Mail Us at ” [email protected] “साथ में अपना परिचय एक फोटो के साथ भी भेजें। आपकी रचना आपके नाम और फोटो के साथ प्रकाशित की जाएगी।

अया सोफ़िया (Hagia Sophia) विवाद क्या है और इसे मस्जिद में क्यों बदल दिया गया?

अया सोफ़िया (Hagia Sophia) चर्च से मस्जिद, मस्जिद से म्यूजियम और फिर म्यूजियम से वापस मस्जिद बन गया।

अब आपके मन में कुछ सवाल आ रहे होंगे। जैसे ये अया सोफ़िया (Hagia Sophia) है क्या? ये बना कब? ये मस्जिद में कब और क्यों बदल गया? मस्जिद से म्यूजियम किसने बनाया? फिर अब ऐसा क्या हो गया की वापस मस्जिद बन गया? ये पूरा विवाद है क्या?

आपकी हर जिज्ञासा शांत होगी। धैर्य रखें और आर्टिकल पूरा पढ़ें।

Hagia Sophia Controversy
Hagia Sophia in Istanbul https://www.pexels.com/photo/hagia-sophia-museum-3969150/
अनुक्रम

  • अया सोफ़िया (Hagia Sophia) क्या है और कहाँ है?
  • इसका अर्थ
  • इसका इतिहास
    • चर्च के रूप में।
    • मस्जिद के रूप में।
    • म्यूजियम के रूप में।

हया सोफ़िया (Hagia Sophia) क्या है और कहाँ है?

अया सोफ़िया (Hagia Sophia) तुर्की के राजधानी इस्तांबुल में स्थित एक शानदार और विश्व प्रसिद्द दर्शनीय स्थल (Tourist Destination) है जिसे प्रति वर्ष लाखों लोग देखने विश्व के कोने कोने से आते हैं। जैसे की शीर्षक से ही पता चल रहा होगा की ये रोमन साम्राज्य के समय पहले चर्च के रूप में बना (चर्च में भी पहले Western Orthodox Church फिर बैजंटीन साम्राज्य के समय Estern Orthodox Church) फिर ओट्टोमन साम्राज्य (Ottomon Empire) में मस्जिद के रूप में बदल गया, फिर आधुनिक तुर्की ने निर्माता मुस्तफा कमाल पाशा (Mustafa Kemal Pasha) ने इसे म्यूजियम में बदल दिया।

जब ये बनकर तैयार हुआ  तब ये दुनिया का सबसे बड़ा आतंरिक स्ट्रक्चर वाला ईमारत था। और ये करीब 1000 साल तक विश्व का सबसे बड़ा कैथेड्रल बना रहा।

अया सोफ़िया (Hagia Sophia) का अर्थ Meaning of Hagia Sophia

इसका अर्थ Holy Wisdom या Sacred Truth होता है।

अया सोफ़िया (Hagia Sophia)का इतिहास 

 चर्च के रूप में।

इसका इतिहास शुरू होता है 360  और 415 ईस्वी से। 360 ईस्वी में  रोमन साम्राज्य द्वारा एक चर्च का निर्माण किया जाता है जो की बाद में आग लगने के कारण नष्ट हो जाता।  फिर 415 ईस्वी में दोबारा एक चर्च का निर्माण होता है जो की फिर से से नष्ट हो जाता है।

फिर 537 ईस्वी में सम्राट जस्टिनियन के द्वारा चर्च का निर्माण कराया जाता है जो आज का अया सोफ़िया (Hagia Sophia) है।

उस समय ईसाइयत में दो सेक्ट थे। Eastern Orthodox Church और Western Orthodox Church।

Eastern Orthodox Church का मुख्यालय Constantinopole  आज का इस्तांबुल में थे तथा Western Orthodox Church का मुख्यालय Vatican में था।

अया सोफ़िया (Hagia Sophia) करीब 900 वर्षों तक Eastern Orthodox Church का मुख्यालय  बना रहा।

 मस्जिद के रूप में।

1453 में Constantinopole को ओटोमन साम्राज्य के सुल्तान मेहमत (Sultan Mehmat) द्वारा जीत लिया जाता है। कई दिनों तक तुर्की में और Constantinopole लुटा जाता है। साथ ही अया सोफ़िया (Hagia Sophia) को भी लुटा जाता है, उसे पूरी तरह से बर्बाद नहीं किया जाता है। सुल्तान मेहमत को पता चलता है की इसे जीतने में तुर्क और अरब 900 वर्षों तक नाकाम रहे। वो उस चर्च  में जाता है जिसे ईसाइयत के गौरव के रूप में देखा जाता था। उस ईमारत में जाने के बाद, उसकी बनावट और खूबसूरती देखने के बाद उसे अपने जीत पर और ज्यादा गर्व होता है। उसी समय सुल्तान मेहमत वहाँ नमाज पढता है और चर्च को मस्जिद में बदल देता है।

चर्च को मस्जिद में बदलने के लिए सुल्तान ने ईसाइयत के प्रतिक चिन्हों को ढंक दिया और प्लास्टर करवा दिया। अंदर इस्लामिक प्रतिक चिन्ह बनवाये।

म्यूजियम के रूप में। 

प्रथम विश्वयुद्ध के बीतते बीतते ओटोमन साम्राज्य बिखर गया तथा उसका शाशन समाप्त हो गया।

1922 में आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष तुर्की का निर्माण मुस्तफा कमाल पाशा (Mustefa Kemal Pasha) के नेतृत्व में होता है जिन्हे “अतातुर्क” के नाम से भी जाना जाता है। इन्हे आधुनिक तुर्की का पिता या जनक भी कहा जाता है। अतातुर्क का अर्थ तुर्की का पिता (Father of Turkey) होता है।

जो सम्मान भारत में महात्मा गाँधी को है वही सम्मान तुर्की में मुस्तफा कमाल पाशा (Mustefa Kemal Pasha) को दिया जाता है।

ये आधुनिक और धर्मनिरपेक्ष विचारों के व्यक्ति थे। इनका मकसद तुर्की को एक आधुनिक और धर्मनिरपेक्ष देश बनाना था। ये एक ऐसा तुर्की चाहते थे जिसका कोई राज्य धर्म  न हो,  औरतों और अल्पसंख्यकों को समान अधिकार हो।

1934 में इन्होने अया सोफ़िया (Hagia Sophia) को मस्जिद से  बदलकर म्यूजियम में बदल दिया जिसे

1985 में UNESCO (United Nationa Educational, Scientific and Cultural Organisation) ने World Heritage Site का दर्जा दिया।

1935 में इसे जनता के लिए खोल दिया गया और ये विश्व के सबसे प्रसिद्ध दर्शनीय स्थलों में  से एक बन गया।

2013 में सरकार ने इसके मीनारों को नमाज के लिए खोल दिया।

2016 में 85 वर्षों के बाद पहली बार इसमें  नमाज पढ़ी गयी।

2018 में तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन (Recep Tayyip Erdogan) ने खुद वहाँ नमाज पढ़ी और उसे मस्जिद में बदलने की बात की।

2019 में राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन (Recep Tayyip Erdogan) की पार्टी ने इस्तांबुल के स्थानीय चुनाव में ये मुद्दा उठाया पर चुनाव में हार गए।

2020 में ओटोमन साम्राज्य के आक्रमण के 567वें वर्षगांठ के दिन उस म्यूजियम में फिर से नमाज पढ़ी जाती है।

इसके बाद न्यायलय ने Association for the Protection of Historic Monument and the Environment नाम के एक ग्रुप की याचिका पर मस्जिद में बदलने का निर्णय दिया।

अंतत: 24  जुलाई को वहाँ नमाज पढ़ी जाएगी और म्यूजियम मस्जिद बन जायेगा।

तुर्की के इस निर्णय का विरोध 

अया सोफ़िया (Hagia Sophia) 900 वर्षों तक Eastern Orthodox Church का मुख्यालय रहा था।  इससे जुड़े  लोगों के लिए इससे भावनात्मक लगाव है। इसलिए पूरी दुनिया में  जहा इस फेथ से जुड़े लोग हैं इसका विरोध कर रहे हैं।  जैसे Greece, France, Russia, United States of America आदि। साथ ही साथ World Council of Churches और पोप भी इसका पुरजोर विरोध कर रहे हैं।

UNESCO भी अपने World Heritage Committee के नियमों का हवाला देकर विरोध जता रहा है। इस नियम के मुताबिक World Heritage Site में शामिल किसी भी ईमारत का नाम या उपयोग को बदलने के लिए UNESCO के World Heritage Committee का अप्रूवल लेना होता है।

उम्मीद है आप लोग हया सोफ़िया विवाद (Hagia Sophia Controversy) को समझ गए होंगे। इसके बारे में आपकी सारी जिज्ञासा शांत हो गयी होगी। ये जानकारी आपके परीक्षाओं में भी काम आएंगी जैसे UPSC, State PSC इत्यादि।

अगर आप भी इसमें अपना अनुभव जोड़ना चाहते हैं या कुछ और भी लिखने का शौक रखते हैं तो Mail Us at ” [email protected] “साथ में अपना परिचय एक फोटो के साथ भी भेजें। आपकी रचना आपके नाम और फोटो के साथ प्रकाशित की जाएगी।

जिओ ग्लास (Jio Glass) क्या है और कैसे काम करता है?

कोरोना महामारी ने लोगो के जीने का तरीका ही बदल दिया है। पहले जो लोग मिलना जुलना पसंद करते थे, आमने सामने उपस्थित होकर काम करना पसंद करते थे, बॉस अपने एम्प्लोयी को ऑफिस आने के लिए  बोलते थे, वही आजकल सबकी यही इच्छा है कि work from home यानि घर बैठे काम करें। इसके लिए  बहुत सारे ऑनलाइन टूल्स भी हैं जैसे वीडियो एप्प (Zoom, Cisco Webex, Google Meet) इत्यादि। पर ये सभी टूल्स  वीडियो कॉलिंग और वीडियो मीटिंग के लिए हैं। कैसा रहेगा जब आप काम तो ऑनलाइन करोगे, मीटिंग, कॉन्फ्रेंस ऑनलाइन होगा पर आपको फील बिलकुल फेस टु फेस का होगा? आपको लगेगा की आप साथ में ही बैठे हो? साधारण शब्दों में की घर बैठे आप 3D मीटिंग कर पाओ।

दोस्तों ये सच होने वाला है।

रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (Reliance Industries Limited) चेयरमैन मुकेश अम्बानी ने अपने कंपनी के 43वें Annual General Meeting (AGM) में  की

आत्मनिर्भर भारत (Self Reliant India)

Jio has created a complete 5G solution from scratch, that will enable us to launch a world-class 5G service in India, using 100% homegrown technology and solutions.

                                                   Mukesh Ambani, Chairman, RIL.

 

मुकेश अम्बानी, जैसा की रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड अपने हर Annual General Meeting (AGM) में अपनी वित्तीय अवस्था के साथ साथ अपने आगे के प्लान्स जैसे इन्वेस्टमेंट आदि के बारे में घोषणा करते हैं, ने इस बात की भी घोषणा की कि रिलायंस जिओ की तरफ से एक 3D 2D वीडियो कालिंग और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, मीटिंग के लिए जिओ ग्लास (Jio Glass) का लांच किया जायेगा। हालाँकि इसके कीमत के बारे में कोई घोषणा नहीं हुई।

इस से न सिर्फ आप किसी से फेस टु फेस बात कर पाओगे, मीटिंग्स कर पाओगे बल्कि एक दूसरे को फील भी कर पाओगे। आपको लगेगा की आप Distance Calling  नहीं  बल्कि आमने सामने बैठकर बातें कर रहे हो।

जिओ ग्लास क्या है? What is Jio Glass?

जिओ गिलास एक वर्चुअल डिवाइस है जिसे चश्मे की तरह इस्तेमाल करके लोग 3D, 2D वीडियो कालिंग, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, नार्मल ऑडियो कॉलिंग और मीटिंग कर सकते हैं। इसमें होलोग्राफिक कंटेंट के लिए भी अपने स्मार्टफोन को जिओ ग्लास के साथ कनेक्ट करके इस्तेमाल किया जा सकता है।

Jio Glass

जिओ ग्लास का उपयोग Use of Jio Glass

3 D वीडियो कॉल 

2 D वीडियो कॉल 

वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (मीटिंग)

होलोग्राफिक सेशंस

जिओ ग्लास  काम कैसे करेगा ? How Jio Glass will Work?

जिओ गिलास  को आँखों में लगाकर उसमें दिए गए सेंसर और कैमरा को अपने स्मार्ट फ़ोन से कनेक्ट करके वीडियो कॉल और  कॉन्फ्रेंसिंग के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।  अपने स्मार्टफोन का इस्तेमाल करने के लिए ग्लास को अपने स्मार्ट फ़ोन को केबल से कनेक्ट करना होगा। जिससे आप अपने स्मार्ट फ़ोन के फोटोज को 3 D टेक्नोलॉजी में अनुभव कर सकते हैं।

 जिओ ग्लास की विशेषताएं Special about Jio Glass

High Resolution Display

जिओ गिलास से आप 3 D और 2 D वीडियो कॉल और कॉन्फ्रेंसिंग का अनुभव तो करेंगे ही साथ ही साथ नार्मल कॉल और होलोग्राफिक कॉल भी आसानी से कर सकेंगे। जिओ ग्लास (Jio Glass) में सेंसर और कैमरा लगा हुआ है जिससे ये ग्लास आपके स्मार्ट फ़ोन से कनेक्ट होगा और आप इसके फीचर्स का उपयोग कर सकेंगे। इस गिलास का उपयोग नार्मल फ़ोन में नहीं किया जा सकता है। इसके लिए आपके फ़ोन में एक्सेलेरोमीटर (Accelerometer), मैग्नेटोमीटर (Magnetometer), गोरोस्कोप (Gyroscope) और प्रोक्सिमिटी सेंसर (Proximity Sensor) होना चाहिए जो कि उपयोगकर्ता के गति का पता लगा सके।

इसका वजन केवल 75  ग्राम है जो की काफी हल्का है।

ये वर्चुअल क्लास रूम सेशन (Online Class Room Session ) के लिए बहुत बेहतर है क्योंकि इस से होलोग्रफिक सेशंस का इस्तेमाल किया जा सकता है जिससे की ऐतिहासिक स्थल जैसे प्राचीन मंदिरों, पिरामिडों, पहाड़ो इत्यादि को 3 D टेक्नोलॉजी से समझा जा सकता है जो की एक बेहतरीन अनुभव होने के साथ साथ विद्यार्थियों को समझने में भी आसानी रहेगी। ऑनलाइन एजुकेशन में विद्यार्थियों को ऐसा फील होगा जैसे वो क्लास रूम्स में बैठकर पढाई कर रहे हैं। उन्हें नक़्शे में  दिखानी हो तो सिर्फ फोटो न देखकर वो उस जगह को फील करेंगे।

अब भूगोल पढ़ने के पारम्परिक तरीके इतिहास हो जायेंगे। Traditional way of learning Geography will be History.

जिओ ग्लास (Jio Glass) हर तरह के ऑडियो फॉर्मेट को सपोर्ट करता है। साथ ही बिना किसी बाहरी एक्सेसरीज के personalized audio system सपोर्ट करता है।

जिओ ग्लास 25 से ज्यादा मिक्स्ड रियलिटी एप्प को भी सपोर्ट करता है जो मनोरंजन, शिक्षा, गेमिंग और शॉपिंग के हैं। जिस से आप अपने स्मार्ट फ़ोन के कंटेंट को भी एक्सेस कर सकेंगे वो भी वर्चुअल रियलिटी (Virtual Reality) के साथ। इसके लिए आपको अपने स्मार्ट फ़ोन को बस  से कनेक्ट करना है। साथ ही साथ वर्चुअल रियलिटी (Virtual Reality) के साथ शॉपिंग भी कर सकेंगे।

कुछ एप्प जिसे जिओ ग्लास सपोर्ट करता है।

जिओ ग्लास 25 से ज्यादा एप्प को सपोर्ट करता है जिनमे से कुछ ये हैं।

जिओ सिनेमा (Jio Cinema), जिओ सौन (Jio Sawn), जिओ टी वी + (Jio TV+), जिओ मीट (Jio Meet), रिलायंस डिजिटल (Reliance Digital), हैमलेस (Hamles), हॉर्स कार्ट (Horse Cart), स्पाइरल स्केट (Spiral Skate), फनी बन्नी (Funny Bunny) इत्यादि।

जिओ ग्लास के लिए रजिस्ट्रेशन कैसे करें? How and where to register for Jio Glass?

जिओ ग्लास कब तक बाजार में मिलेगा और इसकी कीमत क्या होगी, इसके बारे में कंपनी ने अभी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की है। अगर आप चाहते  हैं कि जिओ ग्लास (Jio Glass) आपको बाजार में एते ही मिले तो आप कंपनी के website पर जाकर  रजिस्टर कर सकते हैं।  आपको अपना कुछ डिटेल देने होंगे।  Go to official website

 

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विजय दिवस कब और क्यों मनाया जाता है ?

तू शहीद हुआ 

तो न जाने  कैसे तेरी माँ सोई होगी। 

एक बात तय है 

तुझे लगने वाली गोली सौ बार रोई होगी। 

शत शत नमन कारगिल , एक अटल विजय 

श्री अटल बिहारी वाजपेयी, पूर्व प्रधानमंत्री 

आज 26 जुलाई का वो गौरव पूर्ण दिन है जिस दिन हमारी भारतीय सेना ने कारगिल की पहाड़ियों से पाकिस्तानी सैनिकों और घुसपैठियों को बुरी तरह से हराकर भगाया था। हमारी सेना के पास काम संसाधनों और बुरी परिस्थितियाँ थी, उसके बावजूद हमारी सेना के अदम्य सहस और पराक्रम के आगे पाकिस्तानी फ़ौज और पाकिस्तानी आतंकवादी टिक नहीं पाए। उन्हें दुम दबाकर भागना पड़ा।

तभी कहा जाता है

योद्धा पैदा नहीं होते,

वो भारतीय सेना में बनते हैं। 

और उसी उपलक्ष्य में हम प्रति वर्ष 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस के रूप में मनाते हैं और उस दिन  वीर सैनिकों को नाम आँखों से याद करते हैं तथा उनकी महान शहादत को नमन करते हैं।

है नमन उनको की जिनके सामने बौना हिमालय

महान कवि कुमार विश्वास

कारगिल युध्द की शुरुआत 

कारगिल युद्ध की पृष्ठभूमि तभी बनने लगी थी फरवरी 1999 में जब प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी लाहौर बस यात्रा पर गए और जब भारत और पाकिस्तान के बीच लाहौर एग्रीमेंट हुआ जिसमे कुछ बातों पर दोनों देशों में सहमति बनी थी जैसे

परमाणु हथियारों के इस्तेमाल से दोनों देश दूर रहेंगे।

किसी भी तरह के संघर्ष से दूर रहेंगे।

सभी विवादों का निपटारा शांतिपूर्ण तरीके से होगा।

पर ऐसा हुआ नहीं।

अब आपके दिमाग में ये प्रश्न भी आ रहा होगा की कारगिल के भारतीय चौकियों पर पाकिस्तानी फ़ौज का कब्ज़ा कैसे हो गया ? हमारी सेना क्या कर रही थी ?

तो आपका ये जानना बेहद जरुरी है कि भारत और पाकिस्तान सीमा पर कुछ पोस्ट बहुत उचाई पर हैं जहा से नवंबर दिसंबर में सर्दियों में बर्फ गिरने लगती है तो दोनों देशों की सेनाएं पीछे हट जाती हैं  गर्मी आती है मई महीने में तो फौजें वापस अपने पोस्ट पर जाती हैं। पर 1999 के फ़रवरी और मई के बिच में जब भारतीय सेना अपने पोस्ट पर नहीं थी तब पाकिस्तानी फ़ौज ने उन पोस्ट्स कर कब्ज़ा कर लिया। जब गरखुन गाँव का एक चरवाहा ताशी नामग्याल अपनी भेड़े और एक चरा रहा था तब उसकी एक एक खो गयी। एक को खोजने के लिए ताशी नामग्याल पहाड़ी पर ऊपर गया तो उसने कुछ लोगों को हथियारों के साथ पहाड़ी पर चढ़ते देखा जो उसे अजीब लगा।  उसने इसकी सुचना भारतीय सेना को दी तब भारतीय फ़ौज की एक टुकड़ी को पेट्रोलिंग के लिए भेजा गया। और ये घुसपैठ को सच पाया गया।

पाकिस्तानी फ़ौज का भारतीय चौकियों पर कब्ज़ा करने का मुख्य उद्देश्य कश्मीर का लेह लद्दाख से संपर्क को तोडना था क्योंकि वो चौकियाँ ऊंचाई पर थी जिस से श्री नगर को लेह से जोड़ने वाली सड़क राष्ट्रीय राजमार्ग 1 D (NH1D) पर नजर रखना आसान था। ये राजमार्ग भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण था। अगर इसपर पाकिस्तान का कब्ज़ा होने का मतलब था कश्मीर का लेह लद्दाख से संपर्क टूटना। और भारतीय चौकियाँ जिस पर पाकिस्तानी फ़ौज ने घुसपैठ करके कब्ज़ा कर लिया था इस राजमार्ग पर नजर रखे हुए थे।

इस राजमार्ग के महत्व का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं की इसी राजमार्ग से सियाचिन पर सेना का मूवमेंट होता था। इस राजमार्ग भारत के हाथ से निकलने का मतलब था भारत का लेह लद्दाख और सियाचिन से हाथ धोना।

 

फिर भारतीय सेना ने ऑपरेशन स्टार्ट किया जिसे नाम दिया गया

थल सेना – ऑपरेशन विजय

वायु सेना – ऑपरेशन सफ़ेद सागर।

 

26 जुलाई को विजय के रूप में क्यों मनाते हैं ?

करीब दो महीने तक चली इस युद्ध का समापन 26 जुलाई 1999 को हुआ। इसीलिए प्रति वर्ष 26  विजय दिवस के रूप में मनाते हैं।

कारगिल युद्ध घटना चक्र

2 मई 1999 – ताशी  नामग्याल नामक चरवाहे ने भारतीय सेना को घुसपैठ की जानकारी दी।

5 मई 1999 – एक भारतीय सैनिक टुकड़ी पेट्रोलिंग के लिए गयी जिसमे 5  वीरगति को प्राप्त हुए।

10 मई 1999  – द्रास, काकसर और मुश्कोह  सेक्टर में पाकिस्तानी घुसपैठियों को देखा गया।

26  मई 1999 – भारतीय वायुसेना ने ऑपरेशन सफ़ेद सागर की शुरुआत की।

26 जुलाई 1999 – कारगिल युद्ध समाप्त हुआ और ऑपरेशन विजय  सफल हुआ।

सैनिकों का बलिदान नहीं भूलेगा हिंदुस्तान

कारगिल युद्ध के घटनाक्रम को देखकर लगता है की कारगिल विजय बहुत आसान था पर इसके पीछे की कहानी हमारे सैनिकों के अदम्य साहस, देशभक्ति और ओज से पूर्ण तथा उनके बलिदानों की कहानी है। इस युद्ध में 500  से ज्यादा भारतीय वीर गति को प्राप्त हुए तथा 1500  के करीब घायल हुए।

हमारे वीर सैनिकों का बलिदान व्यर्थ नहीं गया और हमारा देश कारगिल युद्ध जीत गया।  ऑपरेशन विजय को सफल बनाने में हमारे हर एक सैनिक का योगदान था। उन्हें सम्मान भी मिला जो की हमारा कर्त्तव्य था। कुछ असाधारण वीरता दिखाने वाले जवानों को बड़े बड़े सैन्य पुरष्कारों द्वारा सम्मानित किया गया। किसी को मरणोपरांत तो किसी को जीवित अवस्था में।

इनमें से प्रमुख नाम हैं।

1 . लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडेय –           परमवीर चक्र (मरणोपरांत)

2 . कैप्टेन विक्रम बत्रा –              परमवीर चक्र (मरणोपरांत)

कैप्टेन विक्रम बत्रा का एक कोट बहुत प्रचलित हुआ था ” ये दिल माँगे मोर ” जो बाद में पेप्सी का  स्लोगन भी बना।

3 . ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव –              परमवीर चक्र

4 . राइफल मैन संजय कुमार –                    परमवीर चक्र

ऐसे और भी बहुत सैनिक थे जिन्हे महावीर चक्र, वीर चक्र आदि पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।

 

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ऐसे थे महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद

नाम – आज़ाद
बाप का नाम – स्वतंत्र
घर कहाँ है – जेल


ये शब्द थे महान क्रांतिकारी श्री चंद्रशेखर आज़ाद (Chandrashekhar Azad) के जब उन्हें पुलिस ने गिरफ्तार किया गया और जब उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया और मजिस्ट्रेट ने उनसे पूछा।  तब वो महज 15 वर्ष के थे।

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दुश्मन की गोलियों का सामना हम करेंगे, आज़ाद हैं और आज़ाद ही रहेंगे – ये शब्द हैं देश के लिए अपना जीवन न्योछावर कर देने वाले चंद्रशेखर आज़ाद के।
ऐसे बहुत सारी बातें और कार्य हैं जिनसे लोगो के मन में देशभक्ति का जोश भर जाता है। पूरा देश चंद्रशेखर आज़ाद को नमन कर रहा है।

आज महान क्रन्तिकारी श्री चंद्रशेखर आज़ाद (Chandrashekhar Azad) से जुडी बहुत सारी प्रेरणा देने वाली कहानियाँ जानेंगे।
पर उस से पहले थोड़ा उनका जीवन परिचय जान लें। चंद्रशेखर आज़ाद देश के महानतम क्रांतिकारियों में से एक थे जिन्होंने न सिर्फ अपना जीवन देश के लिए न्योछावर किया बल्कि हजारो युवाओं को देश पर बलिदान के लिए प्रेरित किया और आज भी लोग उनके जीवन और कर्मों के बारे में जानकर प्रेरित होते हैं।

पर अफ़सोस आज हमारा देश उन्हें वो सम्मान नहीं दे पा रहा है जो उन्हें देना चाहिए।

चंद्रशेखर आज़ाद का जीवन परिचय

महज 25 वर्ष की आयु में देश के लिए बलिदान होने वाले चंद्रशेखर आज़ाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के भावरा नामक गाँव में इनका जन्म हुआ और जन्म के समय इनका नाम था चंद्रशेखर तिवारी। इनके पिता का नाम सीताराम तिवारी और माँ का नाम जगरानी देवी था। उनकी माँ की इच्छा थी की चंद्रशेखर आज़ाद संस्कृत के विद्वान बने, इसलिए वो चाहती थी की ये कशी जाकर संस्कृत और धार्मिक शिक्षा ले पर ये बात न तो चंद्रशेखर आज़ाद को मंजूर थी और न ही ईश्वर को। चंद्रशेखर आज़ाद के मन में कुछ और ही चल रहा था।  बचपन से ही चंद्रशेखर आज़ाद के मन में भारत में अंग्रेजों का शाशन खटकता था और उनके मन में हमेशा यही प्लानिंग चलती रहती थी की किस तरह से हमारा देश इन अंग्रेजों के चंगुल से आज़ाद होगा।
तभी देश में 13 अप्रैल 1919 में जलियावाला बाग हत्याकांड (Jaliawala Bagh Masacre) हुआ जिसमे करीब 1600 भारतियों को जनरल डायर (General Dayar) के आदेश पर गोलियों से भून दिया गया। अंग्रेजों की इस क्रूरता से पूरा देश उबाल रहा था और इस घटना ने आज़ाद के मन में गहरा ठेस पहुंचाया। इस घटना ने आज़ाद के मन के कोने में पड़ी क्रन्तिकारी विचार को उभारने का काम किया और 1921 में महज 15 वर्ष की आयु में चंद्रशेखर आज़ाद ने महात्मा गाँधी के असहयोग आंदोलन में भाग लिया। इस आंदोलन में कई देशभक्तों के साथ उन्हें भी गिरफ्तार किया गया और जब उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया और मजिस्ट्रेट ने उनसे पूछा
नाम – आज़ाद
बाप का नाम – स्वतंत्र
घर कहाँ है – जेल 
इस जवाब से मजिस्ट्रेट इतना क्षुब्ध हुआ की महज 15 वर्ष के बच्चे को 15 कोड़े मारने की सजा सुना दी। जब आज़ाद को कोड़े पड़ रहे थे तो एक आम बच्चे से उलट उनके मुँह से आह निकलने की जगह हर कोड़े के साथ ” भारत माता की जय ” निकल रहा था। इसी घटना के बाद उनके नाम के साथ आज़ाद शब्द जुड़ गया तथा उन्हें चंद्रशेखर आज़ाद बुलाया जाने लगा।
फिर अचानक १९२२ में महात्मा गाँधी ने असहयोग आंदोलन को वापस ले लिया। महात्मा गाँधी के इस कार्य ने देश में बहुत लोगो को अचंभित तथा निराश किया। उसमे चंद्रशेखर आज़ाद भी थे। अब इन्होने आंदोलनों का राष्ट त्याग कर क्रन्तिकारी रास्ता अपनाने का सोचा। अब इनकी मुलाकात मन्मथ नाथ गुप्ता (Manmath Nath Gupta) से हुई  जिनके माध्यम से चंद्रशेखर आज़ाद की मुलाकात रामप्रसाद बिस्मिल (Ramprasad Bismil) से हुई जो हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (Hindustan Republican Association) HRA के संस्थापक थे। रामप्रसाद बिस्मिल चंद्रशेखर आज़ाद बहुत प्रभावित हुए तथा उन्हें हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का सदस्य बना लिया।
और हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (Hindustan Republican Association) ने पैसे इकठ्ठा करने के लिए एक ट्रैन लूटने की योजना बनाई जिसको 9 अगस्त 1925 को काकोरी स्टेशन पर अंजाम दिया गया। इस घटना को हम काकोरी कांड (Kakori Kand) के नाम से भी जानते हैं। इस लूट कांड में बहुत क्रांतिकारियों ने भाग लिया जिनमे से कई पकडे गए पर चंद्रशेखर आज़ाद पुलिस की गिरफ्त से दूर रहे और वो अंग्रेजी शाशन के लिए सर दर्द बने रहे। फिर 1928 में आज़ाद ने भगत सिंह के साथ मिलकर हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (Hindustan Republican Association) को हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (Hindustan Socialist Republican Association) बना दिया। 1928 में जब लाला लाजपत राय की पुलिस की लाठियों से मृत्यु हो गयी तो क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों से इसका बदला लेने का प्राण किया और ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन सांडर्स की हत्या कर दी। इस घटना के बाद अंग्रेजी सरकार ने बहुत क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया पर आज़ाद अब भी पकड़ से बहार थे।  अब आज़ाद ने प्राण कर लिया था की न तो अंग्रेजो की पकड़ में आना है और न ही पुलिस की गोली से मरना है। 1931 में जब भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव जेल में थे और चंद्रशेखर आज़ाद अलाहाबाद में उनकी पैरवी क लिए थे। 27 फरवरी 1931 को जब चंद्रशेखर आज़ाद इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क (Alfred Park) में एक पेड़ के निचे बैठे थे तभी पुलिस को उनके वह होने की सुचना मिल गयी। उनकी सुचना पुलिस के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी। क्यूंकि जिनको पकड़ने के लिए पूरा अंग्रेजी शाशन लगा था और वो उनकी पकड़ से बहार था ऐसे में एक सुचना उनके लिए बहुत मायने रखती थी। उसके बाद पुलिस ने उस पार्क को चारो तरफ से घेर लिया।  
आज़ाद के पास हथियार के नाम पर महज एक पिस्तौल था जिस से उन्होंने पुलिस का डट कर मुकाबला किया और जब उनके पास सिर्फ एक गोली बच गयी तो उन्होंने उस गोली से खुद को मारकर अपना अंग्रेजो की पकड़ में नहीं आने का और पुलिस की गोली से न मरने का प्राण पूरा किया।
पर मरने के पहले चंद्रशेखर आज़ाद ने कई पुलिस वालो को मारा। उनकी इतनी दहशत थी की उनके मरने के घंटों बाद भी किसी पुलिसवाले और गोरे अंग्रेज की हिम्मत नहीं हुई की उनके शव के पास जा सके। घंटों बाद उनके शव को हिला डुला कर उनकी मृत्यु सुनिश्चित करने के बाद ही उनके शव को हटाया गया। ये था महान क्रन्तिकारी चंद्रशेखर आज़ाद का संक्षिप्त जीवन परिचय। उनके जीवन से प्रेरणा लेने के लिए हमारे पास बहुत ही कहानियां हैं जिनमे से कुछ के बारे में आज बात करते हैं। 

आज़ाद के पिस्तौल की कहानी Story of Azad’s Pistol

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Colt कम्पनी की इस पिस्टल को तो बहुत लोग पहचानते होंगे लेकिन बहुत सारे लोग 0. 32 बोर की कोल्ट पिस्टल के भारत आने की कहानी नहीं जानते होंगे।
1970 के आसपास कुछ लोगों ने उसे तलाशना शुरू किया। इलाहाबाद के सरकारी मालखाने से पता चला कि वह पिस्तौल उस अधिकारी जिसने चंद्रशेखर आज़ाद को उस पार्क में घेरा था यानि नॉट बाबर को इंग्लैंड जाते समय भेंट में दे दी गई थी। तब नॉट बाबर से पत्राचार कर पिस्तौल की मांग की गई। इलाहाबाद के आयुक्त मुस्तफी ने नॉट बाबर को खत लिखा था। नॉट बाबर ने कोई उत्तर नहीं दिया। इसके बाद भारतीय उच्चायोग से हस्तक्षेप करने का आग्रह किया गया। इंग्लैंड में तैनात भारत के उच्चायुक्त ने नॉट बाबर से पिस्तौल लौटाने का आग्रह किया। कुछ ना-नुकुर के बाद नॉट बाबर पिस्तौल लौटाने को राजी हो गया, लेकिन उसने एक शर्त रखी। कहा कि उसके पास भारत सरकार अनुरोध पत्र भेजे, जिसमें आजाद के शहादत स्थल पर आज़ाद की मूर्ति लगाकर उसकी फ़ोटो भेजे तभी वो आज़ाद की पिस्तौल वापस करेगा। ऐसा किया गया तब जाकर उस अधिकारी ने वो पिस्तौल इंडिया को वापस की। मतलब वो अंग्रेज अधिकारी जानता था कि हम भारतीय अपने देश के असली हीरोज़ के लिए कितने सीरीयस हैं…

आज़ाद और उनका फोटो Azad and his Photograph


आज हम चंद्रशेखर आज़ाद का एक रोबदार फोटो जिसमे उनकी हाथों में पिस्तौल है और वो अपने मूछों पर बड़ी शान से ताव दे रहे हैं, देखते हैं। उस फोटो के पीछे भी एक कहानी है। क्या वो कहानी आप जानते हैं? वो फोटो कब और किसके द्वारा लिया गया था और उसके बाद आज़ाद की क्या प्रतिक्रिया थी?

आज़ाद उस फोटो को नष्ट करना चाहते थे। जी हाँ। आपने बिलकुल सही सुना।


आज़ाद एक क्रन्तिकारी थे और उनकी कोई भी पहचान पुलिस के पास नहीं थी और वो नहीं चाहते थे की उनकी फोटो अंग्रेजी शाशन के हाथ लगे। वो अपनी पहचान हमेशा छुपा के रखना चाहते थे।
अब आपके मन में एक सवाल आ रहा होगा की फिर उनकी तस्वीर ली किसने और वो अपनी तस्वीर खिचाने के लिए राजी कैसे हुए?


दोस्तों इसके पीछे की कहानी बहुत दिलचस्प है। 


काकोरी कांड के बाद जब आज़ाद और बाकि क्रांतिकारी भूमिगत हो गए थे तब आज़ाद अपने मित्र रूद्र नारायण (Rudra Narayan) के घर झाँसी में रह रहे थे। वहाँ रूद्र नारायण ने चंद्रशेखर आज़ाद को ये तस्वीर खिंचवाने के लिए राजी किया था। पहले तो आज़ाद बिलकुल राजी नहीं थे क्यूंकि वो नहीं चाहते थे कि किसी भी तरह से उनकी तस्वीर पुलिस के पास पहुंचे। उनका मानना था कि न तो उनकी तस्वीर रहेगी और न ही पुलिस के पास पहुंचने का खतरा रहेगा। अंततः वो अपने मित्र की बात मन कर तस्वीर खिंचवाने के लिए राजी हो गए। पर तस्वीर खिंच जाने के बाद उनको लगा की उनसे गलती हो गयी है, उन्हें अपनी तस्वीर नहीं खिंचवानी चाहिए थी। वो उस तस्वीर को नष्ट करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने अपने मित्र और क्रांतिकारी विश्वनाथ वैशम्पायन (Vishwanath Vaishampayan) को रूद्र नारायण के पास तस्वीर नष्ट करवाने के लिए भेजा। रूद्र नारायण ने कहा की उन्हें आज़ाद के अंदेशा और मामले की गंभीरता की समझ है। ये तस्वीर उन्होंने इस लिए लिया है की जब आगे की पीढ़ी आज़ाद के बारे में पढ़े, उनके गौरव गाथा के बारे में जाने तो उनके पास कुछ ऐसा रहे जिस से वो आज़ाद की अपने आप से जुड़ा महसूस कर सके। विश्वनाथ वैशम्पायन से रूद्र नारायण ने कहा की आप आज़ाद को बोल दें की तस्वीरें और नेगेटिव दीवार में चुनवा दी गयी हैं। इस तरह से आज हमारे पास आज़ाद की तस्वीर सुरक्षित बची है। 

Quotes of Shree Chandrashekhar Azad

  1. दूसरों को खुद से बेहतर करता हुआ न देखो, हर रोज अपना रिकॉर्ड तोड़ो क्यूंकि तुम्हारी लड़ाई बस तुम्हारे साथ है।
  2. मैं एक ऐसे धर्म में विश्वास करता हूँ जो स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा का प्रसार करती है।
  3. अगर आपके खून में उबाल नहीं है तो आपकी नसों में खून नहीं पानी दौड़ रहा है।
  4. एक जहाज जमीन पर सदैव सुरक्षित रहता है, पर ये जमीन पर रहने के लिए नहीं बना है। जीवन में ऊंचाइयों को प्राप्त करने के लिए हमेशा सार्थक जोखिम लेना चाहिए।
  5. ऐसी जवानी किसी काम की नहीं जो अपने मातृभूमि के काम न आ सके।

दोस्तों ये थी हमारे महान क्रन्तिकारी श्री चंद्रशेखर आज़ाद की प्रेरणादायी कहानी।

अगर आप भी इसमें अपना अनुभव जोड़ना चाहते हैं या कुछ और भी लिखने का शौक रखते हैं तो Mail Us at ” [email protected] “साथ में अपना परिचय एक फोटो के साथ भी भेजें। आपकी रचना आपके नाम और फोटो के साथ प्रकाशित की जाएगी।

किताबें पढ़ने के 6 चमत्कारिक फायदे

एक बार दुनिया के सबसे धनि व्यक्ति Bill Gates (Founder of Microsoft)  से पूछा गया की अगर आपको कोई एक सुपर पावर मिले तो आप क्या लेना चाहेंगे ? बिल गेट्स का जवाब था की Power to read Super Fast “मतलब किताबे बहुत जल्दी पढ़ने की शक्ति ताकि ज्यादा से ज्यादा किताबें पढ़ सके।

दुनिया में जितने भी सफल लोग हैं उन सबमे एक बात कॉमन है।  वो है पढ़ने की आदत। चाहे वो Bill Gates हो, Warren Buffett हो, Elon Musk हो, Facebook Founder Mark Zukerberg हो, स्वामी विवेकानंद या महात्मा गाँधी, सभी के जीवन में अध्ययन का बहुत बड़ा महत्व रहा है।

जैसा की हमारे देश में एक कहावत है की पढाई बेकार नहीं जाती। बिलकुल दोस्तों पढाई बेकार नहीं जाती। चाहे आप अपने  कोर्स मटेरियल को पढ़ा रहे हैं या व्यक्तित्व के विकास की पुस्तके।  
आप आप सोच रहे होंगे की बिल गेट्स को किताबें पढ़ने की क्या आवश्यकता है ? उनके पास तो अथाह पैसे हैं, वो चाहें तो दुनिया की किसी भी लक्ज़री का एन्जॉय कर सकते हैं। पर आप ये नहीं समझ पा रहे हो की बिल गेट्स के पास ये जो अथाह धन है इसमें उनकी पढ़ने की आदत का सबसे बड़ा योगदान है। उन्हें इन्ही किताबों से शक्ति मिलती है, ज्ञान मिलता है की वो सफलता की दिशा में कदम बढ़ाते रहें।
 

किताबें पढ़ने के बहुत अधिकफायदे हैं पर उनमे से 6 जबरदस्त फायदें जिनको मैनें भी महसूस किया है वो आपके सामने हैं क्यूंकि मैं सिर्फ अपने अनुभवों की साझा करना चाहता हूँ। अगर आप भी अपने अनुभव साझा करना चाहें तो स्वागत है। ब्लॉग पर कमेंट कर सकते हैं। और आपकी रचना प्रकाशित भी हो सकती है।

1.  दूसरों की गलतियों और अनुभवों से सीखना 2.  सकारात्मक ऊर्जा का संचार 3.  अच्छे लोगों का साथ 4.  मानसिक शांति और तनाव मुक्ति 5.  एकाग्रता की वृद्धि 6.  सोचने समझने की क्षमता का विकास

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दूसरों की गलतियों और अनुभवों से सीखना (Learn from other’s Mistakes and Experiences)

एक कहावत है की इंसान अपनी गलतियों से सीखता है पर क्या आपको नहीं लगता की अगर हर कोई सिर्फ अपनी हीं गलतियों और अनुभवों से सीखे तो उसकी पूरी उम्र निकल जाएगी और वो सफल नहीं हो पायेगा?

तो क्या किया जाये?

इसका सीधा उत्तर है की इंसान दूसरों की गलतियों और अनुभवों से भी सीखे? पर क्या ये भी कठिन नहीं है? आखिर इंसान किसकी गलतियों और अनुभवों से सीखे? जो सफल लोग हैं? तो उसको वो सफल लोग मिलेंगे कहाँ? हमारे संपर्क में कितने सफल लोग हैं जिनकी गलतियों से और अनुभवों से हम सीख सकते हैं?
नहीं हैं?

कोई बात नहीं। हमारे पास उनकी गलतियों और अनुभवों का निचोड़ है। उनकी लिखी किताबें जिसमे उनलोगो ने अपने जीवन की हर गलती, अच्छा अनुभव, बुरा अनुभव, सफलता, असफलता, उनलोगों ने जिन चीजों को सीखने के लिए बड़ी कीमत चुकाई हैं वो सारी बातें अपने द्वारा लिखी बुक्स में रख दी हैं।  

अगर अपने Robert T Kiyosaki द्वारा लिखी Book Rich Dad Poor Dad पढ़ा हो तो उसमे लेखक ने जो भी बातें हमें सिखाया है उसे खुद से सिखने में सालों लग जायेंगे और फिर भी जरुरी नहीं है की हम सीख ही जाएँ। 

अगर अपने Dale Carnegie की लिखी किताब “How to win friends and Influence people “पढ़ी हो तो आपको पता होगा की जो बातें आप उस किताब से दो दिनों में सीख सकते हैं वो कई लोग पूरी ज़िन्दगी नहीं सीख पाते। लोगो को दोस्त कैसे बनाना है और उन्हें प्रभावित कैसे करना है ये बातें उनके लिए बहुत सरल है जिनको इसका तकनीक पता है। पर क्या वो तकनीक सीखना आसान है? शायद नहीं जब तक कि आप उनलोगो के अनुभवों से नहीं सीखते जो इस कला में महारत हासिल किये हों। इसलिए किताबें पढ़ना शुरू करें।

अभी Rich Dad Poor Dad और How to win friends and influence People अमेज़ॉन से मंगा कर पढ़ें

 

बिल गेट्स (Bill Gates) के बुक पढ़ने के तीन तरीके

1. नोट्स बनाना (Notes Making)

2. बुक पूरी पढ़ें, अधूरा न छोड़ें (Read Book Completely)

3. रोज कम से कम एक घंटे पढ़ें। (Read at least one hour a day)

Some Quotes about Reading

  • A Reader lives thousand lives before he dies, The man who doesn’t read lives only one. George R R Martin
  • एक पाठक मृत्यु से पहले हजारों जिन्दगियाँ जीता है, पर बुक नहीं पढ़ने वाला केवल एक जिंदगी जीता है। George R R Martin (जॉर्ज आर आर मार्टिन)
  • A room without book is a body without soul. Marcus Tullius Ciero
  • बिना किताब का घर बिना आत्मा के शरीर के बराबर है।
  • Marcus Tullius Ciero (मार्कस टूलियस शियेरो)

सकारात्मक ऊर्जा का संचार (Flow of Positive Energy)

किताबें पढ़ने की आदत बना लेने से आपकी आतंरिक शक्ति मजबूत होती हैं। आपके आत्मविश्वाश में वृद्धि होती है। आपके मन से नकारात्मक विचार बहार निकलते हैं और सकारात्मक विचार भरता है। हमारा मष्तिष्क एक ऐसी जगह है जो खाली नहीं रह सकता। इसमें कुछ न कुछ भरना चाहिए। अब ये उस मस्तिष्क के मालिक पर यानि की आप पर निर्भर करता है की वो उसमे क्या भरना चाहता है ? कमजोरी या ताकत, नकारात्मक विचार या सकारात्मक विचार, मैं कर सकता हूँ का विचार या ये मुझसे नहीं होगा का विचार? अगर आप अच्छे लोगों के साथ रहें, अच्छे काम करें, अच्छी किताबें पढ़े तो मस्तिष्क में सकारत्मक ऊर्जा का संचार होगा और सकारत्मक शक्ति से भर जायेगा, फिर कोई भी कठिन से कठिन कार्य आपको कठिन नहीं लगेगा पर अगर आप बुरे लोगो की सांगत में रहते हैं, बुरे कार्य करते हैं, किताबें नहीं पढ़ते हैं तो आपके मस्तिष्क में नकारात्मक ऊर्जा भरी रहेगी जो आपके जीवन में नकारात्मक प्रभाव डालेंगी। 

अच्छे लोगों का साथ

हर कोई अपने साथ अच्छे लोगो को रखना चाहता है जो सकारात्मक सोच रखता हो, जिसको अपनी शक्ति पर विश्वास हो। जाहिर है आप भी सफल लोगों के बीच में रहना चाहते होंगे। क्या  कोई भी सफल इंसान आपको अपने साथ रखेगा जब तक की आप उसके या किसी के जीवन में वैल्यू ऐड करने की क्षमता नहीं रखते हो? आपको सफल होना है तो सफल लोगों की आदतें होनी चाहिए आपके अंदर। और अगर सफल लोगो की आदतें आप रखते हैं जैसे रोज किताबें पढ़ना तो आपको सफल लोगो का साथ मिलेगा और आप अपने जीवन में सफलता की नीत नई उचाईयों को छुएंगे। 

मानसिक शांति और तनाव मुक्त जीवन (Mental Piece and Stress Free life)

आप सोचो आपको क्या अच्छा लगता है? महापुरुषों की जीवनियां पढ़ना, मनोरंजन या कोई ऐसी बुक जिसको देख कर लगता है की आपको कुछ सीखने को मिलेगा? जो भी आपको पसंद हो आप पढ़ना शुरू करें। पढ़ते समय आप अपनी सारी थकान, तनाव भूल जायेंगे, एक अलग तरह की मानसिक शांति मिलेगी आपको। एक ऐसी शांति जो आपको कहीं नहीं मिलेगी। तो मानसिक शांति और तनाव मुक्ति के लिए पढ़ना शुरू करें।

एकाग्रता की वृद्धि (Focus and Concentration)

आप सोचो जब ऑफिस में काम करते हो तो एक साथ कितने काम करने पड़ते हैं? कंप्यूटर पर काम करना, फाइल्स संभालना, साथ में इमेल्स भी चेक कर लिया, थोड़ी चैटिंग भी कर ली और भी बहुत सारे काम। आपने कभी ध्यान दिया हो या नहीं इस से बहुत ज्यादा चिढ और तनाव महसूस होता है और एकाग्रता की शक्ति का ह्रास होता है। पर जब आप हाथ में किताब लेकर पढ़ने बैठते हैं तो आप किसी और कार्य के बारे में नहीं सोचते हैं। पूरी तरह से एकाग्र होकर उस किताब को पढ़ते हैं जो की आपकी आदत में शुमार होता है। इस से आपकी एकाग्रता की शक्ति बढ़ती है।

सोचने समझने की क्षमता का विकास

भगवान ने इंसानों को सोचने समझने की शक्ति दी है जो की हमें भगवान के द्वारा बनाये गए हर जीव से अलग करता है। पर हर इंसान सोचने समझने की शक्ति असीमित होती है पर हमारा दिमाग उस स्तर तक सोच नहीं पाता जितनी उसकी क्षमता है। कहते हैं की एक इंसान अपने दिमाग की क्षमता का सिर्फ 2 से 3 प्रतिशत का ही उपयोग कर पाता है बाकि क्षमता बेकार चली जाती है। ऐसा क्यों होता है ? क्योंकि हमारे दिमाग में नकारात्मक विचार भरे होते हैं। क्षमता को पहचान ही नहीं पाते। आपके स्वस्थ शरीर के लिए अच्छी खुराक की जिस तरह से आवश्यकता होती है उसी तरह आपके स्वस्थ मस्तिष्क के लिए भी अच्छी खुराक की आवश्यकता है। और उन खुराकों में से एक है अच्छी अच्छी किताबें पढ़ना।किताबें पढ़ने की आदत हमें हमारे क्षमता से परिचय कराती हैं और हमारे सोचने समझने की शक्ति बढ़ जाती है।

 

अगर आपको भी किताबें पढ़ने की आदत है और आप इसमें अपना अनुभव जोड़ना चाहते हैं या कुछ और भी लिखने का शौक रखते हैं तो Mail Us at ” [email protected] “साथ में अपना परिचय एक फोटो के साथ भी भेजें। आपकी रचना आपके नाम और फोटो के साथ प्रकाशित की जाएगी।

 

भाई बहन का प्यार राखी का त्यौहार

हम सभी रक्षा बंधन की तैयारी में लगे  हुए हैं। इस साल रक्षा बंधन 3 अगस्त को मनाया जायेगा। इस दिन बहन और भाई का उत्साह देखते बनता है। बहनें भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर भाइयों से अपनी रक्षा वचन लेती हैं। पर क्या आपको रक्षा बंधन पर्व के महत्व, शुरुआत आदि के बारे में पता है ? इसका महत्व क्या है? ये कब मनाया जाता है ? यह पर्व क्यों मनाया जाता है? इसके पीछे की कहानी क्या है ? इसकी शुरुआत कैसे और कब हुई थी? आज हम इसी बात का जिक्र करते हैं।

Rakhi Thali http://Photo by Deepali Phadke from Pexels

रक्षा बंधन कब मनाया जाता है?

रक्षा बंधन सावन के समापन के साथ पूर्णिमा के दिन मनाया जाता जाता है।
वर्ष 2020 के रक्षा बंधन का मुहूर्त
इस वर्ष सावन का समापन 3 अगस्त को हो रहा है यानि सावन की पूर्णिमा  अगस्त को है जिस दिन प्रति वर्ष रक्षा बंधन का पावन पर्व मनाया जाता है।
रक्षा बंधन – 3 अगस्त 2020.
राखी बांधने का मुहूर्त : 09:27:30 से 21:11:21 तक
अवधि : 11 घंटे 43 मिनट
रक्षा बंधन अपराह्न मुहूर्त : 13:45:16 से 16:23:16 तक
रक्षा बंधन प्रदोष मुहूर्त : 19:01:15 से 21:11:21 तक 

रक्षा बंधन के पीछे की कहानियाँ

हमारे हर पर्व त्यौहार के पीछे कोई न कोई कहानियाँ होती हैं। आखिर इस तरह महान  पर्व को मनाने की वजह क्या है ? इसकी शुरुआत कब हुई थी ? ये सारे सवाल आपके मन में भी तो आते होंगे ? भाई बहन के प्यार और पवित्र रिश्तों को सँभालते इस महान पर्व की शुरुआत करीब 6000 वर्ष पूर्व हुई थी।
रक्षा बंधन मनाने के पीछे कई कहानियाँ प्रचलित हैं।  इनमे से कुछ मुख्य इस तरह से हैं।

द्रौपदी और भगवान कृष्णा की कहानी

इस बारे में भी दो कहानियाँ प्रचलित हैं। एक जब भगवान श्री कृष्णा ने शिशुपाल के वध करने के लिए सुदर्शन चक्र  छोड़ा था तब  भगवान श्री कृष्णा की ऊँगली कट गई थी और उसमें से खून निकलने था। चूकिं द्रौपदी भगवान श्री कृष्णा को दिल से भाई की तरह प्यार करती थी तो उनसे ये देखा नहीं गया। तुरंत उन्होनें अपने साड़ी का पल्लू में से कपडे को काटकर भगवान की कटी ऊँगली बांध दी जिससे खून बहना बंद हो गया। कहा जाता है तभी भगवान श्री कृष्णा नें द्रौपदी के रक्षा का प्रण लिया। और जब द्रौपदी  चीरहरण हो रहा था भगवान श्री कृष्णा नें उनकी रक्षा की। दुशाशन द्रौपदी का साड़ी खींचता गया और भगवान साड़ी बढ़ाते गए। 
द्रौपदी  से जुडी रक्षा बंधन  कहानी है जिसमे एक भगवन श्री कृष्णा की ऊँगली कट जाती है तो सत्यभामा और रुक्मिणी जैसी रानियाँ  हैं कपड़ा लेने के लिए दौड़ पड़ी ताकि ऊँगली को बांध कर रक्त के बहाव  रोका जा सके। पर द्रौपदी ने  अपनी साड़ी में से कपड़ा फाड़ कर भगवान की बाँधी जिससे प्रसन्न होकर और जिसका ऋणी होकर भगवान ने चीरहरण से द्रौपदी को बचाकर ऋण  उऋण हुए। 

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महभारत के युद्ध में महाराज युद्धिष्ठिर द्वारा सैनिकों को रक्षा सूत्र बांधना 

महाभारत का युद्ध शुरू होने  था। महाराज युधिष्ठिर चिंता और निराशा में डूबे हुए थे।  भगवान श्री कृष्णा नें चिंता का कारण पूछा तो युधिष्ठिर ने बताया की युद्ध में हार जीत को लेकर आशंकित हैं। एक तरफ कौरवों की विराट सेना और बड़े बड़े योद्धा  जैसे पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य, कर्ण इत्यादि सेनापति  तरफ हमारी छोटी सी सेना। इस पर  भगवान श्री कृष्णा ने एक एक सैनिक की हाथों में रक्षा सूत्र बांधने का सुझाव दिया तथा धर्मराज युधिष्ठिर ने वो रक्षा सूत्र सैनिकों की कलाइयों में बांधा। फिर महाभारत के युद्ध में क्या हुआ, किसकी जीत और किसकी हार हुई ये छुपा नहीं है। 

राजा बलि और देवी लक्ष्मी

जब राजा बलि (भक्त प्रह्लाद के पोते)  शक्तियाँ  बहुत अधिक बढ़ गयी और देवों को युद्ध में पराजित होना पड़ा तो देवराज इंद्रा को चिंता हुई। (आपको पता होना चाहिए की देवराज इंद्रा का पद स्थायी नहीं है। कोई भी अपने सद्कर्मों से देवराज का पद प्राप्त कर सकता है ) देवराज भगवान विष्णु की शरण में गए। भगवन विष्णु वामन अवतार लेकर राजा बलि के दरबार में गए  और बलि से दान में तीन पग जमीन माँगा। राजा बलि बहुत बड़े दानवीर थे और फिर सोचे कि एक वामन तीन पग में कितनी जमीन ले सकता है ? बोले महाराज ये क्या मांग दिया आपने? कुछ बड़ी चीज मांगो। धन दौलत, सोना चाँदी, आभूषण, वस्त्र इत्यादि, पर भगवान ने बस तीन पग जमीन ही माँगा। बलि की स्वीकारोक्ति के बाद भगवान विष्णु अपने असली रूप में आ गए और एक पग में आसमान और दूसरे पग में पृथ्वी को माप दिया।  जब तीसरे पग की बारी आयी तो कुछ बचा ही नहीं था। पर राजा बलि इतने बड़े दानवीर थे की उन्होंने तीसरा पग अपने सर पर  लिया जिससे की उन्हें पृथ्वी छोड़कर पाताल लोक में जाना पड़ गया। अब भगवान विष्णु इतने बड़े दानवीर और भक्त को अकेला कैसे छोड़ सकते थे? उन्होनें उनकी रक्षा करने  निश्चय किया जब तक की राजा बलि को इंद्रा की गद्दी न मिल जाये। भगवान विष्णु उनके द्वारपाल बनकर रहने लगे। इस बात से वैकुण्ठ लोक में बैठे देवी लक्ष्मी चिंतित हो गयी। उन्होनें अपने पति को पाने के लिए एक ब्राह्मण स्त्री रूप  धरा और राजा बलि के पास पहुँच गयी और कहा की उनके पति एक लम्बी यात्रा पर गए हैं  और रहने के लिए एक स्थान की माँग की। राजा बलि नें उन्हें सच्चे मन से अपने घर में रखा तथा अपने बहन की तरह सुरक्षा प्रदान की। देवी लक्ष्मी के आने के बाद राजा बलि के घर में रौनक आ गई तथा घर धन दौलत और खुशियों से भर गया। फिर एक दिन सावन की पुर्णिमा के दिन राजा बलि को एक रक्षा सुत्र बांधा तथा अपनी खुशी और रक्षा का वचन लिया। इस बात से प्रसन्न होकर राजा बलि नें कोई भी मांग पुरी करने का वचन दिया। देवी लक्ष्मी नें द्वारपाल के रूप में खड़े भगवान विष्णु को मांगा। राजा बलि को बहुत आश्चर्य हुआ तभी देवी लक्ष्मी और भगवान विष्णु अपने असली रूप में आए। राजा बलि अपने दानवीर होने के लिए जाने जाते हैं इसलिए उन्होंने भगवान विष्णु को देवी लक्ष्मी को सौंप दिया। तभी से ये भाई बहन के प्रेम का पर्व मनाया जाता है।

अपने भाई को डिज़ाइनर राखी भेजेँ

इसीलिए रक्षा सूत्र बांधते वक्त इस मंत्र का जाप किया जाता है

” ॐ येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:। तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।

अर्थात जिस रक्षासूत्र से महान शक्तिशाली राजा बलि को बांधा गया था, उसी सूत्र से मैं तुम्हें बांधता हूं। 

रक्षाबंधन का ऐतिहासिक महत्व

महान नोबेल पुरस्कार विजेता गुरुदेव रविन्द्र नाथ टैगोर नें सन 1905 में बंगाल विभाजन के समय रक्षाबंधन पर्व को जनांदोलन बना दिया था। उन्होंने हिन्दू मुस्लिम एकता के लिए और बंगाल विभाजन के विरोध में हिन्दु औरतों से मुस्लिम पुरुषों को तथा मुस्लिम स्त्रियों से हिन्दू पुरुषों को राखी बंधवाया।  

Gift for your Brothers or Sisters

इस रक्षा बंधन बहनों से निवेदन है की वो इस बार भाई को राखी बांधते समय सिर्फ अपने रक्षा का वचन न लें, बल्कि भाई से पूरी स्त्री जाति के सम्मान करने का वचन लें।

 

अगर आपको रक्षा बंधन या किसी और पर्व त्यौहार के बारे में विशेष जानकारी है जो आप हमसे शेयर करना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। वो कहानी आपके नाम और फोटो के साथ प्रकाशित की जाएगी। साथ ही अपना परिचय और एक फोटो भेजे। Mail Us at ” [email protected]