प्रधानमंत्री जी , लॉकडाउन में मर रहे मजदूरों पर देश जवाब मांग रहा है

प्रधानमंत्री जी जब आपने राष्ट्र के नाम संदेश में लाॅकडाउन की घोषणा की थी तो क्या आपको नहीं पता था कि पुरे देश में लोग इधर-उधर फंसे हुए हैं? वो कैसे रहेंगे, कैसे जिएंगे लाॅकडाउन में? देश के विभिन्न स्थानों में फंसे ए लोगों में हर तरह के लोग हैं।

कुछ अमीर हैं जिन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि वो कहाँ हैं। वो जहाँ हैं आराम से हैं।

कुछ मध्यम वर्ग के लोग हैं जिनके पास इतना पैसा है कि कुछ महीनों तक बिना कमाए खा सकते हैं और रह सकते हैं। पर ये उनका बिना कमाए रहना उनके जीवन पर नकारात्मक प्रभाव डालेगा।

और कुछ ऐसे हैं जो गरीब की श्रेणी में आते हैं। किसी फैक्ट्री में मजबूती से मजदूरी करते हैं। रोज कमाते हैं और खाते हैं। और अगर माहवारी भी कमाते हैं तो उनकी बचत इतनी नहीं होती कि वो दस दिन भी घर बैठे खा सकें।

ये ऐसे लोग हैं जिनके सामने दोहरी मार है। एक तरफ कोरोना और दुसरी तरफ भुखमरी। अगर वो किसी तरह अपने घर पहुच जाते तो कुछ दिन बिना कमाए खा भी लेते पर ये दिल्ली मुंबई जैसे महानगरों में ये संभव नहीं था जहाँ कदम कदम पर पैसों की आवश्यकता है।

कोई अपने बच्चों को कोरोना से मर जाने पर संतोष कर लेगा पर भुखमरी से मरने पर नहीं। उसके लिए उसके परिवार का भुख से मरना उसके पौरुष पर धब्बा है। वर्ना ऐसे हीं कोई हजार किलोमीटर पैदल नहीं चलता। बीबी बच्चों को लेकर साईकिल से हजारों किलोमीटर की दूरी तय नहीं करता।
क्या इतनी छोटी सी बात सरकार में बैठे लोगों को समझ नहीं आई? अरे आप लोग नेता बाद में पहले इंसान तो हैं। क्या रात में सो पाते हैं ये देखते हुए भी कि लोग अपनी जान बचाने के लिए जान दे रहे हैं?
जब लाॅकडाउन किया गया देश में, जब सारी ट्रेनें बन्द हुई तभी ये श्रमिक स्पेशल ट्रेनें ( जो आज चलाई जा रही हैं ) चलाकर सभी लोगों को अपने-अपने घर पहुंचा दिया गया होता। उस समय उन गरीब लाचार लोगों के पास टिकट के पैसे भी होंगे। आज जो लोग 5,5 हजार रुपये देकर अपने घरों को आ रहे हैं, उनमें से कितने लोगों नें उन 5 हजार रुपयों के लिए क्या क्या किया होगा, कौन सी अपनी प्यारी चीजें बेची होंगी इसका अंदाजा आप कैसे लगा सकते हैं? ये गरीब अपने घरों में दोनों मार से सुरक्षित हो जाते। भुख से भी और कोरोना से भी।
जितने भी लोग अपने घरों के लिए निकले पर घर नहीं पहुंच पाए उसका जिम्मेदार कौन है? उनकी मृत्यु दुर्घटना नहीं है बल्कि हत्या है।
जब आपको पता है कि देश में करोड़ों लोग अलग अलग स्थान पर रहते हैं तो उन्हें उनके घरों तक सुरक्षित पहुंचा देने से वो शहर भी सुरक्षित हो जाते जहाँ ये लोग फंसे हुए थे तो क्या प्रोब्लम थी उन्हें सही समय पर पहुंचाने में?
आज भी बस राजनीति हीं क्यों हो रही है? जो भी कार्य हो रहे हैं उनका रिजल्ट क्यों नहीं दिख रहा है? ट्रेन में मजदूरों से पैसे लिए जा रहे हैं या नहीं इसका कोई क्लियर पिक्चर हमलोगों के सामने क्यों नहीं आ रहा है? हम किस दौर में जी रहे हैं जहाँ सही सुचना किसी के पास पहुंच हीं नहीं रहा है? कहने को तो हम सुचना क्रांति के दौर में जी रहे हैं जहाँ हर सुचना बस एक क्लिक दूर है, पर क्या हमारे पास सही सुचना पहुंच रही है? नहीं। दोनों तरफ ( सत्ता और विपक्ष के बीच ) हो राजनीती में कर रह गए हैं। हमारे पास सच क्या है इसकी जानकारी पहुंच हीं नहीं पा रही है। कभी लगता है सरकार सही ढंग से काम नहीं कर रही है ( जो की सच्चाई है ) और और कभी विपक्ष भी बहुत ही घटिया राजनीती करता नजर आता है।

जो घटनाएं हमे हृदय विदारक लगती हैं वो आप लोगों को विचलित क्यों नहीं करती?

एक लड़की हजारों किलोमीटर साईकिल से आती है अपने बीमार पिता को लेकर। एक माँ अपने बच्चे को ट्राली बैग के उपर रख के लाती है।

एक दिव्यांग ( जिसे कि दिव्यांग नाम तो आप हीं नें दिया था प्रधानमंत्री जी, वर्ना हम तो विकलांग कहा हीं करते थे) दिल्ली से आगरा अपनी बनाई गाड़ी से पहुंचता है, ( अब बताईए प्रधानमंत्री जी कि वो दिव्यांग कहाँ सुरक्षित था? कोरोना से भी और भुखमरी से भी? अपने घर में या दिल्ली में? )

एक स्त्री चलते चलते रास्ते में बच्चे को जन्म देती है और फिर उठ कर चलने लगती है। ये सोचकर हीं हृदय विचलित हो जाता है। जब वो बच्चा बड़ा होगा तो उसके मन में अपने देश और सरकार के बारे में क्या इंप्रेशन पडे़गा?

हमारा देश वेलफेयर स्टेट ( लोक कल्याणकारी राज्य ) है अब तो ये सोच भी बेमानी लगती है। क्या किया हमनें लोक कल्याण के लिए? हमें भारतीय होने पर गर्व है पर अब तो कभी कभी भारत में होनें पर शर्म भी आ जाती है। किसी तरह से दिल को समझाते हैं कि नहीं शर्म नहीं आनी चाहिए। कसम से अगर शुरुआत में गरीबों के लिए ट्रेनें चलाकर आपने उन्हें घर पहुंचा दिया होता और उनसे टिकट के पैसे भी ले लिए होते तो वो खुशी-खुशी दे देते। आप समझ सकते हैं कि कितनी जानें बच जाती और देश में कोरोना संक्रमण भी कम होता। अगर उन्हें घर नहीं पहचाना था तो हर राज्य सरकारें उनके रहने खाने का व्यवस्था कर सकती थी। अगर किसी नें नहीं किया तो उनके गृह राज्य को ये जिम्मेदारी लेनी चाहिए थी। पर ना तो केंद्र सरकार जिम्मेदारी लेगी ना राज्य सरकारों तो आखिर कोई क्या करेगा? मरेगा या जब तक जिंदा है तब तक बचने का उपाय करेगा? वहीं लोग कर रहे हैं। लोगों के बारे में सरकारें सोचे या ना सोचे पर लोग अपने बारे में तो जरूर सोचेंगे।
जै हिन्द। वन्दे मातरम।