सी बी आई क्या है और कैसे काम करता है? पूरी जानकारी हिंदी में।

दोस्तों जब से सुशांत सिंह राजपूत के आत्महत्या की खबर आयी है तभी से देश में एक उबाल है। लोग ये मानने के लिए तैयार ही नहीं हैं सुशांत सिंह राजपूत जैसे खुशमिजाज, सफल अभिनेता आत्महत्या भी कर सकता है। पहले इसकी जाँच मुंबई पुलिस कर रही थी। फिर सुशांत के पिता ने गर्लफ्रेंड रिया चक्रवर्ती के खिलाफ पटना में FIR कर दिया। तब से बिहार पुलिस भी जाँच में लग गयी। पर बिहार पुलिस को जाँच कार्य में मुंबई पुलिस का सहयोग नहीं मिला। उलटे बिहार पुलिस के एक तेज तर्रार IPS Officer विनय तिवारी को Quarantine कर दिया गया। 

तब से बिहार और महारष्ट्र पुलिस के बिच विवाद खुल कर सामने आ गया। इधर बिहार सरकार ने CBI Investigation (जाँच) की  सिफारिश कर दी। 

अब प्रश्न ये उठता है की CBI क्या है? CBI जाँच कैसे करती है? CBI की स्थापना कब और कैसे हुई? CBI कब और किसके आदेश पर जाँच कर सकती है? आदि। 

कोशिश  करता हु कि आपके सभी सवालों का जवाब आज इस आर्टिकल में मिल जायेगा। 

CBI Logo

# CBI क्या है?

CBI यानि Central Bureau of Investigation (केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो) देश की सबसे बड़ी जाँच एजेंसी है। इसके जाँच के दायरे में पहले केवल केंद्र सरकार के कर्मचारी और अधिकारियों के भ्रस्टाचार के  मामले  आते थे। फिर सरकारी उपक्रमों के कर्मचारियों के भ्रष्टाचार के मामले की जाँच भी आने लगे। 

1969 में बैंकों के राष्ट्रीयकरण (Nationalisation of Banks) के बाद सरकारी बैंक के कर्मचारी और अधिकारी भी CBI के जाँच के दायरे में आ गए। 

संस्थापक महानिदेशक (Founder Director)

CBI  के संस्थापक महानिदेशक D. P. Kohli थे। ये 1 अप्रैल 1963 से 31 मई 1968 तक CBI के निदेशक रहे। इसके पहले 1955 से 1963 तक SPE (Special Police Establishment) के पुलिस महानिरीक्षक रहे। 

इन्हें 1967 में विशिष्ट सेवाओं के लिए पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

#CBI का इतिहास 

1941 में भारत के ब्रिटिश सरकार को दूसरे विश्व युद्ध के दौरान रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार के मामलों की जाँच पड़ताल के लिए SPE यानि Special Police Establishment की  स्थापना की। SPE भारत सरकार के आपूर्ति विभाग के साथ मिलकर  कार्य करता था। जो की युद्ध विभाग के अधीन था। 

दूसरे विश्व युद्ध के बाद सरकार को  केंद्र सरकार के कर्मचारियों और अधिकारीयों में रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार के मामलों की जाँच के लिए एक केंद्रीय जाँच एजेंसी की आवश्यकता महसूस हुई। 

1946 में Delhi Special Police Establishment Act  बना जो गृह मंत्रालय (Home Ministry) के अधीन था। 

इसके अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत केंद्र सरकार के सभी विभाग आते थे।  तथा इसका विस्तार संघ शाषित प्रदेशों (Union Territories) तक भी था। इसका विस्तार सम्बंधित राज्य सरकारों की सहमति से राज्य तक भी हो सकता था। 

1963 में गृह मंत्रालय के 1 अप्रैल 1963 के संकल्प के जरिये Delhi Special Police Establishment को  CBI नाम दिया गया। 

शुरुआत में CBI का कार्य सिर्फ केंद्र सरकार के कर्मचारियों  अधिकारीयों के भ्रष्टाचार के मामले की जाँच करना था। बाद में इसमें सरकारी क्षेत्र के उपक्रमों के कर्मचारियों  अधिकारीयों के भ्रष्टाचार के मामले की जाँच करने का भी जिम्मा दे दिया गया। 

1965 में CBI को भ्रष्टाचार के अलावा हत्या, अपहरण, आतंकवाद और अन्य विशिष्ट अपराधों के जाँच का भी जिम्मा दे दिया गया। 

1969 में बैंकों के राष्ट्रीयकरण (Nationalisation of Banks) के बाद सरकारी बैंक के कर्मचारी और अधिकारी भी CBI के जाँच के दायरे में आ गए। 

शुरू में CBI में दो विंग काम करते थे। 

  1. सामान्य अपराध विंग (General Offences Wing) जिसके  अंतर्गत सरकारी  अधिकारीयों के साथ साथ सरकारी उपक्रमों में व्याप्त भ्रष्टाचार का जाँच करना था। इसकी शाखा हर राज्य में है। इसका कार्यालय हर राज्य  में है। 
  2. आर्थिक अपराध विंग (Economic Offences Wing) जिसका काम आर्थिक राजकोषीय  उल्लंघन का जाँच करना था। इसका कार्यालय चारो महानगरों (दिल्ली, कोलकाता, मुंबई और चेन्नई) में है। 

1987 में CBI में दो जाँच विभाग बनाये गए। 

  1. भ्रष्टाचार निरोधक विभाग (Anti Corruption Division)
  2. विशेष अपराध विभाग (Special Crime Division)
#CBI महानिदेशक (CBI Chief) 

CBI एक महानिदेशक के अधीन काम करती है। जिसकी नियुक्ति प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली एक चयन समिति करती है। चयन समिति में दो और सदस्य होते हैं। एक विपक्ष का नेता और दूसरा भारत के मुख्य न्यायाधीश। मुख्य न्यायाधीश की अनुपस्थिति में सुप्रीम कोर्ट के कोई अन्य न्यायाधीश। 

Lokpal and Lokayukta Act 2013  के आने के पहले CBI के महानिदेशक का चुनाव CVC (Central Vigilance Commission) द्वारा किया जाता था। 

गृह मंत्रालय वरिष्ठता और अनुभव के आधार पर अधिकारीयों  की एक सूची कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग यानि DOPT यानि Department of Personel and Training को भेजता है। इस सूची को DOPT चयन समिती को भेजता है। उनमे से चयन समिती CBI Director यानि CBI Chief नियुक्त करती है। 

#कार्यकाल

CBI निदेशक का कार्यकाल 2 साल का होता है। 

इसे चयन समिती के फैसले के बगैर सरकार न तो कार्यकाल काम कर सकती है और न ही पद से हटा सकती है। 

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#CBI अधिकारीयों की रैंक CBI Officers Rank 
  1. Director 
  2. Special Director/Additional Director 
  3. Joint Director 
  4. Deputy Inspector General of Police 
  5. Inspector 
  6. Sub Inspector 
  7. Assistant Sub Inspector 
  8. Head Constable 
  9. Constable 

#CBI जाँच कैसे होती है? (CBI Janch Kaise Hoti Hai)

CBI किसी भी मामले की जाँच तीन तरीकों से कर सकती है।

Delhi Special Police Establishment Act का Section 5 CBI को पुरे देश में कहीं भी जाँच करने का पावर देता है। पर उसी Act का Section 6 किसी राज्य में मामलों की जाँच करने के लिए राज्यों की सहमति की बात करता है।

1. मामला अगर केंद्र सरकार में भ्रष्टाचार का है तो केंद्र सरकार मामले की जाँच CBI को सौप सकती है।

मामला अगर राज्य के अंदर का हुआ जिसमे राज्य की पुलिस  अधिकारिता है तब राज्य सरकार केंद्र से CBI जाँच की सिफारिश करेगी तब केंद्र सरकार CBI को जाँच का जिम्मा सौपेगी।

2. राज्य के मामलों में CBI जाँच के लिए राज्य की सहमति आवश्यक है।

ये सहमति भी दो तरह की होती है।

  1. General Consent – ये  राज्य सरकार द्वारा दिया गया स्थायी सहमति है। इसके अनुसार CBI केंद्रीय कर्मचारियों द्वारा किये गए भ्रष्टाचार के मामलों जाँच  कर सकता है। भले ही वो किसी भी राज्य में हों।
  2. Case Specific Consent – ये सहमति राज्य सरकार किसी खास मामलों के जाँच के लिए देती है।

3. अगर सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट को लगता है की किसी खास मामले की जाँच CBI द्वारा की जानी चाहिए तो वो आदेश दे सकता है। इसमें राज्य सरकार के सहमति की आवश्यकता नहीं है।

उम्मीद है आपको CBI के बारे में ये जानकारी अच्छी लगी होगी।

महिलाओं की स्वतंत्रता और लैंगिक समानता के लिए हमारा कानून

महिलाओं के मुद्दे और स्वतंत्रता

कानून के अनुसार, भारतीय दंड संहिता 1860 (Indian Penal Code 1860) की Section 8 “लिंग” शब्द को सर्वनाम के रूप में परिभाषित करती है। इसका व्युत्पन्न किसी भी व्यक्ति, चाहे वो पुरुष हो या महिला, के लिए किया जाता है। 

पर क्या वास्तव में हमारे समाज में “लिंग” का मतलब है की महिलाओं को पुरुषों के सामान अधिकार मिला है?

भारतीय संविधान (Indian Constitution) में लैंगिक समानता का सिद्धांत अपने प्रस्तावना (Preamble), मौलिक अधिकारों (Fundamental Rights), मौलिक कर्तव्यों (Fundamental Duties) और नीति निदेशक सिद्धांतों (Directive Principle of State Policies) में निहित है। संविधान न केवल महिलाओं को सामान अधिकार प्रदान करता है बल्कि राज्य को महिलाओं के  पक्ष में भेदभाव को रोकने के लिए सकारात्मक उपायों को अपनाने का अधिकार भी देता है। फिर भी Gender Equality में कही न कही हम बहुत पीछे हैं। 

लैंगिक समानता (Gender Equality) न केवल एक मानव और मौलिक अधिकार है बल्कि  शांतिपूर्ण, समृद्ध और टिकाऊ दुनिया के लिए एक आवश्यक आधार है। 

विभिन्न क्षेत्रों में असामनता 

लड़के और लड़कियों के बीच लैंगिक असमानता उनके घरों और समाज में कदम कदम पर दिखाई देती है। पाठ्यपुस्तकों में, मीडिया में, यहाँ तक की उन वयस्कों में भी जो उनकी देखभाल करते हैं। 

  1. जनवरी में असमानता पर प्रकाशित Oxfam Report  से पता चलता है कि कार्यस्थल में महिलाओं को आज भी समान कार्य के लिए पुरुष समकक्षों 34 %  कम वेतन पर काम करना पड़ता है। महिलाओं को सामाजिक मान्यताओं और उनकी सुरक्षा को लेकर खतरे  के कारण देर रात तक काम करने की अनुमति नहीं है। 

                         2018 का #Me Too आंदोलन जो कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के विरुद्ध एक आंदोलन के रूप में शुरू हुआ, 2019 में कार्यस्थल पर लैंगिक असामनता के विश्लेषण में शामिल हुआ। इसमें न  असमानता शामिल है, बल्कि नेतृत्व में महिलाओं की उन्नति और प्रतिनिधित्व में बाधाएं भी शामिल हैं। 

2. विश्व बैंक के शोध के अनुसार 1 अरब से अधिक महिलाओं को घरेलु  यौन हिंसा या घरेलु  आर्थिक हिंसा के विरुद्ध क़ानूनी संरक्षण प्राप्त नहीं है। इन दोनों का महिलाओं की स्वतंत्रता में कामयाब होने और जीवित रहने की क्षमता पर महत्वपूर्ण प्रभाव है। 

सुप्रीम कोर्ट ने विशाखा दिशानिर्देश (Visakha Guidelines) तैयार किया जिसने देश भर के संस्थानों को कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न को रोकने और उनके निवारण के लिए उपाय करना अनिवार्य कर दिया। विशाखा दिशानिर्देशों ने कार्यस्थल (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013  में महिलाओं के यौन उत्पीड़न की नींव रखी।

  1. भारत जैसे देश में, लिंग वेतन अंतर के कारण थोड़े अधिक जटिल हैं और इसे सामाजिक आर्थिक से लेकर संरचनात्मक कारणों से जोड़ा जा सकता है।

बालिकाओं को कभी-कभी स्कूलों से बाहर रखा जाता है या उन्हें जल्दी स्कूल छोड़ने के लिए कहा जाता है। अगर वे शिक्षित हैं, तो भी कई महिलाओं को उनके परिवारों द्वारा काम करने की अनुमति नहीं है। जो महिलाएं कार्यबल में शामिल होती हैं, उन्हें अक्सर मातृत्व और बच्चे की देखभाल के लिए विस्तारित पत्तियां लेने की आवश्यकता होती है, और यहां तक ​​कि परिवार के अन्य सदस्यों की स्वास्थ्य देखभाल भी।

मातृत्व लाभ संशोधन अधिनियम,2017 महिलाओं के लिए विभिन्न अन्य सुविधाएं प्रदान की जाती हैं जैसे–

बढे हुए वेतन सहित प्रसूतिअवकाश: मातृत्व लाभ संशोधन अधिनियम ने महिला कर्मचारियों के लिए उपलब्ध मातृत्व अवकाश की अवधि को मौजूदा 12 सप्ताह से बढ़ाकर 26 सप्ताह कर दिया है।

घर से काम किये जाने का विकल्प

दत्तक और धात्री/कमीशनिंग माताओं के लिए प्रसूति अवकाश

शिशु गृह (क्रेच)की सुविधा

  1. स्वास्थ्य समस्या फिर से महिला प्रगति का एक चुनौतीपूर्ण हिस्सा है …मासिक धर्म एक चुनौतीपूर्ण अनुभव हो सकता है जो एक लड़की के जीवन को नाटकीय रूप से बदल देता है, और सांस्कृतिक प्रथाओं जो अनुष्ठान अशुद्धता के साथ मेल खाते हैं, इन परिवर्तनों को बढ़ाते हैं। मासिक धर्म की रस्म अशुद्धता की धारणा को वर्जनाओं और सांस्कृतिक प्रथाओं द्वारा सबसे अच्छा चित्रित किया गया है जो महिलाओं की दैनिक गतिविधियों को परिभाषित करना जारी रखते हैं।

कुछ समुदायों में, युवा लड़कियों को निर्देश दिया जाता है कि वे अपने मासिक धर्म के दौरान जल स्रोतों से दूर रहें क्योंकि वे इसे प्रदूषित कर सकती हैं।

सुप्रीम कोर्ट (एससी) के सात सदस्‍यों वाली बेंच को अपना सबरीमाला फैसला सुनाने का फैसला, जबकि अन्य धर्मों में लैंगिक समानता के मुद्दे को संबोधित करने के लिए विषय का दायरा बढ़ाना एक महत्वपूर्ण मोड़ है। ऐसे कई मंदिर हैं जहां महिलाओं को अभी भी अनुमति नहीं है और उन रीति-रिवाजों का पालन करना पड़ता है जो महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन करते हैं।।

  1. सबसे बड़ी समस्या लड़कियों से शुरू होती है। अधिकांश भारतीय लड़कियों के लिए किशोरावस्था में जीवन बदल जाता है, जो मासिक धर्म की शुरुआत में होता है।

अफसोस की बात है कि आज भी, मासिक धर्म के आस-पास की बातचीत वर्जित है। जिन लड़कियों ने बारहवीं तक मासिक धर्म शुरू कर दिया था, उनके स्कूल में बारह साल की उम्र में अपने साथियों की तुलना में बहुत कम थी। ये पैटर्न बताते हैं कि मासिक धर्म की शुरुआत स्कूली शिक्षा को प्रभावित करती है, और लड़कियों को स्कूल छोड़ने की अधिक संभावना होती है. अतः हम कहते हैं कि यह शिक्षा के लिए बाधा बन गया है।।।

  1. (मूक हिंसा खतरनाक) जब तक समानता नहीं होगी, तब तक महिलाएं हिंसा से मुक्त नहीं होंगी और जब तक हिंसा और हिंसा की धमकी उनके जीवन से समाप्त नहीं हो जाती, तब तक समानता हासिल नहीं की जा सकती है। ” इसलिए, इस लोकप्रिय संस्कृति को हाल ही में रिलीज़ की गई थप्पड़ जैसी फिल्म के साथ जोड़ने के लिए एक राहत है, जिसमें एक गृहिणी अपने पति को थप्पड़ मारने पर उसे तलाक देने का फैसला करती है। फिल्म यह भी पहचानती है कि इस तरह की हिंसा का महत्व कितना कम है, कई लोगों ने नायक को इसे जाने दो कहा,

क्योंकि यह सिर्फ एक थप्पड़ था। फिल्म यह समझाने का प्रयास करती है कि यह केवल एक ही थप्पड़ नहीं है – भले ही यह अस्वीकार्य होना चाहिए – लेकिन सब कुछ जो इस तरह की हिंसा की प्रतिक्रिया का प्रतीक है जो एक समस्या है। जब परिवार और दोस्त अधिनियम की हिंसा को कम करते हैं, तो यह न केवल प्रश्न में महिला के लिए हानिकारक है, बल्कि पूरे समाज के लिए ।।

 महिला सशक्तीकरण को बढ़ावा देने हेतु कानून

महिला सशक्तीकरण को बढ़ावा देने के लिए कानून, कानून और बिल बार-बार पारित किए गए। स्वतंत्र भारत के आगमन के बाद से, महत्वपूर्ण महिला विशिष्ट कानून जो पारित किए गए हैं:

अनैतिक यातायात (रोकथाम) अधिनियम, 1956

दहेज निषेध अधिनियम, 1961 (Dowry Prohibition Act 1961)

घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 से महिलाओं की सुरक्षा। (Protection of Women from Domestic Violence Act 2005)

महिलाओं के अधिकारों और कानूनी अधिकारों की सुरक्षा के लिए 1990 में संसद के एक अधिनियम द्वारा महिलाओं के लिए राष्ट्रीय आयोग की स्थापना की गई थी।

भारत के संविधान के 73 वें और 74 वें संशोधन (1993) में महिलाओं के लिए पंचायतों और नगर पालिकाओं के स्थानीय निकायों में सीटों के आरक्षण का प्रावधान किया गया है, जिससे उन्हें स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने में भागीदारी करने में मदद मिली है।

महिलाओं की उन्नति, विकास और महिलाओं के सशक्तीकरण के लक्ष्य के साथ 2001 में महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए राष्ट्रीय नीति निर्धारित की गई थी। इस नीति के उद्देश्यों में महिलाओं की स्वास्थ्य देखभाल, सभी स्तरों पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, करियर और व्यावसायिक मार्गदर्शन, रोजगार समान पारिश्रमिक, व्यावसायिक स्वास्थ्य और सुरक्षा पर समान पहुंच पर जोर दिया गया। इसने महिलाओं और बालिकाओं के खिलाफ भेदभाव और हिंसा के सभी रूपों को खत्म करने पर विशेष जोर दिया।

निर्भया प्रभाव के परिणामस्वरूप, संसद ने आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम 2013 पारित किया, जो भारतीय दंड संहिता, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, और आपराधिक प्रक्रिया संहिता में संशोधन का प्रावधान करता है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भारत सरकार को यौन उत्पीड़न के मुद्दे से निपटने के लिए कानूनी ढांचा प्रदान करने के 16 साल बाद, कार्यस्थल (निषेध, निवारण और निवारण) अधिनियम 2013 में महिलाओं के यौन उत्पीड़न को भी शामिल किया गया।

महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा के मामलों से निपटने के लिए पांच विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित किए गए थे। इसके अलावा, विभिन्न भारतीय शहरों में महिला

संकट हेल्पलाइन नंबर, 1091 शुरू किया गया। जबकि लैंगिक समानता पर केंद्रित नीतियों की वकालत करके जाति व्यवस्था को समाप्त करने और महिलाओं के बेरोजगारी को खत्म करने के सरकार के प्रयासों, यौन हिंसा के खिलाफ सरकार की विफलता, भ्रष्टाचार के कारण इन नीतियों को लागू करने में विफलता ने पितृसत्ता और वर्णव्यवस्था को बरकरार रखा है।

अतः संरचनात्मक हिंसा महिलाओं के खिलाफ एक दानव है जो समाज को खा रही है। यह अनादि काल से मौजूद है। इसका आधार पितृसत्ता की गहरी उत्कीर्ण धारणा में है। सांस्कृतिक मानसिकता को बदलने के लिए लोगों के साथ समाज की जड़ों पर बातचीत शुरू होती है। सरकारी एनजीओ और सबसे महत्वपूर्ण, इस हिंसा के पीड़ितों

के संयुक्त प्रयासों से, महिलाओं को इस अजगर से लड़ने के लिए एक बड़ा कदम उठाना होगा।

अबला नहीं है बिल्कुल नारी

संघर्ष रहेगा हमारी जारी।

 

National Recruitment Agency और Common Eligibility Test क्या है?

केंद्रीय कैबिनेट ने एक National Recruitment Agency स्थापित करने का फैसल लिया है जो Railway Recruitment Board (RRB), Staff Selection Commission (SSC) और Indian Banking Personnel Selection (IBPS) के परीक्षा के लिए एक Common Eligibility Test आयोजित करेगा। इन तीनो रिक्रूटमेंट एजेंसी के लिए प्रारंभिक परीक्षा बस एक एजेंसी NRA लेगी। जिससे छात्रों का समय, पैसा, श्रम सब कुछ की बचत होगी। National Recruitment Agency क्या है? कैसे काम करेगा? इसके फायदे क्या हैं? इसकी आवश्यकता क्यों थी? इन सारे प्रश्नों का उत्तर इस आर्टिकल में मिलेगा।

प्रति वर्ष करीब 1.25 लाख सरकारी नौकरियां RRB (Railway Recruitment Board), IBPS (Indian Banking Personal Selection)  SSC (Staff Selection Commission) आयोजित करती है जिसके लिए 2.5 से 3 करोड़ छात्र परीक्षा देते हैं।

अलग अलग पदों और नौकरियों के लिए छात्रों को अलग अलग परीक्षाएं देनी पड़ती हैं। इससे उन्हें तरह तरह की परेशनियां आती हैं।

सरकार ने इस परेशानी को  दूर करने का निर्णय लिया है।

केंद्रीय कैबिनेट ने छात्रों को अलग अलग सरकारी नौकरियों के लिए अलग अलग परीक्षाओं से निजात देने का फैसला किया है। इसके लिए कैबिनेट ने National Recruitment Agency की स्थापना करेगी जो एक Common Eligibility Test लेगी जिसका उपयोग विभिन्न सरकारी नौकरियों के प्रारंभिक परिक्षा के रूप में किया जायेगा।

National Recruitment Agency क्या है?

National Recruitment Agency एक स्वायत्त संस्था होगी जिसका काम सरकारी नौकरियों के लिए Common Eligibility Test कराना होगा। ये Indian Societies Act से रजिस्टर्ड होगा।

देश में करीब 20 ऐसी एजेंसी हैं जो सरकारी नौकरियों के लिए परीक्षाएं लेती हैं। National Recruitment Agency ने उनका काम आसान कर दिया है।

इसमें अभी केवल तीन एजेंसी के लिए परीक्षाएं लेने की जिम्मेदारी  दी जाएगी।

  1. RRB (Railway Recruitment Board)
  2. IBPS (Indian Banking Personal Selection)
  3. SSC (Staff Selection Commission)

आगे इसमें बाकि परीक्षाओं को भी शामिल किया जा सकता है।

National Recruitment Agency द्वारा एक आम पात्रता परीक्षा का आयोजन किया जायेगा। इसको Common Eligibility Test कहा जायेगा।

Common Eligibility Test प्रति वर्ष दो बार आयोजित किया जायेगा। इसका स्कोर तीन वर्ष तक मान्य रहेगा। मतलब एक परीक्षार्थी इस टेस्ट के स्कोर के आधार पर तीन वर्ष तक विभिन्न सरकारी नौकरियों के मुख्य परीक्षा के लिए आवेदन दे सकता है।

इस स्कोर  में सुधार के लिए आगामी परीक्षा में बैठ सकता है।

प्रत्येक जिले में एक परीक्षा केंद्र होगा।

परीक्षाएं अभी 12 अलग अलग भाषाओँ में होगी जिसको बाद में भारतीय संविधान के आठवीं अनुसूची (8th Schedule of Indian constitution) मे शामिल सभी 22 भाषाओं में भी ली जाएँगी।

Common Eligibility Test कैसे ली जाएगी?

ये टेस्ट प्रत्येक जिले में, हर पद के लिए Online ली जाएगी।

कौन Common Eligibility Test दे सकेगा? Who can appear for Common Eligibility Test 

RRB, IBPS, SSC में अलग अलग पदों के लिए अलग अलग योग्यताएं निर्धारित होती हैं। जैसे किसी पद के लिए 10वीं पास तो किसी के लिए 12वीं पास तो किसी के लिए स्नातक।

ये टेस्ट भी अलग अलग लिए जायेंगे। प्रश्न पत्र भी अलग अलग स्तर के होंगे।

भारत की नई शिक्षा नीति की संपूर्ण जानकारी हिंदी में लें  

 इसमें कौन कौन सी नौकरियां शामिल होंगी?

इसमें RRB, IBPS, SSC द्वारा ली जाने वाली सभी परीक्षाएं शामिल होंगी। ये सभी परीक्षाएं अराजपत्रित (Non Gazzeted) होती हैं। जैसे

RRB Group D (Railway Recruitment Board Group D)

RRB NTPC (Railway Recruitment Board, Non Technical Popular Category)

SSC CGL (Staff Selection Commission Combined Graduate Level)

SSC CHSL (Staff Selection Commission Combined Higher Secondary Level)

SSC MTS (Staff Selection Commission Multi Tasking Staff)

SSC JHT (Staff Selection Commission Junior Hindi Translator)

IBPS (Indian Banking Personal Selection)

ये भी पढ़ें  इसमें UPSC द्वारा ली जाने वाली Civil Service की परीक्षा  नहीं शामिल होगी। और ऐसी कोई भी राजपत्रित अधिकारियो के चयन वाली परीक्षा शामिल नहीं होगी।

इसके फायदे (Advantage)

एक कॉमन परीक्षा होने से परीक्षार्थी के अलग अलग नौकरियों के आवेदन शुल्क नहीं देने पड़ेंगे।

परीक्षार्थीयों को थकाऊ और बेकार की यात्रा से निजात मिलेगी। इससे उनके पैसे बचने के साथ साथ परेशानी से भी बचाव होगा। विशेष रूप से लड़कियों को यात्रा की परेशानियों से बचाव होगा।

एक बार हुई परीक्षा  स्कोर तीन वर्षों तक मान्य रहेगा।

विभिन्न भाषाओं में प्रश्न पत्र होने और उत्तर के विकल्प होने से छात्रों  फायदा होगा।

चयन में समय (Recruitment Cycle) कम होगा। जब छात्र अलग अलग आवेदन करते थे तब उन्हें कई परीक्षाएं देनी पड़ती थी। इस वजह से किसी नौकरी के चयन में जो समय लगता था वो ज्यादा होता था। पूरी चयन प्रक्रिया लम्बी हो जाती थी। कई बार एक ही छात्र का अलग अलग पदों पर एक साथ चयन हो जाने से ये प्रक्रिया लम्बी होती थी। अब एक आवेदन और एक परीक्षा से चयन प्रक्रिया में लगने वाला समय काम होगा।

क्या RRB, SSC, IBPS समाप्त हो जाएँगी? Will RRB, SSC, IBPS be abolished?

अगर ये प्रश्न आपके मन  इसलिए  रहा है की National Recruitment Agency के आ जाने से RRB, IBPS, SSC को समाप्त कर दिया जायेगा? तो इसका उत्तर है नहीं। ये संस्थाएं भी बनी रहेंगी और अपना काम करती रहेंगी।

National Recruitment Agency द्वारा लिया जाने वाला Common Eligibility Test केवल प्रारंभिक परिक्षा होगा। इसके बाद अभ्यर्थी को, जिस पद और विभाग में नौकरी करनी है उसमे मुख्य परीक्षा और साक्षात्कार के लिए आवेदन देना होगा। Final Selection वहीं एजेंसी या विभाग करेगा जिसमे नौकरी है।

National Recruitment Agency ठीक उसी तरह काम करेगा जिस तरह से National Testing Agency काम करती है।

National Testing Agency, Medical और IIT की परीक्षा आयोजित करती है। 

Common Eligibility Test का स्कोप 

अभी ये परीक्षा केवल तीन विभागों के लिए ली जाएँगी। पर आगे इसमें देश के 20 Recruitment Agency में से सबको शामिल किया जा सकता है।

बाद में इसके स्कोर को राज्य सरकारों और सरकारी उपक्रमों से भी साझा किया जा सकता है।

निजी कंपनियों से भी इसका स्कोर साझा किया जा सकता है।

इस एक परीक्षा के स्कोर से आपके लिए नौकरियों के दरवाजे खुल सकते हैं।

National Recruitment Agency की जरुरत क्यों थी? Why National Recruitment Agency needed?

Department of Personal & Training के secretary C. Chandramauli के अनुसार हर साल 1.25 लाख नौकरियों के लिए करीब 2.5 करोड़ छात्र आवेदन करते हैं। जिसके लिए ये छात्र हर परीक्षा के लिए अलग आवेदन करते हैं। अलग अलग परीक्षा केंद्रों पर जाकर परीक्षा देनी पड़ती है। जिससे उन्हें परेशानियों का सामना  करना पड़ता है। विशेष रूप लड़कियों को बहुत अधिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

National Recruitment Agency के आने से ये परेशानी दूर हो जाएगी। अब छात्रों को न तो अलग अलग आवेदन करने होंगे और न ही लगा लगा परीक्षा केंद्रों की यात्रा करनी होगी।

सरकार को भी परिक्षाएं आयोजित करने में आसानी रहेगी।

UPSC परीक्षा क्या है और तैयारी कैसे करें? पूरी जानकारी हिंदी में।

UPSC क्या है? (What is UPSC?)

UPSC (Union Public Service Commission) भारत सरकार की केंद्रीय एजेंसी है जो केंद्र सरकार की सरकारी सेवाओं  के लिए परीक्षाएं संचालित करती है। जैसे CSE (Civil Service Examination)। इन परीक्षाओं के अंतर्गत IAS (Indian Administrative Services भारतीय प्रशाशनिक सेवा) IPS (Indian Police Service भारतीय पुलिस सेवा) , IFS (Indian Foreign Service भारतीय विदेश सेवा) इत्यादि आते हैं।

इसके अलावा UPSC डिफेंस सेवाओं के लिए भी परीक्षाएं कराती है जैसे NDA (National Defense Academy), CDS (Combined Defense Services) इत्यादि।

कहा जाता है की ये परीक्षाएं दुनिया की सबसे कठिन परीक्षाएं होती हैं। होंगी भी क्यों नहीं? इससे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को सुचारु रूप से चलाने के लिए अधिकारी नियुक्त होते हैं।

UPSC की स्थापना (UPSC Establishment) 

इसकी स्थापना स्वतंत्रता से पहले 1 अक्टूबर 1926 को Public Service Commission के रूप में हुई थी।  बाद में Government of India Act 1935 के तहत इसका नाम Federal Public Service Commission कर दिया गया। देश के स्वतंत्र होने के बाद इसे फिर से दूसरा नाम दिया गया तथा Federal Public Service Commission अब Union Public Service Commission कहा जाने लगा।

UPSC  संवैधानिक स्थिति (Constitutional Status of UPSC)

भारतीय संविधान के भाग XIV के अनुच्छेद 315 – 323 के अनुसार UPSC एक स्वायत्त संस्था है। 

UPSC द्वारा लिए जाने वाली परीक्षाएं Exams Conducted by UPSC for Selection into Civil services

UPSC कक्षा-1 परीक्षा लेता है. IAS, IPS, IFS, IRS परीक्षा जैसे अधिकारी बनने के लिए UPSC परीक्षा देनी होगी. UPSC भारतीय आर्थिक सेवा, भारतीय इंजीनियरिंग सेवा जैसी सेवाओं की परीक्षा भी लेता है। 

UPSC द्वारा ली जाने वाली परीक्षाएं 

Civil Services Examination (CSE)

Engineering Services Examination (ESE).

Indian Forestry Services Examination (IFoS).

Central Armed Police Forces Examination (CAPF).

Indian Economic Service and Indian Statistical Service (IES/ISS).

Combined Geo-Scientist and Geologist Examination.

Combined Medical Services (CMS).

Special Class Railway Apprentices Exam (SCRA).

Limited Departmental Competitive Examination for selection of Assistant Commandant. (Executive) in CISF.

Exams Conducted by UPSC for Selection into Defense services

National Defence Academy & Naval Academy Examination – NDA & NA (I) and (ll)

Combined Defense Services Exam – CDS (I) and (II)

UPSC क्यों? Why UPSC?

UPSC द्वारा प्रति वर्ष लिया  जाने वाला Civil Service Exam देश  का सबसे प्रतिष्ठित परीक्षा है। लाखों क्षात्र  प्रति वर्ष परीक्षा में शामिल होते हैं पर उनमे से बहुत काम सफल हो पाते हैं। ये परीक्षा अपने आप में एक चमत्कार है। 

इस परीक्षा  परिणाम से बनने वाले अधिकारीयों की जिंदगी, उनके काम का चैलेंज, उनको मिलने वाली सुविधाएँ, प्रतिष्ठा आदि क्षात्रों को अपनी ओर आकर्षित करता है।

Job Profile 

UPSC  से बनने वाले अधिकारीयों का काम बहुत चुनौतीपूर्ण और रोचक होता है। इसमें चुनौती के साथ साथ रोमांच और जिम्मेदारी भी समाई रहती है। एक अधिकारी पर जिम्मेदारी का बहुत बड़ा बोझ होता है। और उस पद के साथ मिलने वाला प्रतिष्ठा और सम्मान इस जिम्मेदारी से भरे और चुनौती पूर्ण कार्य को रोमांचक बना देते हैं। 

Salary Benefits

इन अधिकारीयों को वेतन 7th Pay Commission (सातवें वेतन आयोग)  अनुसार मिलता है।

Service Benefits 

सिविल सर्विस के अधिकारी सरकार के निर्णय लेने प्रक्रिया के सीधे जिम्मेदार होते हैं। ये अधिकारी हीं भारत निर्माण की नीतियां बनाते हैं। इनका काम इन्हे आम लोगो से सीधे संपर्क और उनकी समस्याओं के समाधान की जिम्मेदारी देता है। 

सुविधाएँ (Facilities)

भारतीय प्रशाशनिक सेवाओं के अधिकारीयों को आवास सुविधा के साथ साथ यातायात सुविधा भी दी जाती है। इस सुविधा के सरे खर्चे सरकार द्वारा वहन किये जाते हैं। 

Pension and Post-retirement facilities:

सिविल सर्वेन्ट्स को रिटायरमेंट के बाद पूरी जिंदगी पेंशन मिलती है। साथ ही साथ भारत सरकार उन्हें कभी कभी भी किसी आयोग का अध्यक्ष बना सकती है। 

IAS 2020 के लिए मुख्य योग्यताएं, उम्र सीमा, प्रयास 
Eligibility Criteria for IAS 2020: Age Limit & Attempts
UPSC फॉर्म कौन भर सकता है.? (Who can apply for UPSC Exam?)
  • फॉर्म भरने के लिए 21 वर्ष होना चाहिए.
  • आपका ग्रेजुएशन पूरा होना चाहिए. (यदि आप अंतिम सेमेस्टर में हैं तो आप फॉर्म भर सकते हैं लेकिन यदि आपका कोई ईन्टरव्यु है, तो आपको स्नातक के मार्कस लिखना होगा. यदि आप तब तक स्नातक की मार्कशीट प्राप्त कर लेते हैं, तो आप फॉर्म भर सकते हैं.)
  • किसी भी विषय में स्नातक कर चुके छात्र फॉर्म भर सकते हैं.

अभ्यर्थी को किसी भी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से स्नातक होना चाहिए। 

अभ्यर्थी की न्यूनतम उम्र 21 वर्ष तथा अधिकतम उम्र 32 वर्ष होनी चाहिए। 

अधिकतम उम्र की सीमा अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 35 वर्ष तथा अनुसूचित जाति  जाति के लिए 37 वर्ष है। 

2019 में 103वें भारतीय संविधान के बाद UPSC ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को भी आरक्षण के लिस्ट में जोड़ दिया है। 

EWS (Economic Weaker Section) को 10 प्रतिशत आरक्षण दिया गया है। पर इस वर्ग को उम्र सीमा में कोई छूट नहीं दी गयी है। 

समान्य वर्ग के छात्रों के लिए अधिकतम प्रयास की सीमा 6 है। यानि वो 6 बार परीक्षा में बैठ सकते हैं। 

अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए प्रयास की  अधिकतम सीमा 9 बार है। 

SC/ST वर्ग के लिए प्रयास की कोई अधिकतम सीमा नहीं है। वो 37 वर्ष की आयु तक चाहे जितनी बार परीक्षा में शामिल हो सकते हैं।

सामान्य वर्ग के विकलांगों के लिए अधिकतम प्रयासों की सीमा 9 बार है।

UPSC परीक्षा कितने चरणों में होती है?

UPSC परीक्षा तीन भागों में होती है.

  • प्रारंभिक परीक्षा (Preliminary Exam)
  • मुख्य परीक्षा (Mains Exam)
  • साक्षात्कार (Interview)

Pre UPSC (IAS, IPS, IFS)

  • प्रारंभिक परीक्षा में दो प्रश्नपत्र होते हैं। Paper 1 और Paper 2 दोनों प्रश्नपत्र 200 मार्क्स के होते हैं.
  • पेपर -1 की जाँच केवल तभी की जाती है, जब दूसरा पेपर के मार्कस 66 या ऊपर होता है.
  • मेरीट लिस्ट पेपर -1 के मार्कस से किया जाता है, पेपर -1 के मार्क्स तय करता है की आप मुख्य परीक्षा दे सकते हैं या नहीं. (दूसरे पेपर के मार्क्स की गिनती नहीं की जाती.)
  • परिणाम 3 महीने बाद आता है. यदि पहले पेपर में अच्छे अंक हैं तो आप मुख्य परीक्षा दे सकते हैं.
  • प्रारंभिक परीक्षा उत्तीर्ण करना जरुरी है. अंतिम परिणाम में उसके मार्कस नहीं गिने जाते हैं.

मेन परीक्षा (Mains Exam)

  • मुख्य परीक्षा में कुल नौ पेपर होते हैं.
  • अंग्रेजी (सभी उम्मीदवारों के लिए सामान्य होता है. 300 में से न्यूनतम 75 मार्क्स  अनिवार्य हैं.)
  • दूसरा पेपर भाषा का होता है. है. (आप संविधान की अनुसूची-8 में दर्ज  22 भाषाओं में से कोई भी चुन सकते हैं. इसमें हिन्दी भी शामिल है. इसे पास करने के लिए आपको 300 में से 75 अंक प्राप्त करने होंगे.)
  • इन दोनों पेपरों को पास करना आवश्यक है, जिनके मार्क्स मुख्य परीक्षा में नहीं जोड़े जाते.

मुख्य परीक्षा में 7 पेपरों होते है.

  • निबंध का पेपर
  • चार सामान्य अध्ययन पेपर
  • दो वैकल्पिक का पेपर

(जो आपको तय करना है. वह विषय जो आप चाहते हैं. भाषा भी रखी जा सकती है. UPSC द्वारा तय किए गए विषय से ही.)

  • सात पेपर 250 मार्कस के होते हैं.
  • परिणाम 3 महीने के बाद आता है. यदि आप पास होते हैं, तो आपको Interview के लिए बुलाया जायेगा। 

साक्षात्कार (Interview) –

  • Interview  कुल 275 मार्कस का होता हैं.
  • मुख्यत: Interview में स्नातक का मुख्य विषय देश की समस्या और उसके समाधान, आंतरराष्ट्रीय संबंध, जिला या तालुका की समस्या जो आप अपनें जिल्ले से आते हैं, अर्थात् इसमें क्या प्रसिद्ध है.? इसका इतिहास आदि क्या है.. धर्म आधारित प्रश्न पूछे जा सकते हैं.

(UPSC पास कर चुके अधिकारियों का कहना है कि वे आपके द्वारा भरे गए आवेदन पत्र से सवाल पूछ रहे हैं। इसलिए आवेदन पत्र सोच समझकर भरें।)

  • कुल 2025 मार्क्स में से उम्मीदवार को मार्क्स मिलते हैं.
  • फिर UPSC उनका कैडर तय करता है कि आपको कौन सी सेवा देनी है.
  • अगर आपके अंक अच्छे हैं तो आपको पसंदीदा कैडर मिलता है.

UPSC की तैयारी कहाँ से शुरू करें.?

  • UPSC की तैयारी NCERT (National Council of Educational Research and Training) से शुरू होनी चाहिए ताकि आपका मूल ज्ञान स्पष्ट हो.

इतिहास के लिए

  • कक्षा 8 से 12 तक NCERT किताबें 
  • प्राचीन भारत का इतिहास
  • मध्य भारत का इतिहास
  • आधुनिक भारत का इतिहास पढ़ें.
  • Discovery of India (भारत एक खोज) जैसी पुस्तकें पढे या टीवी सिरियल देखें.

भूगोल के लिए

  • कक्षा 6 से 12 तक का NCERT पुस्तक पढे, करन्ट अफेर्स पढ़ें.
  • वर्तमान मामलों को पढ़ना
  • भूगोल की एक अच्छी पुस्तक पढ़ें.

अर्थशास्त्र के लिए

  • कक्षा6 से 12 NCERT 
  • करन्ट अफेर्स पढ़ें.
  • अर्थशास्त्र पर रमेशसिंह की पुस्तक पढ़ें.
  • वर्तमान मामलों को पढ़ना.
  • यू-ट्यूब पर मृणाल पटेल का व्याख्यान देखें.

राजनीति के लिए

  • कक्षा 6 से 12 तक NCERT 
  • एम. लक्ष्मीकांत की राजनीति की पुस्तक
  • करेंट अफेयर्स पढे.

समाजशास्त्र के लिए

  • कक्षा 6 से 12 NCERT
  • एक अच्छी किताब पढ़ें (सरल भाषा में जिसे आप समझ सकते हैं)
  • यूसीजी चैनल पर महताब के व्याख्यान पढे, यूट्यूब पर देख सकते हैं..

विज्ञान के लिए

  • कक्षा 6 से 10 NCERT (11-12 विज्ञान की पुस्तकें पढ़ने की आवश्यकता नहीं है, यदि आपके पास समय हो तो आप पढ़ सकते हैं.)
  • करेंट अफेयर्स पढे

गणित के लिए

  • कक्षा 6 से 10 NCERT (गणित का सामान्य ज्ञान होना चाहिए. केवल कक्षा दस तक का)

अंग्रेजी के लिए

  • अंग्रेजी में कक्षा दस  तक का व्याकरण का ज्ञान आवश्यक है. अंग्रेजी में 300 मार्कस का पेपर आता है. मुख्य परीक्षा में 300 में से 25% मार्कस आवश्यक है, अर्थात 300 में से 75 मार्कस. इन मार्कस को अंतिम परीक्षा में नहीं गिना जाता.

वैकल्पिक विषय के लिए

  • वैकल्पिक में दो पेपर होते हैं.
  • कई वैकल्पिक हैं  भाषा का विकल्प भी पसंद कर सकते हो.
  • भाषा का इतिहास (गद्य पद्य और उपन्यास)

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  • राज्यसभा टीवी देखें.
  • दैनिक समाचार पत्र पढ़ें (द हिंदू (The Hindu) या इंडियन एक्सप्रेस (Indian Express) या कोई अन्य समाचार पत्र)
  • करंट अफेर्स पढ़ें
  • आप जो भी पढ़ते हैं, उसे नोट करें, ताकि परीक्षा के आसपास के क्षेत्र में संशोधित कर सकें.
  • केंद्र सरकार और राज्य सरकार की सभी योजनाओं को जानें.,
  • यह जानना महत्वपूर्ण है कि भारत के अंतर्राष्ट्रीय संबंध क्या हैं, केसा है, उनके बीच क्या सौदे हुए हैं.?
  • भारत की मुख्य समस्या क्या है?
अगर आप भी इसमें अपना अनुभव और ज्ञान जोड़ना चाहते हैं या कुछ और भी लिखने का शौक रखते हैं तो Mail Us at ” [email protected] “साथ में अपना परिचय एक फोटो के साथ भी भेजें। आपकी रचना आपके नाम और फोटो के साथ प्रकाशित की जाएगी।

भारतीय इतिहास के महान दानवीर कर्ण, राजा बलि, राजा शिवि, राजा मोरध्वज, महर्षि दधीचि

हमारे देश, धर्म और संस्कृति में दान का बहुत बड़ा  महत्व है। कहा जाता है आपके पास जो भी है उसमे से कुछ हिस्सा उन जरूरतमंदों को दान करते हैं तो ये सबसे बड़ा पुण्य का काम है। वो चीज चाहे आपकी विद्या हो, धन हो, शारीरिक श्रम हो या कुछ और। 

दान धन का ही हो, यह जरुरी नहीं, भूखे को रोटी, बीमार का उपचार, किसी व्यथित व्यक्ति को अपना समय, उचित परामर्श, आवश्यकतानुसार वस्त्र, सहयोग, विद्या जिसको जिस चीज की आवश्यकता हो और वो हमारे पास हो। जब हम  कुछ पाने  की अपेक्षा नहीं करते, यही सच्चा दान है।

रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि परहित के समान कोई धर्म नहीं है और दूसरों को कष्ट देने के समान कोई पाप नहीं है। इसी तरह संस्कृत में एक  श्लोक है “परोपकाराय पुण्याय, पापाय परपीड़नाम”।

दानो में विद्या दान सबसे बड़ा दान है क्योंकि ये आपके अंदर की ऐसी संपत्ति है देने से घटती नहीं है बल्कि बढ़ती जाती है। 

आजकल अंग दान का महत्व भी बहुत गया है। अंग दान और रक्त दान से आप किसी को  जीवन दान देते हैं। जो दान किसी जीव के प्राणों की रक्षा करे उससे उत्तम और क्या हो सकता है? हमारे शास्त्रों में ॠषि दधीची का वर्णन है जिन्होंने अपनी हड्डियाँ तक दान में दे दी थीं, कर्ण का वर्णन है जिसने अपने अन्तिम समय में भी अपना स्वर्ण दंत याचक को दान दे दिया था। देना तो हमें प्रकृति रोज सिखाती है, सूर्य अपनी रोशनी, फूल अपनी खुशबू, पेड़ अपने फल, नदियाँ अपना जल, धरती अपना सीना छलनी कर के भी दोनों हाथों से हम पर अपनी फसल लुटाती है। इसके बावजूद न तो सूर्य की रोशनी कम हुई, न फूलों की खुशबू, न पेड़ों के फल कम हुए न नदियों का जल, अत: दान एक हाथ से देने पर अनेकों हाथों से लौटकर हमारे ही पास वापस आता है बस शर्त यह है कि निस्वार्थ भाव से श्रद्धा पूर्वक समाज की भलाई के लिए किया जाए।

हमारे इतिहास और संस्कृति में हजारों लाखों महान पुरुष मिलेंगे जिन्होंने दानवीरता में बड़े कीर्तिमान स्थापित किये हैं। इनमे से कुछ प्रमुख नाम हैं राजा बलि, राजा शिवि, दानवीर कर्ण, महर्षि दधीचि और राजा मोरध्वज। 

  1. #राजा बलि की दानवीरता 

जब राजा बलि (भक्त प्रह्लाद के पोते)  शक्तियाँ  बहुत अधिक बढ़ गयी और देवों को युद्ध में पराजित होना पड़ा तो देवराज इंद्रा को चिंता हुई। (आपको पता होना चाहिए की देवराज इंद्रा का पद स्थायी नहीं है। कोई भी अपने सद्कर्मों से देवराज का पद प्राप्त कर सकता है ) देवराज भगवान विष्णु की शरण में गए। भगवन विष्णु वामन अवतार लेकर राजा बलि के दरबार में गए  और बलि से दान में तीन पग जमीन माँगा। राजा बलि बहुत बड़े दानवीर थे और फिर सोचे कि एक वामन तीन पग में कितनी जमीन ले सकता है ? बोले महाराज ये क्या मांग दिया आपने? कुछ बड़ी चीज मांगो। धन दौलत, सोना चाँदी, आभूषण, वस्त्र इत्यादि, पर भगवान ने बस तीन पग जमीन ही माँगा। बलि की स्वीकारोक्ति के बाद भगवान विष्णु अपने असली रूप में आ गए और एक पग में आसमान और दूसरे पग में पृथ्वी को माप दिया।  जब तीसरे पग की बारी आयी तो कुछ बचा ही नहीं था। पर राजा बलि इतने बड़े दानवीर थे की उन्होंने तीसरा पग अपने सर पर  लिया जिससे की उन्हें पृथ्वी छोड़कर पाताल लोक में जाना पड़ गया। अब भगवान विष्णु इतने बड़े दानवीर और भक्त को अकेला कैसे छोड़ सकते थे? उन्होनें उनकी रक्षा करने  निश्चय किया जब तक की राजा बलि को इंद्रा की गद्दी न मिल जाये। भगवान विष्णु उनके द्वारपाल बनकर रहने लगे। इस बात से वैकुण्ठ लोक में बैठे देवी लक्ष्मी चिंतित हो गयी। उन्होनें अपने पति को पाने के लिए एक ब्राह्मण स्त्री रूप  धरा और राजा बलि के पास पहुँच गयी और कहा की उनके पति एक लम्बी यात्रा पर गए हैं  और रहने के लिए एक स्थान की माँग की। राजा बलि नें उन्हें सच्चे मन से अपने घर में रखा तथा अपने बहन की तरह सुरक्षा प्रदान की। देवी लक्ष्मी के आने के बाद राजा बलि के घर में रौनक आ गई तथा घर धन दौलत और खुशियों से भर गया। फिर एक दिन सावन की पुर्णिमा के दिन राजा बलि को एक रक्षा सुत्र बांधा तथा अपनी खुशी और रक्षा का वचन लिया। इस बात से प्रसन्न होकर राजा बलि नें कोई भी मांग पुरी करने का वचन दिया। देवी लक्ष्मी नें द्वारपाल के रूप में खड़े भगवान विष्णु को मांगा। राजा बलि को बहुत आश्चर्य हुआ तभी देवी लक्ष्मी और भगवान विष्णु अपने असली रूप में आए। राजा बलि अपने दानवीर होने के लिए जाने जाते हैं इसलिए उन्होंने भगवान विष्णु को देवी लक्ष्मी को सौंप दिया। तभी से  इस दिन को रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाता है।

2. #कर्ण की दानवीरता 

दानवीर कर्ण के दानवीरता की ख्याति युगों युगों तक फैली हुई है। कर्ण के दान की कई कहानियाँ हैं जो उसे विश्व के महानतम दानवीरों में से एक बनाती हैं। पर उनमे से तीन कहानियों की बात करते हैं। पहली कहानी कर्ण द्वारा अपने कवच कुण्डल का दान और दूसरी सोने के दातों का दान और तीसरे अपने महल के  खिड़कियों और दरवाजों को तोड़कर उनमे से चन्दन की लकड़ियों का दान। 

कवच कुण्डल का दान 

सभी जानते हैं कि कर्ण सूर्य पुत्र था जिसे सूर्य ने एक ऐसा कवच कुण्डल दिया था जिसपर किसी भी अस्त्र शस्त्र का असर नहीं हो सकता था। महाभारत युद्ध में कर्ण कौरवों की तरफ से युद्ध लड़ रहा था जिसे हराना अर्जुन के लिए असंभव सिद्ध हो रहा था। कहा जाता है अर्जुन इंद्र पुत्र थे। इंद्रा को अर्जुन की चिंता हुई। फिर इन्द्र ने छल करके कर्ण के दानवीरता का फायदा उठाना चाहा। एक दिन जब कर्ण संध्या वंदन कर रहा था तभी इंद्र एक ब्राह्मण का वेश धरकर उसके पास गए। ब्राह्मण को देखकर कर्ण ने उनके आने का कारन पूछा। इंद्र ने उस से दान मांगने की।  कर्ण ने कहा की हे विप्र देव माँगो जो माँगना है। इंद्र भी बहुत शातिर और चालक थे। कहा की हे कर्ण मैं ऐसे कुछ नहीं मांग सकता। पहले तुम्हे वचन देना होगा की जो भी मैं मांगूंगा वो तुम मुझे दोगे। कर्ण ने हाथ में जल लेकर वचन दिया की हे विप्रवर मैं वचन देता हूँ की आप जो मांगेंगे वो मैं दूंगा।

तब इंद्रा ने कर्ण से उसके कवच कुण्डल मांग लिए। कर्ण को थोड़ा धक्का लगा पर उसने बिना देर किये वो कवच और कुण्डल दे दिए। 

जब इंद्र जाने लगे तब उनके रथ का पहिया धंस गया और आकाशवाणी हुई “देवराज इन्द्र, तुमने बड़ा पाप किया है। अपने पुत्र अर्जुन की जान बचाने के लिए तूने छलपूर्वक कर्ण की जान खतरे में डाल दी है। अब यह रथ यहीं धंसा रहेगा और तू भी यहीं धंस जाएगा। ” तब देवराज नें कर्ण को अमोघ अस्त्र दिए। 

कर्ण द्वारा सोने के दातों का दान 

जब कर्ण युद्ध भूमि में पड़ा अंतिम साँस ले रहा था तब भगवान श्री कृष्ण ने उसके दानवीरता की परीक्षा लेनी चाही। वो एक ब्राह्मण का वेश बनाकर कर्ण के पास पहुंच गए।  कहा की तुम्हारे बारे में बहुत सुना है। मुझे कुछ स्वर्ण की आवश्यकता है। क्या वो तुम दे सकते हो? कर्ण ने कहा की मेरे पास अभी सोना नही है पर मेरे दांत सोने के बने हैं। आप चाहें तो उन्हें ले सकते हैं। 

भगवान ने कहा मैं तुम्हारे दांत नहीं।  कर्ण ने स्वयं अपने दांत तोड़ दिए। भगवान ने उसे भी लेने से इंकार कर दिया। वो खून से सने दांत नहीं लेना चाहते थे। 

कर्ण ने अपने बाणों से वर्षा करके दांत धो कर दिए। 

कर्ण और चन्दन की लकड़ी

एक बार भीम और अर्जुन भगवान श्री कृष्ण से युधिष्ठिर के दानवीरता का बखान कर रहे थे। भगवान श्री कृष्ण मंद मंद मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने कहा की भाई  हमने तो कर्ण से बड़ा दानी नहीं देखा। पांडवों को ये बात पसंद नहीं आयी। 

भगवान ने कहा समय आने पर ये बात सिद्ध हो जाएगी। 

कुछ दिनों बाद युधिष्ठिर के पास एक याचक आया। उसे यज्ञ करने के लिए चन्दन की सुखी लकड़ी की आवश्यकता थी। उस समय मूसलाधार बारिश हो रही थी। सुखी लकड़ी नहीं मिल रही थी। युधिष्ठिर ने कोष से लकड़ी देने का आदेश दिया पर संयोग से कोष में सुखी लकड़ी नहीं थी। युधिष्ठिर ने बहुत प्रयास किया। पर सुखी लकड़ी की व्यवस्था नहीं हो पायी।

अंतत: याचक ने कहा की महाराज मेरा यज्ञ तो पूरा नहीं हो पायेगा और मैं भी भूखा प्यासा मर जाऊँगा क्योंकि यज्ञ पूरा किये बिना मैं कुछ खाता पीता नहीं हु।

तब भगवान श्री कृष्ण याचक को कर्ण के पास गए। याचक ने कर्ण से भी चन्दन की सुखी लकड़ी माँगी। कर्ण ने भी बहुत प्रयास किया पर चन्दन की सुखी लकड़ी नहीं मिली। फिर कर्ण ने अपने महल की खिड़कियों और दरवाजों को तोड़कर चन्दन की लकड़ियों का ढेर लगा दिया। 

भगवान श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि धर्मराज आपके महल में भी दरवाजे और खिड़कियां भी चन्दन के लकड़ी की हीं बनी हैं। अपने क्यों नहीं उन लकड़ियों को दिया? साधारण अवस्था में दान देना कोई विशेषता नहीं है, असाधारण परिस्थिति में किसी के लिए अपने सर्वस्व को त्याग देने का ही नाम दान है। 

3. #महाराजा शिवि और कबूतर की कहानी 

महाराज शिवि की दानवीरता और न्यायप्रियता की कहानी संसार भर में प्रसिद्द थी। देव, दानव, मानव सभी उनकी न्यायप्रियता का लोहा मानते थे। जब देवराज इंद्रा ने उनके न्यायप्रियता की कहानी सुनी तो उन्हें शंका हुई। और उन्होंने उनकी परीक्षा लेनी चाही। देवराज इंद्र और अग्नि देव ने मिलकर एक योजना बनाई। देवराज इंद्र ने बाज का और अग्नि देव ने कबूतर का रूप बनाया और परीक्षा लेने चले। 

एक दिन महाराज शिवि अपने महल के बगीचे में बैठे हुए थे। तभी उनकी गोद में एक घायल कबूतर गिरा। कबूतर का पीछा करते एक बाज भी आया। बाज ने शिवि से कहा की महाराज कबूतर मेरा भोजन है। इसे मुझे सौंप दीजिये। महाराज शिवि ने कहा कि ये कबूतर मेरी शरण में आया है और मैं अपने शरण में आये किसी भी जीव के प्राणों की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध हूँ। तब बाज ने कहा की महाराज ये मेरा आहार है और किसी के आहार को छीनना धर्म नहीं है। इसपर शिवि ने बाज को उसके आहार  व्यवस्था करने की बात कही तो बाज ने कहा की महाराज आप इस कबूतर के बराबर का मांस हमें दे दीजिये। हमें  और कुछ नहीं चाहिए। 

महाराज शिवि ने निश्चय किया की कबूतर की जगह वो अपना मांस उस बाज को खिलाएंगे। क्योंकि शिवि अपने राज्य के किसी और प्राणी को मरने नहीं दे सकते थे। 

वहां एक तराजू मंगाया गया। उस तराजू पर एक तरफ कबूतर को बैठाया गया और दूसरी तरफ महाराज शिवि अपने शरीर से मांस काटकर  रखते थे। पर हर बार कबूतर का पलड़ा भारी रहता था। अंत में तराजू के दूसरे पलड़े पर महाराज शिवि स्वयं बैठ गए। तब दूसरा पलड़ा भारी हो गया। 

अब देवराज इंद्र और अग्नि देव की शंका दूर हुई और वो अपने असली रूप में आये। दोनों महाराज शिवि की दानवीरता और न्यायप्रियता से प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद दिया और चले गए। 

4. #राजा मोरध्वज की कहानी 

एक बार अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण से कहा की हे भगवान आपका मुझसे बड़ा भक्त हमसे बड़ा दानी कौन है? भगवान ने कहा चलो देखते हैं। 

भगवान श्री कृष्ण और यमराज एक ब्राह्मण और सिंह  बनाकर  राजा मोरध्वज के दरबार में पहुँच गए। वहाँ जाकर भगवान ने मोरध्वज से कहा, “हे राजन, हमने आपके दानवीरता की कहानिया बहुत सुनी है। ” सुना है आपके दरबार से कोई खाली हाथ नहीं लौटा है। 

राजा ने कहा की हे ब्राह्मण देव ये नारायण की कृपा है की हमारे दरबार से कोई खाली हाथ  नहीं लौटा। मैं आपकी सेवा  करके स्वयं को धन्य महसूस करूँगा। कहिये क्या सेवा कर सकता हूँ। 

ब्राह्मण वेश में भगवान ने कहा की हे राजन हमें बस हमारे भोजन की व्यवस्था कर दीजिये। हम ब्राह्मण तो सात्विक भोजन कर लेंगे परन्तु हमारे साथ सिंह राज भी हैं तो उनके लिए आपको मांसाहार की व्यवस्था करनी होगी। 

राजा सोच में पड़ गए। एक धार्मिक राजा, नारायण का बड़ा भक्त जो मांसाहार के बारे में सोचता भी नहीं हो, वो कैसे मांसाहार की व्यवस्था कर सकता था।

बहुत सोचने के बाद राजा ने स्वयं को सिंह राज के सामने पेश करने का प्रस्ताव रखा। परन्तु भगवान नें कहा की हे राजन आपके मांस खाकर सिंह राज तृप्त नहीं होंगे। इन्हे किसी बूढ़े इंसान या जानवर का मांस नहीं चाहिए। आप अपने बेटे ताम्रध्वज का मांस इनके सामने रख सकते हैं।  परन्तु पुत्र को भोजन बनते  देख कर माता पिता की आंखों में आंसू नहीं आना चाहिए। 

इतना सुनकर पूरा दरबार आश्चर्यचकित हो गया। राजा को भी धक्का लगा। परन्तु राजा ने अपनी कीर्ति और कर्तव्य को ध्यान में रख कर राज दरबार में ही अपने बेटे को चीरकर सिंह राज के सामने रख दिया।

सिंहराज ने आगे बढ़कर ताम्रध्वज का दाया भाग खा लिया। तभी ताम्रध्वज की माता की बायीं आंख से आंसू टपक पड़े।

भगवान ने पूछा रानी की आँखों में आंसू क्यों? रानी ने कहा “सिंह राज ने मेरे पुत्र के दांये भाग को खा लिया पर बाएं भाग को नहीं खाया इसीलिए बायीं आँख से आँसूं निकल गए। 

तभी भगवान नें राजा मोरध्वज को अपने असली रूप का दर्शन कराया और कहा की आपके इस दानवीरता का फल मिल चूका है। 

राजा मोरध्वज ने देखा तो उनका बेटा जीवित खड़ा था। 

5. #महर्षि दधीचि की हड्डियों का वज्र 

एक बार इन्द्र लोक पर व्रतासुर नामक एक राक्षस ने कब्ज़ा कर लिया। उसने सभी देवताओं को देवलोक से बहार निकाल  दिया। इंद्र समेत सभी देव ब्रह्मा जी के पास गए। ब्रह्मा जी ने उन्हें एक उपाय बताया। कहा की व्रतासुर का वध केवल  वज्र से हो सकता है जो वज्र महर्षि दधीचि के अस्थियों से बना हो। 

इन्द्र ने एक बार महर्षि दधीचि का अपमान किया था। इस कारण उन्हें दधीचि के पास जाने में संकोच हो रहा था। 

इन्द्र महर्षि दधीचि से ब्रह्म ज्ञान लेना चाहते थे।  पर महर्षि दधीचि को इंद्र इस ज्ञान के लिए सुयोग्य नहीं लगे इसलिए महर्षि ने इंद्र को ब्रह्म ज्ञान देने से इंकार कर दिया। इंद्र को क्रोध आया और किसी को भी ये ज्ञान देने पर सर धड़ दे अलग करने की धमकी दी। पर महर्षि दधीचि ने कहा की कोई भी अगर सुयोग्य मिले तो मैं ये ज्ञान अवश्य दूंगा। 

बाद में अश्विनीकुमार महर्षि दधीचि के पास ब्रह्म विद्या लेने आये। दधीचि नें उन्हें ब्रह्म विद्या पाने के योग्य पाकर  विद्या दी। उन्होंने अश्विनीकुमारों को इन्द्र द्वारा कही गई बातें बताईं। तब अश्विनीकुमारों ने महर्षि दधीचि के अश्व का सिर लगाकर ब्रह्म विद्या प्राप्त कर ली। इन्द्र को जब यह जानकारी मिली तो वह पृथ्वी लोक में आये और अपनी घोषणा के अनुसार महर्षि दधीचि का सिर धड़ से अलग कर दिया। अश्विनीकुमारों ने महर्षि के असली सिर को फिर से लगा दिया। इन्द्र ने अश्विनीकुमारों को इन्द्रलोक से निकाल दिया। 

इसी कारण इन्द्र को महर्षि दधीचि के पास जाने में संकोच हो रहा था। परन्तु अंत में देवलोक की रक्षा के लिए अपने संकोच को त्याग कर इंद्र  दधीचि के पास पहुंच गए। 

महर्षि दधीचि को जब सारी बातें पता चली तो वो ख़ुशी ख़ुशी राजी हो गए।

उनकी हड्डियों वज्र जिस से व्रतासुर का वध हुआ। 

अगर आप भी इसमें अपना अनुभव और ज्ञान जोड़ना चाहते हैं या कुछ और भी लिखने का शौक रखते हैं तो Mail Us at ” [email protected] “साथ में अपना परिचय एक फोटो के साथ भी भेजें। आपकी रचना आपके नाम और फोटो के साथ प्रकाशित की जाएगी।

राजा दाहिर की कहानी – एक हीरो जिसे भुला दिया गया

राजा दाहिर, सिंध का एक ऐसा हिन्दू राजा जिसने 33 वर्षों तक युध्द लड़ते और उन्हें करारी शिकश्त देते हुए सिंध और पुरे हिंदुस्तान को मुस्लिम आक्रांताओं से बचाये रखा। अंत में कुछ बौद्ध गवर्नरों और कबीलों की गद्दारी की वजह से युद्ध मैदान में वीर गति को प्राप्त हुआ। उसके मरने के बाद ही सिंध पर अरब का कब्ज़ा हो सका और सिंध की विजय ने अरबों  के लिए हिंदुस्तान के दरवाजे खोल दिए। आगे का इतिहास हम सब को पता है किस तरह से हमारा देश अरबों और तुर्कों से लड़ता रहा। वीर पैदा होते रहे, साथ ही साथ गद्दार  भी पैदा होते रहे, वर्ना हम गुलाम  कैसे होते?

आज की पीढ़ी को  क्या पता है राजा दाहिर कौन हैं? क्या हमें हमारे इतिहास की पुस्तकों में राजा दाहिर के बारे में पढ़ाया जाता है? राजा दाहिर को हमने बिलकुल भुला दिया। उनकी जगह हम उनके बारे में पढ़ते हैं जिन्होंने हमारे देश को लुटा,  पढ़ते हैं बल्कि हमारे सिलेबस में  उनका महिमामंडन होता है। पता नहीं हमारी सरकारों की क्या  मज़बूरी है?  उनकी चाहे जो मज़बूरी हो, पर हमारा कर्तव्य बनता है की हम उनके बारे में पढ़ें और लोगों को पढ़ाएं। राजा दाहिर के बारे में  पूरी जानकारी के लिए पढ़ें। 

आज मैं उसी राजा दाहिर की कहानी (Raja Dahir ki kahani) सुनाने वाला हु। क्या  आपको पता है राजा दाहिर सेन कौन थे (Raja Dahir Sen Kaun The)? वो हैं राजा दाहिर (Raja Dahir a National Hero) जिनके बारे में हमें अपने इतिहास में कुछ भी नहीं पढ़ाया जाता है। एक ऐसा राजा जिसने तीन बार युद्ध में अरब को हराकर हिंदुस्तान को मुस्लिम आक्रांताओं  से बचाये रखा। पर जब कुछ लोगों की गद्दारी की वजह से उन्हें  हार का  सामना करना पड़ा और  वीर गति को प्राप्त हुए तब भी हमने उसको हीरो बना दिया जिसने उन्हें न सिर्फ धोखे से हराया बल्कि सिंध पर इतने अत्याचार किये की मानवता शर्मसार हो जाये।

अनुक्रम

  • राजा दाहिर की कहानी (Raja Dahir ki Kahani)
  • राजा दाहिर की बेटियाँ (Raja Dahir Daughter)
  • राजा दाहिर और इमाम हुसैन (Raja Dahir and Imam Hussain)

राजा दाहिर की कहानी (Raja Dahir ki Kahani)

भारत वर्ष में इस्लामी शाशन का प्रवेश 712 ईस्वी में राजा दाहिर की पराजय और राजा दाहिर की मृत्यु  के बाद सिंध के रस्ते हुआ। लगभग 33 वर्ष लड़ाइयां लड़ते लड़ते , बार बार अरबों को युद्ध में हराते हुए अन्तत: कुछ स्थानीय कबीलों और बौद्ध गवर्नरों की गद्दारी से युद्ध में राजा दाहिर वीर गति को प्राप्त हुए।

युद्ध क्षेत्र में जाते हुए राजा दाहिर ने कहा था “

“मै खुली लड़ाई में अरबों से लड़ने जा रहा हूँ और अपने पुरे सामर्थ्य के साथ लडूंगा। अगर मैं उन्हें कुचल देता हूँ तो मेरे साम्राज्य की नीव और मजबूत हो जाएगी लेकिन अगर मुझे सम्मान के साथ वीर गति प्राप्त हुई तो यह  अरब की किताबों में लिखा जायेगा। इसके बारे में महान से महान लोग बात करेंगे। दुनिया के अन्य राजा  इसके बारे में बात करेंगे।और कहा जायेगा कि सिंध के राजा दाहिर ने अपने देश के दुश्मन से लड़ते हुए अपनी अनमोल जिंदगी का बलिदान कर दिया। ” 

अफ़सोस की आज राजा दाहिर की महानता को याद नहीं किया जाता।
राजा दाहिर सिंध प्रान्त के आखिरी हिन्दू राजा थे जिनका जन्म 663 ईस्वी में सिंध  के अलोर में हुआ था। ये जगह आज रोहरी के नाम से जाना जाता है। इनके पिता का नाम चच तथा माता का नाम रानी सुहानदी था। चच की  मृत्यु के बाद 679 ईस्वी में महाराज दाहिर सेन सिंध के राजा बने। राजा दाहिर को शाशन सँभालने के साथ ही कई विरोधों का सामना करना पड़ा। उनके पिता द्वारा किये गए शासन से सिंधु देश के गुर्जर, जाट, लोहना और ब्राह्मण समाज नाराज था। इसके प्रमुख कारणों में  एक उनके पिता द्वारा बौद्ध धर्म को राज धर्म का दर्जा दिया जाना था। राजा दाहिर ने सबको साथ लेकर चलने का निश्चय किया और सिंध देश का राज धर्म सनातन हिन्दू वैदिक धर्म कर दिया।
दोस्तों क्या इस महान राजा के साथ ऐसा हुआ? नहीं। हमने राजा दाहिर के महान इतिहास (Raja Dahir Sen Great History) को भुला दिया। 

 राजा दाहिर के राज में सिंध देश बहुत संपन्न देश था। उसका व्यापर समुद्री रास्तों द्वारा पुरे  विश्व से था। सिंध का देवल बंदरगाह व्यापर का मुख्या केंद्र था। इराक ईरान से व्यापर इसी बंदरगाह से होता था। सिंध की सम्पन्नता और सिंध का भारत में प्रवेश करने का द्वार होना अरब देश को आकर्षित करता था। अरब अपने साम्राज्य का विस्तार कर रहे थे। उनलोगो ने ईरान, इराक, सीरिया, उत्तर अफ्रीका, स्पेन जैसे देशों को जीत लिया था। साथ ही साथ वो इस्लाम का प्रसार भी कर रहे थे। उनकी नजर भारत पर थी जिसके लिए लिए सिंध को जितना बहुत जरुरी था क्युकी सिंध ही भारत का प्रवेश द्वार था। सिंध पर कब्ज़ा किये बिना भारत जितने का और इतने बड़े देश में इस्लाम का प्रसार संभव नहीं था।

अरब का सिंध पर आक्रमण

तभी देवल बंदरगाह पर समुद्री लुटेरों ने अरब  के एक जहाज को लूट लिया। खलीफा उमर के अरब गवर्नर बसरा अल हज्जाज इब्न युसूफ (Basra Al Hajjaj Ibn Yusuf) ने मुआवजा माँगा जिसे राजा दाहिर ने ये कहकर इंकार कर दिया की समुद्री लुटेरों पर उनका नियंत्रण नहीं है। अरब खलीफा गुस्से से पागल हो गया। सिंध पर आक्रमण का सिलसिला चालू हो गया। पर राजा दाहिर के कुशल नेतृत्व और असाधारण युद्ध कौशल से हर बार अरब खलीफा की फ़ौज को हार का सामना करना पड़ा। 711 ईस्वी तक अरब फौजें राजा दाहिर को हरा नहीं पायी।

मोहम्मद बिन कासिम का सिंध पर आक्रमण 

712 ईस्वी में अरब शासक ने ये जिम्मेदारी मोहम्मद बिन कासिम (Mohammad Bin Qasim) को सौंपी। मोहम्मद  बिन कासिम ने सबसे पहले देवल बंदरगाह पर कब्ज़ा किया और लोगो का कत्लेआम करना शुरू किया। बच्चे, बूढ़े, जवान, औरतें किसी को नहीं बख्सा गया। पर राजा दाहिर सेन के रहते मोहम्मद बिन कासिम के लिए सिंधु नदी को पर करना असंभव था। इसलिए उसने हैदरपुर के बौद्ध राज्यपपाल मोक्षवास, देवल के राजा ज्ञान बुद्ध तथा जाट, गुर्जर और लोहना कबीलों को अपनी तरफ मिलाया। इसके बाद अरब सेना ने इरनकोट और राव नगर पर हमला करके जीत लिया। अंत में उसका मुकाबला राजा दाहिर  सेन से हुआ। कई दिनों तक लम्बे युद्ध चलने के बाद अरब सेना पराजय के कगार पर थी। 

युद्ध में पराजय निश्चित देखकर अरब सैनिकों ने सो रहे सिंध के सैनिकों पर धोखे से  हमला कर दिया। युद्ध कई दिनों तक चला। इस बार  भी अरब सेना को परास्त होना पड़ा।

राजा दाहिर की युद्ध भूमि में वीर गति  

बार बार पराजय से तंग आकर मोहम्मद बिन कासिम ने एक धोखे की साजिश रची। अपने कुछ सैनिकों को हिन्दू औरतों के वेश में राजा दाहिर में भेजा। वो औरतें (सैनिक) रोती बिलखती राजा दाहिर से मुस्लिम सैनिकों  उन्हें बचाने की गुहार लगाई। राजा दाहिर ने इन महिलाओं को सुरक्षित स्थान पर भेजने के बाद उस स्थान की ओर बढ़ गए जहा से उनकी रोने की आवाज आ रही थी। युध्द भूमि में वो अकेले पद गए जहाँ उनके हाथी पर बाण चलाये गए। जिस से वो खाई में गिर गया। राजा दाहिर अकेले बहुत वीरता से लड़े पर अंत में वीर गति को प्राप्त हुए। वो अपने मातृभूमि की रक्षा करते सदा के लिए मातृभूमि की गोद में सो गए। इधर औरतों के वेश महल में घुसे सैनिक अपने असली रूप में आ गए और कत्लेआम मचाना  शुरू किया। 

मोहम्मद बिन कासिम ने अंत में राजा दाहिर के सर काटकर खलीफा को भेट किया।  

राजा दाहिर की बेटियाँ (Raja Dahir Daughters)

राजा दाहिर की मृत्यु के बाद मोहम्मद बिन कासिम की सेना सिंध की और बढ़ी और राजमहल में घुसने का प्रयास किया। यहाँ भी  उनका स्वागत रानी लाडो और राजकुमारी सूर्य और परमाल के साथ महल के बाकि औरतों ने तीरों और भालों से किया। अरब सेना के लिए औरतों का युद्ध कौशल नया अनुभव था। अरब बहुत प्रयास करके भी  महल में घुस नहीं पाए। पर रानी को मोक्षवास के गद्दारी की भनक नहीं थी। इसी का फायदा उठाकर मोक्षवास महल में घुस गया तथा रात में चोरी से महल का दरवाजा खोल दिया जिस से अरब सैनिक महल में प्रवेश कर गए। रानी और बाकि औरतों ने जौहर की अग्नि में अपनी जान दे दी।

पर राजा की दो बेटियां पीछे रह गयी। उन्हे बंदी बना लिया गया। मोहम्मद बिन कासिम ने सोचा की इन राजकुमारियों को खलीफा को भेंट किया जाये। (इसी से बचने के लिए बाकि औरतों ने जौहर  कुंड में जान दी थी।) दोनों राजकुमारियों सूर्य और परमाल के ह्रदय में प्रतिशोध  की ज्वाला धधक रही थी।  उन्हें एक अवसर की तलाश थी। अब उन्हें अवसर मिला। राजकुमारियों को खलीफा के सामने पेश किया गया।  उनके रूप सौंदर्य को देखकर  खलीफा की ऑंखें चौंधिया गयी। ऐसी सुंदरता उसने पहले कभी नहीं देखी थी।

मोहम्मद बिन कासिम की मौत (Daith of Mohammad Bin Kasim)

जैसे ही उसने राजकुमारी को हाथ लगाया, राजकुमारी अचानक से पीछे हट गयी। रोते हुए बोली “महाराज हम आपके लायक नहीं है। आपके पास भेजने से पहले मोहम्मद बिन कासिम ने हमें तीन दिनों तक अपने साथ रखा। ” इस बात से खलीफा की ऑंखें गुस्से से लाल हो गयी। आँखों से अंगारे बरसने लगे। उसने तुरंत कासिम को बोरी में सिलकर लाने का हुक्म दिया। रास्ते में मोहम्मद बिन कासिम की दम  घुटने से मौत हो गयी। उसके बाद दोनों वीरांगनाओं ने भी “जय सिंध और जय दाहिर (Jai Sindh and Jai Dahir) कहते हुए अपनी जान दे दी। उनका प्रतिशोध पूरा हो चूका था। 

जौहर (Jauhar) – जब कोई मुस्लिम आक्रांता किसी हिन्दू राज्य पर आक्रमण करता था और जीत लेता था तो औरतें अपनी इज्जत बचाने और मुस्लिम सैनिकों के हाथ न आने पाए इसलिए अग्नि कुंड में कूद कर जान दे देती थी। 

राजा दाहिर और इमाम हुसैन (Raja Dahir and Imam Hussain)

राजा दाहिर का इस्लाम पर भी बहुत बड़ा उपकार रहा है। पैगम्बर मोहम्मद की मौत के बाद अरब कबीलों में खलीफा बनने की लड़ाई शुरू हो गयी। पैगम्बर मोहम्मद के खानदान के लोगों के खून के प्यासे  गए थे जिन्हें किसी भी कीमत पर इस्लाम का झंडाबरदार बनना था, पैगम्बर का उत्तराधिकारी बनना था। खलीफा  अल हज्जाज इब्न युसूफ ने पैगम्बर मोहम्मद के वंशजों को ढूंढ कर मारने  चलाई थी जिसमे उसने इमाम हुसैन (Imam Hussain) को मार भी दिया था। पर राजा दाहिर ने हुसैन एबीएन अली को शरण दी थी और उनकी रक्षा की थी जो पैगम्बर मोहम्मद के  वंशज थे। जिन्हे बाद में  पकड़ कर मौत के घाट उतर दिया गया था। 

उम्मीद है दोस्तों आपको Raja Dahir a National Hero की कहानी अच्छी लगी होगी। हमारे देश ने उन्हें भुला दिया है पर हमारा ये कर्त्तव्य है कि हम  रखे। अपने दिल में रखें  प्रेरणा ले। 

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