भारत में कितने श्रेणी की सुरक्षा मिलती है?पूरी जानकारी हिंदी में। SPG Z +, Z , Y +, Y , X श्रेणी

आज कंगना रानौत को Y+ सुरक्षा मिली है जिसकी चर्चा जोरों पर है। कंगना 61वीं वी आई पी हैं जिसे इस स्तर की सुरक्षा मिली है और वो पहली फिल्म स्टार भी हैं जिन्हें ये सुरक्षा मिली है। इन 61 लोगों में 38 राजनेता तथा 22 गैर राजनीतिक पृष्ठभूमि के लोग हैं।

इतना जानने के बाद हमारे मन में एक जिज्ञासा अवश्य आती होगी कि आखिर  Y+ सुरक्षा होती क्या है? ये कब और किसको मिलती है? इसमें किस तरह की सुरक्षा होती है? इसका भुगतान कौन करता है? आदि।
आज इस आर्टिकल में हम ना सिर्फ  Y+ सुरक्षा के बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे बल्कि हमारे देश में दी जाने वाली हर सुरक्षा की बात करेंगे।
इस आर्टिकल को पढ़ने के बाद आपकी सारी जिज्ञासा शांत हो जाएगी।
आप में से बहुत लोग इसके बारे में जानकारी रखते होंगे। पर इस आर्टिकल में आपको कुछ अलग भी मिलेगा।

कंगना रनौत को Y + स्तर की सुरक्षा क्यों मिली?

सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु के बाद देश में Social Media से लेकर सड़क पर एक आंदोलन सा छिड़ गया है। लोग सच्चाई जानना चाहते हैं। लोगों के दबाव का नतीजा है की इसकी जाँच CBI को सौंप दी गयी। इसमें कंगना रनौत  बहुत मुखर होकर अपनी बात रख रही है।

इसमें उसने मुंबई पुलिस  की जाँच पर सवाल उठाये जो महाराष्ट्र सरकार में बैठे लोगों को पसंद नहीं आया। इसपर कंगना ने मुंबई में POK (Pakistan Occupied Kashmir ) जैसी स्थिति होने की बात  कही और मुंबई पुलिस पर अविस्वास जताया था। इसपर शिव सेना के संजय राउत ने महाराष्ट्र और मुंबई के अपमान से जोड़ते हुए मुंबई न आने की धमकी दी।

इसके बाद कंगना के तस्वीरों और पोस्टरों पर शिव सेना के महिला कार्यकर्ताओं ने चप्पलों से मारकर विरोध जताया। कंगना ने केंद्र सरकार या हिमाचल प्रदेश की सरकार से सुरक्षा मांगी।

इसके बाद उन्हें केंद्र सरकार द्वारा Y + श्रेणी की सुरक्षा दी गयी।

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हमारे देश में दी जाने वाली सुरक्षा 

भारत में कुल 6 तरह की सुरक्षा दी जाती है।

#SPG (Special Protection Group)

SPG देश के आधुनिकतम सुरक्षा बल है। इसके सुरक्षा के दायरे में
1. प्रधानमंत्री और उनका परिवार
2. पुर्व प्रधानमंत्री (5 साल के लिए)
3. पुर्व राष्ट्रपति आते हैं।
इसमे सुरक्षाकर्मियों का चयन पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों पारा मिलिट्री फोर्स से किया जाता है।

इनके द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले हथियार 

SPG के जवान अत्याधुनिक हथियारों व सुरक्षा उपकरणों से लैस होते हैं।
इनके पास आटोमेटिक FNF 2000 Assault Rifles तथा Glok 17 पिस्टल होती है।
साथ ही SPG कमांडो  3rd Level Light Weight Bullet Proof Jackets पहनते हैं जिसका वजन मात्र 2.2 किलोग्राम होता है। ये जैकेट 10 मीटर की दुरी से चलाए गए ए के 47 के 7.62 कैलिबर की गोली को झेल सकते हैं।
इसके कमांडो इयर प्लग और वाकी टाकी से भी लैस होते हैं।
इनके जुते विशेष रूप से तैयार होते हैं जो जमीन पर फिसल नहीं सकते।
ये जवान चश्मा पहनते हैं जिसके उनकी आंखें किसी भी तरह के हमलों से बच सकें तथा किसी भी तरह के डिस्ट्रैक्सन से भी बचाव हो सके। 

SPG का गठन 

1981 से पहले प्रधानमंत्री के सुरक्षा की जिम्मेदारी दिल्ली पुलिस के स्पेशल ट्रेंड जवानो की होती थी।
अक्टूबर 1981 में IB (Intelligence Beuro ) द्वारा प्रधानमंत्री की सुरक्षा के लिए एक विशेष टास्क फोर्स का गठन किया गया।
अक्टूबर 1984 के बाद इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद ये महसूस किया गया कि प्रधानमंत्री की सुरक्षा की जिम्मेदारी एक स्पेशल सुरक्षा दस्ता की होनी चाहिए।
18 फरवरी 1985 मे गृह मंत्रालय द्वारा बीरबल नाथ समिति की स्थापना की गई जिसने मार्च 1985 में एक Special Protection Unit (SPU) के गठन की सिफारिश की।
30 मार्च 1985 को भारत के राष्ट्रपति नें कैबिनेट सचिवालय के तहत इस युनिट की स्थापना की जिसे SPG
नाम दिया गया।
SPG कैबिनेट सचिवालय के अंदर काम करता है। इसका प्रमुख डायरेक्टर लेवल का IPS Officer होता है जिसका कार्यकाल 3 वर्षों का होता है।
इसका मुख्यालय नई दिल्ली में प्रधानमंत्री आवास में हीं होता है।
ये फोर्स एक डिफेंसिव फोर्स (Defensive Force ) है ना कि अटैकिंग फोर्स (Attacking Force )। इसका मतलब इसकी ट्रेनिंग एक बचाव दल के रूप में होती है न की आक्रमण करने वाले के रूप में।

 Z+ श्रेणी की सुरक्षा

ये एस पी जी सुरक्षा के बाद दुसरे स्तर की सुरक्षा है। आज ये सुरक्षा कुछ खास लोगों को मिली है जिनमें केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह तथा गांधी परिवार शामिल है। 
इसमें 55 अलग अलग सुरक्षा बलों के जवान होते हैं जैसे RPF, ITBP, CRPF लोकल पुलिस आदि। इनमें से 10 NSG (National Security Guard ) भी शामिल होते हैं।
इस स्तर की सुरक्षा में एस्काॅर्ट गाड़ी भी होती है। 

Z श्रेणी की सुरक्षा

इसमें 30 हथियार बंद जवान होते हैं जो मोबाइल सेक्युरिटी तथा आवासीय सेक्युरिटी में बंटे होते हैं।

इस स्तर की सुरक्षा में एस्काॅर्ट गाड़ी भी होती है।

Y+ श्रेणी की सुरक्षा

इस स्तर की सुरक्षा में CRPF के 5 जवान के साथ साथ एक कमांडर भी होते हैं जो कि आवास पर सुरक्षा देते हैं। इसके अलावा 6 Personal Security Officers (PSO) होते हैं जो हमेशा साथ में रहते हैं तथा तीन शिफ्ट के रोटेशनल ड्यूटी पर रहते हैं।
मतलब सुरक्षा मिले व्यक्ति के साथ 24 घंटे दो सुरक्षा कर्मी तैनात रहते हैं।
कंगना रानौत 15 Y+ सुरक्षा प्राप्त लोगों में से एक है। ये सुरक्षा देश के मुख्य न्यायाधीश एस ए बोबडे तथा कानुन मंत्री रविशंकर प्रसाद को भी मिली है।

 Y श्रेणी की सुरक्षा

इस स्तर की सुरक्षा में कुल 8 जवान सुरक्षा ड्यूटी में होते हैं। जिनमें से 4 जवान तथा 1 कमांडर आवास की सुरक्षा मे लगे होते हैं।
3 हथियार बंद जवान 3 अलग अलग शिफ्ट में सुरक्षित व्यक्ति के साथ लगे होते हैं।
इसका मतलब सुरक्षित व्यक्ति की सुरक्षा के लिए 24 घंटे उसके साथ 1 हथियार बंद जवान तैनात रहता है।

 X श्रेणी की सुरक्षा

ये बिल्कुल बेसिक लेवल की सुरक्षा होती है। इसमें तीन सुरक्षा कर्मी तीन शिफ्ट मे काम करते हैं। इसमें आवास पर कोई सुरक्षा नहीं मिलती।
इसमें राज्य की पुलिस भी शामिल होती है।
अब तक अलग अलग स्तर की सुरक्षा करीब 300 लोगों को मिल चुकी है जिसमें हजारों जवान ड्युटी कर रहे हैं।

ये सुरक्षा किसे और कब मिलती हैं।

इस तरह की सुरक्षा दो तरह से मिलती है। पहली आपके पद पर बने रहने के कारण और दुसरा अगर आपके जीवन को खतरा हो और सरकार और सिविल सोसायटी के गणमान्य व्यक्ति हों। 
जब आप सुरक्षा के लिए स्वयं अप्लाई करते हैं या सरकार को ऐसा लगता है तो आपको ये सुरक्षा मिल सकती है। 
पर इसके लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय विभिन्न इंटेलिजेंस एजेंसी जैसे कि IB (Intelligence Beuro ) R&AW (Research and Analysis Wing) के रिपोर्ट की समीक्षा करने के बाद आपको सुरक्षा देने व न देने का निर्णय लेगा।
ये सुरक्षा आपको पुरे देश में या किसी खास क्षेत्र में देना है ये भी डिसाइड किया जाएगा।
इस सुरक्षा के खर्च कौन देगा 
ये सभी सुरक्षा के खर्च का वहन सरकार करती है।  पर सुरक्षा कर्मियों के आवास की व्यवस्था आपको करन होता है।
पुर्व मुख्य न्यायाधीश पी सदाशिवम को रिटायर्मेंट के पहले Z+ स्तर की सुरक्षा मिली थी तथा रिटायर्मेंट के बाद Z स्तर की सुरक्षा मिली। रिटायर्मेंट के बाद उन्होंने अपनी सुरक्षा वापस कर दी क्योंकि उन्हें अपने पैतृक घर में शिफ्ट होना था। तथा वहाँ सुरक्षा कर्मियों के आवास की व्यवस्था नहीं थी।
रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी एक मात्र ऐसे शख्स हैं जो अपनी सुरक्षा के खर्च का वहन स्वयं करते हैं।
उम्मीद है आपको हमारे देश में मिलने वाली विभिन्न श्रेणियों की सुरक्षा के बारे में पूरी जानकारी मिली होगी।
ब्लॉग को फॉलो करते रहें। आपको इस तरह की जानकारियाँ हमेशा मिलती रहेंगी। 

शिक्षक दिवस कब और क्यों मनाते हैं? इसके पीछे की कहानी, महत्व आदि

हम प्रति वर्ष बहुत सारे दिवस मनाते हैं। जैसे मदर्स डे, फादर्स डे, फ्रेंडशिप डे इत्यादि। 

साथ हीं हम शिक्षक दिवस यानी टीचर्स डे भी मनाते हैं।
शिक्षक दिवस कब मनाया जाता है इसके बारे में बहुत लोगों को जानकारी होगी।
पर आपके मन में ये सवाल अवश्य आते होंगे कि हम शिक्षक दिवस कब और क्यों मनाते हैं? इसके पीछे की कहानी क्या है?
अगर आपको इसकी जानकारी नहीं है तो आपके लिए ये आर्टिकल कमाल का होने वाला है।
और अगर ये आप जानते हैं तो भी ये आर्टिकल पढें क्योंकि इसमें बहुत सारी ऐसी बातें कवर होंगी जिसे आपको जानना चाहिए।
#शिक्षक दिवस क्या है?
शिक्षक दिवस एक तरीका है जिससे हम अपने जीवन में आए और नहीं भी आए शिक्षकों को सम्मानित करने का।
शिक्षक दिवस मनाना क्यों चाहिए?
सर्वप्रथम हमें ये सोचना चाहिए कि हमें शिक्षक दिवस मनाना क्यों चाहिए? इसकी आवश्यकता क्या है?
हमारे देश और संस्कृति में हम हर उस प्राणी का सम्मान करते हैं जिसने हमारे जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और प्रभाव डाला हो। और एक शिक्षक से अधिक सकारात्मक भूमिका हमारे जीवन में कौन अदा कर सकता है?
ये हमारे लिए अपने शिक्षक के सम्मान का तरीका है। इससे हम सिद्ध करना चाहते हैं कि हमारे जीवन में शिक्षक का कितना महत्व है।

#शिक्षक दिवस कब मनाया जाता है।

विश्व के विभिन्न देशों में अलग अलग दिनों को शिक्षक दिवस मनाया जाता है।

अन्तरराष्ट्रीय शिक्षक दिवस प्रति वर्ष 5 अक्टूबर को मनाया जाता है।   

भारत में प्रति वर्ष 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है।
#शिक्षक दिवस 5 सितंबर को हीं क्यों मनाया जाता है?
प्रति वर्ष 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाते हैं। पर ये सवाल भी वाजिब है कि ऐसा क्यों?  हम 5 सितंबर को हीं शिक्षक दिवस क्यों मनाते हैं।
इसके लिए हमें हमारे प्रथम उपराष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के बारे में जानना पडे़गा। ये एक शिक्षक भी थे।
इनके जन्मदिन के अवसर पर प्रति वर्ष हम शिक्षक दिवस के रूप में मनाते हैं।

#शिक्षक दिवस मनाने के पीछे की कहानी।
डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन एक बहुत हीं गरीब और साधारण परिवार में जन्मे थे। उन्हें अपना जन्मदिन मनाने का ना तो मौका था और ना हीं शौक।
एक बार उपराष्ट्रपति बनने के बाद उनके दोस्तों नें उनसे अपना जन्मदिन मनाने की बात की।
डॉ राधाकृष्णन नें आज तक अपना जन्मदिन मनाया नहीं था। वो एक शिक्षक रह चुके थे और शिक्षक का महत्व उन्हें बेहद अच्छी तरह से पता था।
दोस्तों के आग्रह पर उन्होंने कहा कि उनकी इच्छा है कि उनके जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाए तो उन्हें बहुत पसंद आएगा।
तभी से 5 सितंबर को प्रति वर्ष शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।
#शिक्षक दिवस कैसे मनाया जाता है।
हर देश में शिक्षक दिवस अलग अलग दिनों को और अलग अलग तरीके से मनाया जाता है। कुछ देशों में इस दिन छुट्टी होती है। पर हमारे देश में शिक्षक दिवस के दिन छुट्टी नहीं होती है। पर शिक्षकों को काम नहीं करने दिया जाता है। इस दिन उनको सम्मानित किया जाता है।
विद्यालयों में अलग अलग सांस्कृतिक कार्यक्रम किये जाते हैं। लेखन और पठन की प्रतियोगिता आयोजित की जाती हैं।
शिक्षकों के सम्मान में कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
शिक्षक दिवस मनाने का सरकारी तरीका।
सरकार

#शिक्षक दिवस और गुरु पूर्णिमा।
हमारे देश में आजादी के बाद 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाने लगा। तो क्या इसके पहले हम शिक्षकों के सम्मान नहीं करते थे?
ऐसा बिल्कुल नहीं है।
हमारे देश में प्राचीनकाल से हीं जब पुरी दुनिया अभी सभ्यता सीख रही थी हम अपना जीवन में शिक्षा और शिक्षक का महत्व समझ गए थे। हमारे देश व संस्कृति में शिक्षक या गुरु का महत्व भगवान से भी अधिक दिया गया है।
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुदेवोमहेश्वर:
गुरुर्साक्षात परमब्रह्म: तस्मैश्रीगुरुवेनम:।।
मतलब गुरु हीं ब्रह्मा है, गुरु हीं विष्णु हैं, गुरु हीं शिव हैं। गुरु साक्षात ब्रह्म हैं जिन्हें हम नमन करते हैं।
हम प्राचीन काल से ही आषाढ माह की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाते आ रहे हैं।

#शिक्षक दिवस के दिन दिए जाने वाले पुरस्कार।

शिक्षक दिवस के दिन भारत के राष्ट्रपति उत्कृष्ट योगदान के लिए शिक्षकों को सम्मानित करते हैं।

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#डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का संक्षिप्त जीवन परिचय

डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन स्वतंत्र भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति थे। इन्हें 1962 में भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद के कार्यकाल समाप्त होने के बाद राष्ट्रपति भी बनाया गया।
इनका जन्म 5 सितंबर 1888 को तमिलनाडु के तिरुतनी गांव में हुआ था। बेहद गरीब परिवार में जन्मे डॉ राधाकृष्णन एक शिक्षक के रूप में अपना कैरियर शुरू किए। इनका हमारे देश में शिक्षा और राजनीति में बहुत बड़ा योगदान है।
नोट : – डॉ राजेंद्र प्रसाद एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं जो दो बार राष्ट्रपति पद पर रहे हैं।

जन्म – 5 सितम्बर 1888 की तमिलनाडु के तिरुतनी गाँव में।

आरम्भिक शिक्षा गौड़ी स्कूल और तिरुपति मिशन स्कूल में हुई।

1903 में 16 वर्ष की आयु में ही इनकी शादी शिवकामु से हो गयी।

उच्च शिक्षा मद्रास क्रिस्चियन कॉलेज में हुई।

1916 में दर्शन शास्त्र में एम ए

1916 में ही मद्रास रेजीडेंसी कॉलेज में सहायक प्राध्यापक के रूप में नियुक्ति।

1937 में दर्शन शास्त्र के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए साहित्य के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया।

1952 में उपराष्ट्रपति

नोट – उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति होता है। इसका मतलब जो भी व्यक्ति उपराष्ट्रपति के पद  पर रहेगा वो राज्यसभा का सभापति होगा।

1954 में शिक्षा व राजनीती के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए भारत सम्मान से पुरस्कृत किया गया।

1962 में भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद के कार्यकाल समाप्त होने के बाद इन्हे राष्ट्रपति बनाया गया।

1962 से ही प्रति वर्ष 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।

नोट – डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद एकमात्र ऐसे राष्ट्रपति रहे हैं जो दो बार राष्ट्रपति रहे।

17 अप्रैल 1975 में इनका निधन हो गया।

अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक दिवस प्रति वर्ष 5 अक्टूबर को मनाया जाता है।

डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन द्वारा लिखी गयी पुस्तकें

  1. Hindu View of life
  2. An idealistic view of life

पुस्तकें वो साधन हैं जिनके माध्यम से हम विभिन्न संस्कृतियों के बीच पुल का निर्माण कर सकते हैं।

शिक्षण कार्य को एक पेशे के रूप में नहीं बल्कि “जीवन धर्म ” (जीवन जीने का एक तरीका) के रूप में अपनाना चाहिए।

शिक्षकों को उच्च सम्मान देकर भारत पुनः विश्वगुरु की पदवी प्राप्त कर सकता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।

प्रति वर्ष शिक्षक दिवस की पूर्व संध्या को राष्ट्रपति शिक्षकों को राष्ट्रीय सम्मान से पुरस्कृत करते हैं। इस पुरस्कार द्वारा प्राथमिक विद्यालयों, माध्यमिक विद्यालयों तथा उच्च विद्यालयों के उत्कृष्ट शिक्षकों को पुरस्कृत करके उनका आभार प्रकट किया जाता है।

सी बी आई क्या है और कैसे काम करता है? पूरी जानकारी हिंदी में।

दोस्तों जब से सुशांत सिंह राजपूत के आत्महत्या की खबर आयी है तभी से देश में एक उबाल है। लोग ये मानने के लिए तैयार ही नहीं हैं सुशांत सिंह राजपूत जैसे खुशमिजाज, सफल अभिनेता आत्महत्या भी कर सकता है। पहले इसकी जाँच मुंबई पुलिस कर रही थी। फिर सुशांत के पिता ने गर्लफ्रेंड रिया चक्रवर्ती के खिलाफ पटना में FIR कर दिया। तब से बिहार पुलिस भी जाँच में लग गयी। पर बिहार पुलिस को जाँच कार्य में मुंबई पुलिस का सहयोग नहीं मिला। उलटे बिहार पुलिस के एक तेज तर्रार IPS Officer विनय तिवारी को Quarantine कर दिया गया। 

तब से बिहार और महारष्ट्र पुलिस के बिच विवाद खुल कर सामने आ गया। इधर बिहार सरकार ने CBI Investigation (जाँच) की  सिफारिश कर दी। 

अब प्रश्न ये उठता है की CBI क्या है? CBI जाँच कैसे करती है? CBI की स्थापना कब और कैसे हुई? CBI कब और किसके आदेश पर जाँच कर सकती है? आदि। 

कोशिश  करता हु कि आपके सभी सवालों का जवाब आज इस आर्टिकल में मिल जायेगा। 

CBI Logo

# CBI क्या है?

CBI यानि Central Bureau of Investigation (केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो) देश की सबसे बड़ी जाँच एजेंसी है। इसके जाँच के दायरे में पहले केवल केंद्र सरकार के कर्मचारी और अधिकारियों के भ्रस्टाचार के  मामले  आते थे। फिर सरकारी उपक्रमों के कर्मचारियों के भ्रष्टाचार के मामले की जाँच भी आने लगे। 

1969 में बैंकों के राष्ट्रीयकरण (Nationalisation of Banks) के बाद सरकारी बैंक के कर्मचारी और अधिकारी भी CBI के जाँच के दायरे में आ गए। 

संस्थापक महानिदेशक (Founder Director)

CBI  के संस्थापक महानिदेशक D. P. Kohli थे। ये 1 अप्रैल 1963 से 31 मई 1968 तक CBI के निदेशक रहे। इसके पहले 1955 से 1963 तक SPE (Special Police Establishment) के पुलिस महानिरीक्षक रहे। 

इन्हें 1967 में विशिष्ट सेवाओं के लिए पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

#CBI का इतिहास 

1941 में भारत के ब्रिटिश सरकार को दूसरे विश्व युद्ध के दौरान रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार के मामलों की जाँच पड़ताल के लिए SPE यानि Special Police Establishment की  स्थापना की। SPE भारत सरकार के आपूर्ति विभाग के साथ मिलकर  कार्य करता था। जो की युद्ध विभाग के अधीन था। 

दूसरे विश्व युद्ध के बाद सरकार को  केंद्र सरकार के कर्मचारियों और अधिकारीयों में रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार के मामलों की जाँच के लिए एक केंद्रीय जाँच एजेंसी की आवश्यकता महसूस हुई। 

1946 में Delhi Special Police Establishment Act  बना जो गृह मंत्रालय (Home Ministry) के अधीन था। 

इसके अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत केंद्र सरकार के सभी विभाग आते थे।  तथा इसका विस्तार संघ शाषित प्रदेशों (Union Territories) तक भी था। इसका विस्तार सम्बंधित राज्य सरकारों की सहमति से राज्य तक भी हो सकता था। 

1963 में गृह मंत्रालय के 1 अप्रैल 1963 के संकल्प के जरिये Delhi Special Police Establishment को  CBI नाम दिया गया। 

शुरुआत में CBI का कार्य सिर्फ केंद्र सरकार के कर्मचारियों  अधिकारीयों के भ्रष्टाचार के मामले की जाँच करना था। बाद में इसमें सरकारी क्षेत्र के उपक्रमों के कर्मचारियों  अधिकारीयों के भ्रष्टाचार के मामले की जाँच करने का भी जिम्मा दे दिया गया। 

1965 में CBI को भ्रष्टाचार के अलावा हत्या, अपहरण, आतंकवाद और अन्य विशिष्ट अपराधों के जाँच का भी जिम्मा दे दिया गया। 

1969 में बैंकों के राष्ट्रीयकरण (Nationalisation of Banks) के बाद सरकारी बैंक के कर्मचारी और अधिकारी भी CBI के जाँच के दायरे में आ गए। 

शुरू में CBI में दो विंग काम करते थे। 

  1. सामान्य अपराध विंग (General Offences Wing) जिसके  अंतर्गत सरकारी  अधिकारीयों के साथ साथ सरकारी उपक्रमों में व्याप्त भ्रष्टाचार का जाँच करना था। इसकी शाखा हर राज्य में है। इसका कार्यालय हर राज्य  में है। 
  2. आर्थिक अपराध विंग (Economic Offences Wing) जिसका काम आर्थिक राजकोषीय  उल्लंघन का जाँच करना था। इसका कार्यालय चारो महानगरों (दिल्ली, कोलकाता, मुंबई और चेन्नई) में है। 

1987 में CBI में दो जाँच विभाग बनाये गए। 

  1. भ्रष्टाचार निरोधक विभाग (Anti Corruption Division)
  2. विशेष अपराध विभाग (Special Crime Division)
#CBI महानिदेशक (CBI Chief) 

CBI एक महानिदेशक के अधीन काम करती है। जिसकी नियुक्ति प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली एक चयन समिति करती है। चयन समिति में दो और सदस्य होते हैं। एक विपक्ष का नेता और दूसरा भारत के मुख्य न्यायाधीश। मुख्य न्यायाधीश की अनुपस्थिति में सुप्रीम कोर्ट के कोई अन्य न्यायाधीश। 

Lokpal and Lokayukta Act 2013  के आने के पहले CBI के महानिदेशक का चुनाव CVC (Central Vigilance Commission) द्वारा किया जाता था। 

गृह मंत्रालय वरिष्ठता और अनुभव के आधार पर अधिकारीयों  की एक सूची कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग यानि DOPT यानि Department of Personel and Training को भेजता है। इस सूची को DOPT चयन समिती को भेजता है। उनमे से चयन समिती CBI Director यानि CBI Chief नियुक्त करती है। 

#कार्यकाल

CBI निदेशक का कार्यकाल 2 साल का होता है। 

इसे चयन समिती के फैसले के बगैर सरकार न तो कार्यकाल काम कर सकती है और न ही पद से हटा सकती है। 

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National Recruitment Agency और Common Eligibility Test क्या है?

भारत की नई शिक्षा नीति 2020 की संपूर्ण जानकारी हिंदी में

#CBI अधिकारीयों की रैंक CBI Officers Rank 
  1. Director 
  2. Special Director/Additional Director 
  3. Joint Director 
  4. Deputy Inspector General of Police 
  5. Inspector 
  6. Sub Inspector 
  7. Assistant Sub Inspector 
  8. Head Constable 
  9. Constable 

#CBI जाँच कैसे होती है? (CBI Janch Kaise Hoti Hai)

CBI किसी भी मामले की जाँच तीन तरीकों से कर सकती है।

Delhi Special Police Establishment Act का Section 5 CBI को पुरे देश में कहीं भी जाँच करने का पावर देता है। पर उसी Act का Section 6 किसी राज्य में मामलों की जाँच करने के लिए राज्यों की सहमति की बात करता है।

1. मामला अगर केंद्र सरकार में भ्रष्टाचार का है तो केंद्र सरकार मामले की जाँच CBI को सौप सकती है।

मामला अगर राज्य के अंदर का हुआ जिसमे राज्य की पुलिस  अधिकारिता है तब राज्य सरकार केंद्र से CBI जाँच की सिफारिश करेगी तब केंद्र सरकार CBI को जाँच का जिम्मा सौपेगी।

2. राज्य के मामलों में CBI जाँच के लिए राज्य की सहमति आवश्यक है।

ये सहमति भी दो तरह की होती है।

  1. General Consent – ये  राज्य सरकार द्वारा दिया गया स्थायी सहमति है। इसके अनुसार CBI केंद्रीय कर्मचारियों द्वारा किये गए भ्रष्टाचार के मामलों जाँच  कर सकता है। भले ही वो किसी भी राज्य में हों।
  2. Case Specific Consent – ये सहमति राज्य सरकार किसी खास मामलों के जाँच के लिए देती है।

3. अगर सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट को लगता है की किसी खास मामले की जाँच CBI द्वारा की जानी चाहिए तो वो आदेश दे सकता है। इसमें राज्य सरकार के सहमति की आवश्यकता नहीं है।

उम्मीद है आपको CBI के बारे में ये जानकारी अच्छी लगी होगी।

National Recruitment Agency और Common Eligibility Test क्या है?

केंद्रीय कैबिनेट ने एक National Recruitment Agency स्थापित करने का फैसल लिया है जो Railway Recruitment Board (RRB), Staff Selection Commission (SSC) और Indian Banking Personnel Selection (IBPS) के परीक्षा के लिए एक Common Eligibility Test आयोजित करेगा। इन तीनो रिक्रूटमेंट एजेंसी के लिए प्रारंभिक परीक्षा बस एक एजेंसी NRA लेगी। जिससे छात्रों का समय, पैसा, श्रम सब कुछ की बचत होगी। National Recruitment Agency क्या है? कैसे काम करेगा? इसके फायदे क्या हैं? इसकी आवश्यकता क्यों थी? इन सारे प्रश्नों का उत्तर इस आर्टिकल में मिलेगा।

प्रति वर्ष करीब 1.25 लाख सरकारी नौकरियां RRB (Railway Recruitment Board), IBPS (Indian Banking Personal Selection)  SSC (Staff Selection Commission) आयोजित करती है जिसके लिए 2.5 से 3 करोड़ छात्र परीक्षा देते हैं।

अलग अलग पदों और नौकरियों के लिए छात्रों को अलग अलग परीक्षाएं देनी पड़ती हैं। इससे उन्हें तरह तरह की परेशनियां आती हैं।

सरकार ने इस परेशानी को  दूर करने का निर्णय लिया है।

केंद्रीय कैबिनेट ने छात्रों को अलग अलग सरकारी नौकरियों के लिए अलग अलग परीक्षाओं से निजात देने का फैसला किया है। इसके लिए कैबिनेट ने National Recruitment Agency की स्थापना करेगी जो एक Common Eligibility Test लेगी जिसका उपयोग विभिन्न सरकारी नौकरियों के प्रारंभिक परिक्षा के रूप में किया जायेगा।

National Recruitment Agency क्या है?

National Recruitment Agency एक स्वायत्त संस्था होगी जिसका काम सरकारी नौकरियों के लिए Common Eligibility Test कराना होगा। ये Indian Societies Act से रजिस्टर्ड होगा।

देश में करीब 20 ऐसी एजेंसी हैं जो सरकारी नौकरियों के लिए परीक्षाएं लेती हैं। National Recruitment Agency ने उनका काम आसान कर दिया है।

इसमें अभी केवल तीन एजेंसी के लिए परीक्षाएं लेने की जिम्मेदारी  दी जाएगी।

  1. RRB (Railway Recruitment Board)
  2. IBPS (Indian Banking Personal Selection)
  3. SSC (Staff Selection Commission)

आगे इसमें बाकि परीक्षाओं को भी शामिल किया जा सकता है।

National Recruitment Agency द्वारा एक आम पात्रता परीक्षा का आयोजन किया जायेगा। इसको Common Eligibility Test कहा जायेगा।

Common Eligibility Test प्रति वर्ष दो बार आयोजित किया जायेगा। इसका स्कोर तीन वर्ष तक मान्य रहेगा। मतलब एक परीक्षार्थी इस टेस्ट के स्कोर के आधार पर तीन वर्ष तक विभिन्न सरकारी नौकरियों के मुख्य परीक्षा के लिए आवेदन दे सकता है।

इस स्कोर  में सुधार के लिए आगामी परीक्षा में बैठ सकता है।

प्रत्येक जिले में एक परीक्षा केंद्र होगा।

परीक्षाएं अभी 12 अलग अलग भाषाओँ में होगी जिसको बाद में भारतीय संविधान के आठवीं अनुसूची (8th Schedule of Indian constitution) मे शामिल सभी 22 भाषाओं में भी ली जाएँगी।

Common Eligibility Test कैसे ली जाएगी?

ये टेस्ट प्रत्येक जिले में, हर पद के लिए Online ली जाएगी।

कौन Common Eligibility Test दे सकेगा? Who can appear for Common Eligibility Test 

RRB, IBPS, SSC में अलग अलग पदों के लिए अलग अलग योग्यताएं निर्धारित होती हैं। जैसे किसी पद के लिए 10वीं पास तो किसी के लिए 12वीं पास तो किसी के लिए स्नातक।

ये टेस्ट भी अलग अलग लिए जायेंगे। प्रश्न पत्र भी अलग अलग स्तर के होंगे।

भारत की नई शिक्षा नीति की संपूर्ण जानकारी हिंदी में लें  

 इसमें कौन कौन सी नौकरियां शामिल होंगी?

इसमें RRB, IBPS, SSC द्वारा ली जाने वाली सभी परीक्षाएं शामिल होंगी। ये सभी परीक्षाएं अराजपत्रित (Non Gazzeted) होती हैं। जैसे

RRB Group D (Railway Recruitment Board Group D)

RRB NTPC (Railway Recruitment Board, Non Technical Popular Category)

SSC CGL (Staff Selection Commission Combined Graduate Level)

SSC CHSL (Staff Selection Commission Combined Higher Secondary Level)

SSC MTS (Staff Selection Commission Multi Tasking Staff)

SSC JHT (Staff Selection Commission Junior Hindi Translator)

IBPS (Indian Banking Personal Selection)

ये भी पढ़ें  इसमें UPSC द्वारा ली जाने वाली Civil Service की परीक्षा  नहीं शामिल होगी। और ऐसी कोई भी राजपत्रित अधिकारियो के चयन वाली परीक्षा शामिल नहीं होगी।

इसके फायदे (Advantage)

एक कॉमन परीक्षा होने से परीक्षार्थी के अलग अलग नौकरियों के आवेदन शुल्क नहीं देने पड़ेंगे।

परीक्षार्थीयों को थकाऊ और बेकार की यात्रा से निजात मिलेगी। इससे उनके पैसे बचने के साथ साथ परेशानी से भी बचाव होगा। विशेष रूप से लड़कियों को यात्रा की परेशानियों से बचाव होगा।

एक बार हुई परीक्षा  स्कोर तीन वर्षों तक मान्य रहेगा।

विभिन्न भाषाओं में प्रश्न पत्र होने और उत्तर के विकल्प होने से छात्रों  फायदा होगा।

चयन में समय (Recruitment Cycle) कम होगा। जब छात्र अलग अलग आवेदन करते थे तब उन्हें कई परीक्षाएं देनी पड़ती थी। इस वजह से किसी नौकरी के चयन में जो समय लगता था वो ज्यादा होता था। पूरी चयन प्रक्रिया लम्बी हो जाती थी। कई बार एक ही छात्र का अलग अलग पदों पर एक साथ चयन हो जाने से ये प्रक्रिया लम्बी होती थी। अब एक आवेदन और एक परीक्षा से चयन प्रक्रिया में लगने वाला समय काम होगा।

क्या RRB, SSC, IBPS समाप्त हो जाएँगी? Will RRB, SSC, IBPS be abolished?

अगर ये प्रश्न आपके मन  इसलिए  रहा है की National Recruitment Agency के आ जाने से RRB, IBPS, SSC को समाप्त कर दिया जायेगा? तो इसका उत्तर है नहीं। ये संस्थाएं भी बनी रहेंगी और अपना काम करती रहेंगी।

National Recruitment Agency द्वारा लिया जाने वाला Common Eligibility Test केवल प्रारंभिक परिक्षा होगा। इसके बाद अभ्यर्थी को, जिस पद और विभाग में नौकरी करनी है उसमे मुख्य परीक्षा और साक्षात्कार के लिए आवेदन देना होगा। Final Selection वहीं एजेंसी या विभाग करेगा जिसमे नौकरी है।

National Recruitment Agency ठीक उसी तरह काम करेगा जिस तरह से National Testing Agency काम करती है।

National Testing Agency, Medical और IIT की परीक्षा आयोजित करती है। 

Common Eligibility Test का स्कोप 

अभी ये परीक्षा केवल तीन विभागों के लिए ली जाएँगी। पर आगे इसमें देश के 20 Recruitment Agency में से सबको शामिल किया जा सकता है।

बाद में इसके स्कोर को राज्य सरकारों और सरकारी उपक्रमों से भी साझा किया जा सकता है।

निजी कंपनियों से भी इसका स्कोर साझा किया जा सकता है।

इस एक परीक्षा के स्कोर से आपके लिए नौकरियों के दरवाजे खुल सकते हैं।

National Recruitment Agency की जरुरत क्यों थी? Why National Recruitment Agency needed?

Department of Personal & Training के secretary C. Chandramauli के अनुसार हर साल 1.25 लाख नौकरियों के लिए करीब 2.5 करोड़ छात्र आवेदन करते हैं। जिसके लिए ये छात्र हर परीक्षा के लिए अलग आवेदन करते हैं। अलग अलग परीक्षा केंद्रों पर जाकर परीक्षा देनी पड़ती है। जिससे उन्हें परेशानियों का सामना  करना पड़ता है। विशेष रूप लड़कियों को बहुत अधिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

National Recruitment Agency के आने से ये परेशानी दूर हो जाएगी। अब छात्रों को न तो अलग अलग आवेदन करने होंगे और न ही लगा लगा परीक्षा केंद्रों की यात्रा करनी होगी।

सरकार को भी परिक्षाएं आयोजित करने में आसानी रहेगी।

भारतीय इतिहास के महान दानवीर कर्ण, राजा बलि, राजा शिवि, राजा मोरध्वज, महर्षि दधीचि

हमारे देश, धर्म और संस्कृति में दान का बहुत बड़ा  महत्व है। कहा जाता है आपके पास जो भी है उसमे से कुछ हिस्सा उन जरूरतमंदों को दान करते हैं तो ये सबसे बड़ा पुण्य का काम है। वो चीज चाहे आपकी विद्या हो, धन हो, शारीरिक श्रम हो या कुछ और। 

दान धन का ही हो, यह जरुरी नहीं, भूखे को रोटी, बीमार का उपचार, किसी व्यथित व्यक्ति को अपना समय, उचित परामर्श, आवश्यकतानुसार वस्त्र, सहयोग, विद्या जिसको जिस चीज की आवश्यकता हो और वो हमारे पास हो। जब हम  कुछ पाने  की अपेक्षा नहीं करते, यही सच्चा दान है।

रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि परहित के समान कोई धर्म नहीं है और दूसरों को कष्ट देने के समान कोई पाप नहीं है। इसी तरह संस्कृत में एक  श्लोक है “परोपकाराय पुण्याय, पापाय परपीड़नाम”।

दानो में विद्या दान सबसे बड़ा दान है क्योंकि ये आपके अंदर की ऐसी संपत्ति है देने से घटती नहीं है बल्कि बढ़ती जाती है। 

आजकल अंग दान का महत्व भी बहुत गया है। अंग दान और रक्त दान से आप किसी को  जीवन दान देते हैं। जो दान किसी जीव के प्राणों की रक्षा करे उससे उत्तम और क्या हो सकता है? हमारे शास्त्रों में ॠषि दधीची का वर्णन है जिन्होंने अपनी हड्डियाँ तक दान में दे दी थीं, कर्ण का वर्णन है जिसने अपने अन्तिम समय में भी अपना स्वर्ण दंत याचक को दान दे दिया था। देना तो हमें प्रकृति रोज सिखाती है, सूर्य अपनी रोशनी, फूल अपनी खुशबू, पेड़ अपने फल, नदियाँ अपना जल, धरती अपना सीना छलनी कर के भी दोनों हाथों से हम पर अपनी फसल लुटाती है। इसके बावजूद न तो सूर्य की रोशनी कम हुई, न फूलों की खुशबू, न पेड़ों के फल कम हुए न नदियों का जल, अत: दान एक हाथ से देने पर अनेकों हाथों से लौटकर हमारे ही पास वापस आता है बस शर्त यह है कि निस्वार्थ भाव से श्रद्धा पूर्वक समाज की भलाई के लिए किया जाए।

हमारे इतिहास और संस्कृति में हजारों लाखों महान पुरुष मिलेंगे जिन्होंने दानवीरता में बड़े कीर्तिमान स्थापित किये हैं। इनमे से कुछ प्रमुख नाम हैं राजा बलि, राजा शिवि, दानवीर कर्ण, महर्षि दधीचि और राजा मोरध्वज। 

  1. #राजा बलि की दानवीरता 

जब राजा बलि (भक्त प्रह्लाद के पोते)  शक्तियाँ  बहुत अधिक बढ़ गयी और देवों को युद्ध में पराजित होना पड़ा तो देवराज इंद्रा को चिंता हुई। (आपको पता होना चाहिए की देवराज इंद्रा का पद स्थायी नहीं है। कोई भी अपने सद्कर्मों से देवराज का पद प्राप्त कर सकता है ) देवराज भगवान विष्णु की शरण में गए। भगवन विष्णु वामन अवतार लेकर राजा बलि के दरबार में गए  और बलि से दान में तीन पग जमीन माँगा। राजा बलि बहुत बड़े दानवीर थे और फिर सोचे कि एक वामन तीन पग में कितनी जमीन ले सकता है ? बोले महाराज ये क्या मांग दिया आपने? कुछ बड़ी चीज मांगो। धन दौलत, सोना चाँदी, आभूषण, वस्त्र इत्यादि, पर भगवान ने बस तीन पग जमीन ही माँगा। बलि की स्वीकारोक्ति के बाद भगवान विष्णु अपने असली रूप में आ गए और एक पग में आसमान और दूसरे पग में पृथ्वी को माप दिया।  जब तीसरे पग की बारी आयी तो कुछ बचा ही नहीं था। पर राजा बलि इतने बड़े दानवीर थे की उन्होंने तीसरा पग अपने सर पर  लिया जिससे की उन्हें पृथ्वी छोड़कर पाताल लोक में जाना पड़ गया। अब भगवान विष्णु इतने बड़े दानवीर और भक्त को अकेला कैसे छोड़ सकते थे? उन्होनें उनकी रक्षा करने  निश्चय किया जब तक की राजा बलि को इंद्रा की गद्दी न मिल जाये। भगवान विष्णु उनके द्वारपाल बनकर रहने लगे। इस बात से वैकुण्ठ लोक में बैठे देवी लक्ष्मी चिंतित हो गयी। उन्होनें अपने पति को पाने के लिए एक ब्राह्मण स्त्री रूप  धरा और राजा बलि के पास पहुँच गयी और कहा की उनके पति एक लम्बी यात्रा पर गए हैं  और रहने के लिए एक स्थान की माँग की। राजा बलि नें उन्हें सच्चे मन से अपने घर में रखा तथा अपने बहन की तरह सुरक्षा प्रदान की। देवी लक्ष्मी के आने के बाद राजा बलि के घर में रौनक आ गई तथा घर धन दौलत और खुशियों से भर गया। फिर एक दिन सावन की पुर्णिमा के दिन राजा बलि को एक रक्षा सुत्र बांधा तथा अपनी खुशी और रक्षा का वचन लिया। इस बात से प्रसन्न होकर राजा बलि नें कोई भी मांग पुरी करने का वचन दिया। देवी लक्ष्मी नें द्वारपाल के रूप में खड़े भगवान विष्णु को मांगा। राजा बलि को बहुत आश्चर्य हुआ तभी देवी लक्ष्मी और भगवान विष्णु अपने असली रूप में आए। राजा बलि अपने दानवीर होने के लिए जाने जाते हैं इसलिए उन्होंने भगवान विष्णु को देवी लक्ष्मी को सौंप दिया। तभी से  इस दिन को रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाता है।

2. #कर्ण की दानवीरता 

दानवीर कर्ण के दानवीरता की ख्याति युगों युगों तक फैली हुई है। कर्ण के दान की कई कहानियाँ हैं जो उसे विश्व के महानतम दानवीरों में से एक बनाती हैं। पर उनमे से तीन कहानियों की बात करते हैं। पहली कहानी कर्ण द्वारा अपने कवच कुण्डल का दान और दूसरी सोने के दातों का दान और तीसरे अपने महल के  खिड़कियों और दरवाजों को तोड़कर उनमे से चन्दन की लकड़ियों का दान। 

कवच कुण्डल का दान 

सभी जानते हैं कि कर्ण सूर्य पुत्र था जिसे सूर्य ने एक ऐसा कवच कुण्डल दिया था जिसपर किसी भी अस्त्र शस्त्र का असर नहीं हो सकता था। महाभारत युद्ध में कर्ण कौरवों की तरफ से युद्ध लड़ रहा था जिसे हराना अर्जुन के लिए असंभव सिद्ध हो रहा था। कहा जाता है अर्जुन इंद्र पुत्र थे। इंद्रा को अर्जुन की चिंता हुई। फिर इन्द्र ने छल करके कर्ण के दानवीरता का फायदा उठाना चाहा। एक दिन जब कर्ण संध्या वंदन कर रहा था तभी इंद्र एक ब्राह्मण का वेश धरकर उसके पास गए। ब्राह्मण को देखकर कर्ण ने उनके आने का कारन पूछा। इंद्र ने उस से दान मांगने की।  कर्ण ने कहा की हे विप्र देव माँगो जो माँगना है। इंद्र भी बहुत शातिर और चालक थे। कहा की हे कर्ण मैं ऐसे कुछ नहीं मांग सकता। पहले तुम्हे वचन देना होगा की जो भी मैं मांगूंगा वो तुम मुझे दोगे। कर्ण ने हाथ में जल लेकर वचन दिया की हे विप्रवर मैं वचन देता हूँ की आप जो मांगेंगे वो मैं दूंगा।

तब इंद्रा ने कर्ण से उसके कवच कुण्डल मांग लिए। कर्ण को थोड़ा धक्का लगा पर उसने बिना देर किये वो कवच और कुण्डल दे दिए। 

जब इंद्र जाने लगे तब उनके रथ का पहिया धंस गया और आकाशवाणी हुई “देवराज इन्द्र, तुमने बड़ा पाप किया है। अपने पुत्र अर्जुन की जान बचाने के लिए तूने छलपूर्वक कर्ण की जान खतरे में डाल दी है। अब यह रथ यहीं धंसा रहेगा और तू भी यहीं धंस जाएगा। ” तब देवराज नें कर्ण को अमोघ अस्त्र दिए। 

कर्ण द्वारा सोने के दातों का दान 

जब कर्ण युद्ध भूमि में पड़ा अंतिम साँस ले रहा था तब भगवान श्री कृष्ण ने उसके दानवीरता की परीक्षा लेनी चाही। वो एक ब्राह्मण का वेश बनाकर कर्ण के पास पहुंच गए।  कहा की तुम्हारे बारे में बहुत सुना है। मुझे कुछ स्वर्ण की आवश्यकता है। क्या वो तुम दे सकते हो? कर्ण ने कहा की मेरे पास अभी सोना नही है पर मेरे दांत सोने के बने हैं। आप चाहें तो उन्हें ले सकते हैं। 

भगवान ने कहा मैं तुम्हारे दांत नहीं।  कर्ण ने स्वयं अपने दांत तोड़ दिए। भगवान ने उसे भी लेने से इंकार कर दिया। वो खून से सने दांत नहीं लेना चाहते थे। 

कर्ण ने अपने बाणों से वर्षा करके दांत धो कर दिए। 

कर्ण और चन्दन की लकड़ी

एक बार भीम और अर्जुन भगवान श्री कृष्ण से युधिष्ठिर के दानवीरता का बखान कर रहे थे। भगवान श्री कृष्ण मंद मंद मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने कहा की भाई  हमने तो कर्ण से बड़ा दानी नहीं देखा। पांडवों को ये बात पसंद नहीं आयी। 

भगवान ने कहा समय आने पर ये बात सिद्ध हो जाएगी। 

कुछ दिनों बाद युधिष्ठिर के पास एक याचक आया। उसे यज्ञ करने के लिए चन्दन की सुखी लकड़ी की आवश्यकता थी। उस समय मूसलाधार बारिश हो रही थी। सुखी लकड़ी नहीं मिल रही थी। युधिष्ठिर ने कोष से लकड़ी देने का आदेश दिया पर संयोग से कोष में सुखी लकड़ी नहीं थी। युधिष्ठिर ने बहुत प्रयास किया। पर सुखी लकड़ी की व्यवस्था नहीं हो पायी।

अंतत: याचक ने कहा की महाराज मेरा यज्ञ तो पूरा नहीं हो पायेगा और मैं भी भूखा प्यासा मर जाऊँगा क्योंकि यज्ञ पूरा किये बिना मैं कुछ खाता पीता नहीं हु।

तब भगवान श्री कृष्ण याचक को कर्ण के पास गए। याचक ने कर्ण से भी चन्दन की सुखी लकड़ी माँगी। कर्ण ने भी बहुत प्रयास किया पर चन्दन की सुखी लकड़ी नहीं मिली। फिर कर्ण ने अपने महल की खिड़कियों और दरवाजों को तोड़कर चन्दन की लकड़ियों का ढेर लगा दिया। 

भगवान श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि धर्मराज आपके महल में भी दरवाजे और खिड़कियां भी चन्दन के लकड़ी की हीं बनी हैं। अपने क्यों नहीं उन लकड़ियों को दिया? साधारण अवस्था में दान देना कोई विशेषता नहीं है, असाधारण परिस्थिति में किसी के लिए अपने सर्वस्व को त्याग देने का ही नाम दान है। 

3. #महाराजा शिवि और कबूतर की कहानी 

महाराज शिवि की दानवीरता और न्यायप्रियता की कहानी संसार भर में प्रसिद्द थी। देव, दानव, मानव सभी उनकी न्यायप्रियता का लोहा मानते थे। जब देवराज इंद्रा ने उनके न्यायप्रियता की कहानी सुनी तो उन्हें शंका हुई। और उन्होंने उनकी परीक्षा लेनी चाही। देवराज इंद्र और अग्नि देव ने मिलकर एक योजना बनाई। देवराज इंद्र ने बाज का और अग्नि देव ने कबूतर का रूप बनाया और परीक्षा लेने चले। 

एक दिन महाराज शिवि अपने महल के बगीचे में बैठे हुए थे। तभी उनकी गोद में एक घायल कबूतर गिरा। कबूतर का पीछा करते एक बाज भी आया। बाज ने शिवि से कहा की महाराज कबूतर मेरा भोजन है। इसे मुझे सौंप दीजिये। महाराज शिवि ने कहा कि ये कबूतर मेरी शरण में आया है और मैं अपने शरण में आये किसी भी जीव के प्राणों की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध हूँ। तब बाज ने कहा की महाराज ये मेरा आहार है और किसी के आहार को छीनना धर्म नहीं है। इसपर शिवि ने बाज को उसके आहार  व्यवस्था करने की बात कही तो बाज ने कहा की महाराज आप इस कबूतर के बराबर का मांस हमें दे दीजिये। हमें  और कुछ नहीं चाहिए। 

महाराज शिवि ने निश्चय किया की कबूतर की जगह वो अपना मांस उस बाज को खिलाएंगे। क्योंकि शिवि अपने राज्य के किसी और प्राणी को मरने नहीं दे सकते थे। 

वहां एक तराजू मंगाया गया। उस तराजू पर एक तरफ कबूतर को बैठाया गया और दूसरी तरफ महाराज शिवि अपने शरीर से मांस काटकर  रखते थे। पर हर बार कबूतर का पलड़ा भारी रहता था। अंत में तराजू के दूसरे पलड़े पर महाराज शिवि स्वयं बैठ गए। तब दूसरा पलड़ा भारी हो गया। 

अब देवराज इंद्र और अग्नि देव की शंका दूर हुई और वो अपने असली रूप में आये। दोनों महाराज शिवि की दानवीरता और न्यायप्रियता से प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद दिया और चले गए। 

4. #राजा मोरध्वज की कहानी 

एक बार अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण से कहा की हे भगवान आपका मुझसे बड़ा भक्त हमसे बड़ा दानी कौन है? भगवान ने कहा चलो देखते हैं। 

भगवान श्री कृष्ण और यमराज एक ब्राह्मण और सिंह  बनाकर  राजा मोरध्वज के दरबार में पहुँच गए। वहाँ जाकर भगवान ने मोरध्वज से कहा, “हे राजन, हमने आपके दानवीरता की कहानिया बहुत सुनी है। ” सुना है आपके दरबार से कोई खाली हाथ नहीं लौटा है। 

राजा ने कहा की हे ब्राह्मण देव ये नारायण की कृपा है की हमारे दरबार से कोई खाली हाथ  नहीं लौटा। मैं आपकी सेवा  करके स्वयं को धन्य महसूस करूँगा। कहिये क्या सेवा कर सकता हूँ। 

ब्राह्मण वेश में भगवान ने कहा की हे राजन हमें बस हमारे भोजन की व्यवस्था कर दीजिये। हम ब्राह्मण तो सात्विक भोजन कर लेंगे परन्तु हमारे साथ सिंह राज भी हैं तो उनके लिए आपको मांसाहार की व्यवस्था करनी होगी। 

राजा सोच में पड़ गए। एक धार्मिक राजा, नारायण का बड़ा भक्त जो मांसाहार के बारे में सोचता भी नहीं हो, वो कैसे मांसाहार की व्यवस्था कर सकता था।

बहुत सोचने के बाद राजा ने स्वयं को सिंह राज के सामने पेश करने का प्रस्ताव रखा। परन्तु भगवान नें कहा की हे राजन आपके मांस खाकर सिंह राज तृप्त नहीं होंगे। इन्हे किसी बूढ़े इंसान या जानवर का मांस नहीं चाहिए। आप अपने बेटे ताम्रध्वज का मांस इनके सामने रख सकते हैं।  परन्तु पुत्र को भोजन बनते  देख कर माता पिता की आंखों में आंसू नहीं आना चाहिए। 

इतना सुनकर पूरा दरबार आश्चर्यचकित हो गया। राजा को भी धक्का लगा। परन्तु राजा ने अपनी कीर्ति और कर्तव्य को ध्यान में रख कर राज दरबार में ही अपने बेटे को चीरकर सिंह राज के सामने रख दिया।

सिंहराज ने आगे बढ़कर ताम्रध्वज का दाया भाग खा लिया। तभी ताम्रध्वज की माता की बायीं आंख से आंसू टपक पड़े।

भगवान ने पूछा रानी की आँखों में आंसू क्यों? रानी ने कहा “सिंह राज ने मेरे पुत्र के दांये भाग को खा लिया पर बाएं भाग को नहीं खाया इसीलिए बायीं आँख से आँसूं निकल गए। 

तभी भगवान नें राजा मोरध्वज को अपने असली रूप का दर्शन कराया और कहा की आपके इस दानवीरता का फल मिल चूका है। 

राजा मोरध्वज ने देखा तो उनका बेटा जीवित खड़ा था। 

5. #महर्षि दधीचि की हड्डियों का वज्र 

एक बार इन्द्र लोक पर व्रतासुर नामक एक राक्षस ने कब्ज़ा कर लिया। उसने सभी देवताओं को देवलोक से बहार निकाल  दिया। इंद्र समेत सभी देव ब्रह्मा जी के पास गए। ब्रह्मा जी ने उन्हें एक उपाय बताया। कहा की व्रतासुर का वध केवल  वज्र से हो सकता है जो वज्र महर्षि दधीचि के अस्थियों से बना हो। 

इन्द्र ने एक बार महर्षि दधीचि का अपमान किया था। इस कारण उन्हें दधीचि के पास जाने में संकोच हो रहा था। 

इन्द्र महर्षि दधीचि से ब्रह्म ज्ञान लेना चाहते थे।  पर महर्षि दधीचि को इंद्र इस ज्ञान के लिए सुयोग्य नहीं लगे इसलिए महर्षि ने इंद्र को ब्रह्म ज्ञान देने से इंकार कर दिया। इंद्र को क्रोध आया और किसी को भी ये ज्ञान देने पर सर धड़ दे अलग करने की धमकी दी। पर महर्षि दधीचि ने कहा की कोई भी अगर सुयोग्य मिले तो मैं ये ज्ञान अवश्य दूंगा। 

बाद में अश्विनीकुमार महर्षि दधीचि के पास ब्रह्म विद्या लेने आये। दधीचि नें उन्हें ब्रह्म विद्या पाने के योग्य पाकर  विद्या दी। उन्होंने अश्विनीकुमारों को इन्द्र द्वारा कही गई बातें बताईं। तब अश्विनीकुमारों ने महर्षि दधीचि के अश्व का सिर लगाकर ब्रह्म विद्या प्राप्त कर ली। इन्द्र को जब यह जानकारी मिली तो वह पृथ्वी लोक में आये और अपनी घोषणा के अनुसार महर्षि दधीचि का सिर धड़ से अलग कर दिया। अश्विनीकुमारों ने महर्षि के असली सिर को फिर से लगा दिया। इन्द्र ने अश्विनीकुमारों को इन्द्रलोक से निकाल दिया। 

इसी कारण इन्द्र को महर्षि दधीचि के पास जाने में संकोच हो रहा था। परन्तु अंत में देवलोक की रक्षा के लिए अपने संकोच को त्याग कर इंद्र  दधीचि के पास पहुंच गए। 

महर्षि दधीचि को जब सारी बातें पता चली तो वो ख़ुशी ख़ुशी राजी हो गए।

उनकी हड्डियों वज्र जिस से व्रतासुर का वध हुआ। 

अगर आप भी इसमें अपना अनुभव और ज्ञान जोड़ना चाहते हैं या कुछ और भी लिखने का शौक रखते हैं तो Mail Us at ” [email protected] “साथ में अपना परिचय एक फोटो के साथ भी भेजें। आपकी रचना आपके नाम और फोटो के साथ प्रकाशित की जाएगी।

राजा दाहिर की कहानी – एक हीरो जिसे भुला दिया गया

राजा दाहिर, सिंध का एक ऐसा हिन्दू राजा जिसने 33 वर्षों तक युध्द लड़ते और उन्हें करारी शिकश्त देते हुए सिंध और पुरे हिंदुस्तान को मुस्लिम आक्रांताओं से बचाये रखा। अंत में कुछ बौद्ध गवर्नरों और कबीलों की गद्दारी की वजह से युद्ध मैदान में वीर गति को प्राप्त हुआ। उसके मरने के बाद ही सिंध पर अरब का कब्ज़ा हो सका और सिंध की विजय ने अरबों  के लिए हिंदुस्तान के दरवाजे खोल दिए। आगे का इतिहास हम सब को पता है किस तरह से हमारा देश अरबों और तुर्कों से लड़ता रहा। वीर पैदा होते रहे, साथ ही साथ गद्दार  भी पैदा होते रहे, वर्ना हम गुलाम  कैसे होते?

आज की पीढ़ी को  क्या पता है राजा दाहिर कौन हैं? क्या हमें हमारे इतिहास की पुस्तकों में राजा दाहिर के बारे में पढ़ाया जाता है? राजा दाहिर को हमने बिलकुल भुला दिया। उनकी जगह हम उनके बारे में पढ़ते हैं जिन्होंने हमारे देश को लुटा,  पढ़ते हैं बल्कि हमारे सिलेबस में  उनका महिमामंडन होता है। पता नहीं हमारी सरकारों की क्या  मज़बूरी है?  उनकी चाहे जो मज़बूरी हो, पर हमारा कर्तव्य बनता है की हम उनके बारे में पढ़ें और लोगों को पढ़ाएं। राजा दाहिर के बारे में  पूरी जानकारी के लिए पढ़ें। 

आज मैं उसी राजा दाहिर की कहानी (Raja Dahir ki kahani) सुनाने वाला हु। क्या  आपको पता है राजा दाहिर सेन कौन थे (Raja Dahir Sen Kaun The)? वो हैं राजा दाहिर (Raja Dahir a National Hero) जिनके बारे में हमें अपने इतिहास में कुछ भी नहीं पढ़ाया जाता है। एक ऐसा राजा जिसने तीन बार युद्ध में अरब को हराकर हिंदुस्तान को मुस्लिम आक्रांताओं  से बचाये रखा। पर जब कुछ लोगों की गद्दारी की वजह से उन्हें  हार का  सामना करना पड़ा और  वीर गति को प्राप्त हुए तब भी हमने उसको हीरो बना दिया जिसने उन्हें न सिर्फ धोखे से हराया बल्कि सिंध पर इतने अत्याचार किये की मानवता शर्मसार हो जाये।

अनुक्रम

  • राजा दाहिर की कहानी (Raja Dahir ki Kahani)
  • राजा दाहिर की बेटियाँ (Raja Dahir Daughter)
  • राजा दाहिर और इमाम हुसैन (Raja Dahir and Imam Hussain)

राजा दाहिर की कहानी (Raja Dahir ki Kahani)

भारत वर्ष में इस्लामी शाशन का प्रवेश 712 ईस्वी में राजा दाहिर की पराजय और राजा दाहिर की मृत्यु  के बाद सिंध के रस्ते हुआ। लगभग 33 वर्ष लड़ाइयां लड़ते लड़ते , बार बार अरबों को युद्ध में हराते हुए अन्तत: कुछ स्थानीय कबीलों और बौद्ध गवर्नरों की गद्दारी से युद्ध में राजा दाहिर वीर गति को प्राप्त हुए।

युद्ध क्षेत्र में जाते हुए राजा दाहिर ने कहा था “

“मै खुली लड़ाई में अरबों से लड़ने जा रहा हूँ और अपने पुरे सामर्थ्य के साथ लडूंगा। अगर मैं उन्हें कुचल देता हूँ तो मेरे साम्राज्य की नीव और मजबूत हो जाएगी लेकिन अगर मुझे सम्मान के साथ वीर गति प्राप्त हुई तो यह  अरब की किताबों में लिखा जायेगा। इसके बारे में महान से महान लोग बात करेंगे। दुनिया के अन्य राजा  इसके बारे में बात करेंगे।और कहा जायेगा कि सिंध के राजा दाहिर ने अपने देश के दुश्मन से लड़ते हुए अपनी अनमोल जिंदगी का बलिदान कर दिया। ” 

अफ़सोस की आज राजा दाहिर की महानता को याद नहीं किया जाता।
राजा दाहिर सिंध प्रान्त के आखिरी हिन्दू राजा थे जिनका जन्म 663 ईस्वी में सिंध  के अलोर में हुआ था। ये जगह आज रोहरी के नाम से जाना जाता है। इनके पिता का नाम चच तथा माता का नाम रानी सुहानदी था। चच की  मृत्यु के बाद 679 ईस्वी में महाराज दाहिर सेन सिंध के राजा बने। राजा दाहिर को शाशन सँभालने के साथ ही कई विरोधों का सामना करना पड़ा। उनके पिता द्वारा किये गए शासन से सिंधु देश के गुर्जर, जाट, लोहना और ब्राह्मण समाज नाराज था। इसके प्रमुख कारणों में  एक उनके पिता द्वारा बौद्ध धर्म को राज धर्म का दर्जा दिया जाना था। राजा दाहिर ने सबको साथ लेकर चलने का निश्चय किया और सिंध देश का राज धर्म सनातन हिन्दू वैदिक धर्म कर दिया।
दोस्तों क्या इस महान राजा के साथ ऐसा हुआ? नहीं। हमने राजा दाहिर के महान इतिहास (Raja Dahir Sen Great History) को भुला दिया। 

 राजा दाहिर के राज में सिंध देश बहुत संपन्न देश था। उसका व्यापर समुद्री रास्तों द्वारा पुरे  विश्व से था। सिंध का देवल बंदरगाह व्यापर का मुख्या केंद्र था। इराक ईरान से व्यापर इसी बंदरगाह से होता था। सिंध की सम्पन्नता और सिंध का भारत में प्रवेश करने का द्वार होना अरब देश को आकर्षित करता था। अरब अपने साम्राज्य का विस्तार कर रहे थे। उनलोगो ने ईरान, इराक, सीरिया, उत्तर अफ्रीका, स्पेन जैसे देशों को जीत लिया था। साथ ही साथ वो इस्लाम का प्रसार भी कर रहे थे। उनकी नजर भारत पर थी जिसके लिए लिए सिंध को जितना बहुत जरुरी था क्युकी सिंध ही भारत का प्रवेश द्वार था। सिंध पर कब्ज़ा किये बिना भारत जितने का और इतने बड़े देश में इस्लाम का प्रसार संभव नहीं था।

अरब का सिंध पर आक्रमण

तभी देवल बंदरगाह पर समुद्री लुटेरों ने अरब  के एक जहाज को लूट लिया। खलीफा उमर के अरब गवर्नर बसरा अल हज्जाज इब्न युसूफ (Basra Al Hajjaj Ibn Yusuf) ने मुआवजा माँगा जिसे राजा दाहिर ने ये कहकर इंकार कर दिया की समुद्री लुटेरों पर उनका नियंत्रण नहीं है। अरब खलीफा गुस्से से पागल हो गया। सिंध पर आक्रमण का सिलसिला चालू हो गया। पर राजा दाहिर के कुशल नेतृत्व और असाधारण युद्ध कौशल से हर बार अरब खलीफा की फ़ौज को हार का सामना करना पड़ा। 711 ईस्वी तक अरब फौजें राजा दाहिर को हरा नहीं पायी।

मोहम्मद बिन कासिम का सिंध पर आक्रमण 

712 ईस्वी में अरब शासक ने ये जिम्मेदारी मोहम्मद बिन कासिम (Mohammad Bin Qasim) को सौंपी। मोहम्मद  बिन कासिम ने सबसे पहले देवल बंदरगाह पर कब्ज़ा किया और लोगो का कत्लेआम करना शुरू किया। बच्चे, बूढ़े, जवान, औरतें किसी को नहीं बख्सा गया। पर राजा दाहिर सेन के रहते मोहम्मद बिन कासिम के लिए सिंधु नदी को पर करना असंभव था। इसलिए उसने हैदरपुर के बौद्ध राज्यपपाल मोक्षवास, देवल के राजा ज्ञान बुद्ध तथा जाट, गुर्जर और लोहना कबीलों को अपनी तरफ मिलाया। इसके बाद अरब सेना ने इरनकोट और राव नगर पर हमला करके जीत लिया। अंत में उसका मुकाबला राजा दाहिर  सेन से हुआ। कई दिनों तक लम्बे युद्ध चलने के बाद अरब सेना पराजय के कगार पर थी। 

युद्ध में पराजय निश्चित देखकर अरब सैनिकों ने सो रहे सिंध के सैनिकों पर धोखे से  हमला कर दिया। युद्ध कई दिनों तक चला। इस बार  भी अरब सेना को परास्त होना पड़ा।

राजा दाहिर की युद्ध भूमि में वीर गति  

बार बार पराजय से तंग आकर मोहम्मद बिन कासिम ने एक धोखे की साजिश रची। अपने कुछ सैनिकों को हिन्दू औरतों के वेश में राजा दाहिर में भेजा। वो औरतें (सैनिक) रोती बिलखती राजा दाहिर से मुस्लिम सैनिकों  उन्हें बचाने की गुहार लगाई। राजा दाहिर ने इन महिलाओं को सुरक्षित स्थान पर भेजने के बाद उस स्थान की ओर बढ़ गए जहा से उनकी रोने की आवाज आ रही थी। युध्द भूमि में वो अकेले पद गए जहाँ उनके हाथी पर बाण चलाये गए। जिस से वो खाई में गिर गया। राजा दाहिर अकेले बहुत वीरता से लड़े पर अंत में वीर गति को प्राप्त हुए। वो अपने मातृभूमि की रक्षा करते सदा के लिए मातृभूमि की गोद में सो गए। इधर औरतों के वेश महल में घुसे सैनिक अपने असली रूप में आ गए और कत्लेआम मचाना  शुरू किया। 

मोहम्मद बिन कासिम ने अंत में राजा दाहिर के सर काटकर खलीफा को भेट किया।  

राजा दाहिर की बेटियाँ (Raja Dahir Daughters)

राजा दाहिर की मृत्यु के बाद मोहम्मद बिन कासिम की सेना सिंध की और बढ़ी और राजमहल में घुसने का प्रयास किया। यहाँ भी  उनका स्वागत रानी लाडो और राजकुमारी सूर्य और परमाल के साथ महल के बाकि औरतों ने तीरों और भालों से किया। अरब सेना के लिए औरतों का युद्ध कौशल नया अनुभव था। अरब बहुत प्रयास करके भी  महल में घुस नहीं पाए। पर रानी को मोक्षवास के गद्दारी की भनक नहीं थी। इसी का फायदा उठाकर मोक्षवास महल में घुस गया तथा रात में चोरी से महल का दरवाजा खोल दिया जिस से अरब सैनिक महल में प्रवेश कर गए। रानी और बाकि औरतों ने जौहर की अग्नि में अपनी जान दे दी।

पर राजा की दो बेटियां पीछे रह गयी। उन्हे बंदी बना लिया गया। मोहम्मद बिन कासिम ने सोचा की इन राजकुमारियों को खलीफा को भेंट किया जाये। (इसी से बचने के लिए बाकि औरतों ने जौहर  कुंड में जान दी थी।) दोनों राजकुमारियों सूर्य और परमाल के ह्रदय में प्रतिशोध  की ज्वाला धधक रही थी।  उन्हें एक अवसर की तलाश थी। अब उन्हें अवसर मिला। राजकुमारियों को खलीफा के सामने पेश किया गया।  उनके रूप सौंदर्य को देखकर  खलीफा की ऑंखें चौंधिया गयी। ऐसी सुंदरता उसने पहले कभी नहीं देखी थी।

मोहम्मद बिन कासिम की मौत (Daith of Mohammad Bin Kasim)

जैसे ही उसने राजकुमारी को हाथ लगाया, राजकुमारी अचानक से पीछे हट गयी। रोते हुए बोली “महाराज हम आपके लायक नहीं है। आपके पास भेजने से पहले मोहम्मद बिन कासिम ने हमें तीन दिनों तक अपने साथ रखा। ” इस बात से खलीफा की ऑंखें गुस्से से लाल हो गयी। आँखों से अंगारे बरसने लगे। उसने तुरंत कासिम को बोरी में सिलकर लाने का हुक्म दिया। रास्ते में मोहम्मद बिन कासिम की दम  घुटने से मौत हो गयी। उसके बाद दोनों वीरांगनाओं ने भी “जय सिंध और जय दाहिर (Jai Sindh and Jai Dahir) कहते हुए अपनी जान दे दी। उनका प्रतिशोध पूरा हो चूका था। 

जौहर (Jauhar) – जब कोई मुस्लिम आक्रांता किसी हिन्दू राज्य पर आक्रमण करता था और जीत लेता था तो औरतें अपनी इज्जत बचाने और मुस्लिम सैनिकों के हाथ न आने पाए इसलिए अग्नि कुंड में कूद कर जान दे देती थी। 

राजा दाहिर और इमाम हुसैन (Raja Dahir and Imam Hussain)

राजा दाहिर का इस्लाम पर भी बहुत बड़ा उपकार रहा है। पैगम्बर मोहम्मद की मौत के बाद अरब कबीलों में खलीफा बनने की लड़ाई शुरू हो गयी। पैगम्बर मोहम्मद के खानदान के लोगों के खून के प्यासे  गए थे जिन्हें किसी भी कीमत पर इस्लाम का झंडाबरदार बनना था, पैगम्बर का उत्तराधिकारी बनना था। खलीफा  अल हज्जाज इब्न युसूफ ने पैगम्बर मोहम्मद के वंशजों को ढूंढ कर मारने  चलाई थी जिसमे उसने इमाम हुसैन (Imam Hussain) को मार भी दिया था। पर राजा दाहिर ने हुसैन एबीएन अली को शरण दी थी और उनकी रक्षा की थी जो पैगम्बर मोहम्मद के  वंशज थे। जिन्हे बाद में  पकड़ कर मौत के घाट उतर दिया गया था। 

उम्मीद है दोस्तों आपको Raja Dahir a National Hero की कहानी अच्छी लगी होगी। हमारे देश ने उन्हें भुला दिया है पर हमारा ये कर्त्तव्य है कि हम  रखे। अपने दिल में रखें  प्रेरणा ले। 

अगर आप भी इसमें अपना अनुभव और ज्ञान जोड़ना चाहते हैं या कुछ और भी लिखने का शौक रखते हैं तो Mail Us at ” [email protected] “साथ में अपना परिचय एक फोटो के साथ भी भेजें। आपकी रचना आपके नाम और फोटो के साथ प्रकाशित की जाएगी।

 

भारत की नई शिक्षा नीति 2020 की संपूर्ण जानकारी हिंदी में

हर देश की एक शिक्षा नीति होती है  जिसपर उस देश की पूरी शिक्षा व्यवस्था चलती है। हमारे भारत में भी हमेशा से एक नीति रही है शिक्षा की जिसपर हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था चलती रही है। इसमें समय समय पर परिवर्तन भी हुए है। 2020 में भारत सरकार 35 वर्षों से चल रही शिक्षा नीति को समाप्त करके एक नयी शिक्षा नीति लेकर आयी है। ऐसा नहीं है की स्वतंत्रता के बाद की  शिक्षा नीति है। हम अपनी शिक्षा नीति को दो बार पहले भी बदल चुके हैं।

नयी शिक्षा नीति क्या है इसमें  बदलाव हुए हैं? इन सब विषयों पर करेंगे।

टॉपिक्स

  • भारतीय शिक्षा नीति
  • इतिहास
  • घटना क्रम
  • बदलाव की जरुरत क्यों?
  • शिक्षा नीति में बदलाव
  • कन्क्लूसन

भारतीय शिक्षा नीति Indian Education Policy 

हमारे देश की शिक्षा नीति 10 + 2 पैटर्न पर आधारित रही है जिसमे बोर्ड परीक्षाओं में आये grades और numbers पर ज्यादा फोकस किया जाता रहा है। हम Practical Knowledge की जगह Theoretical Knowledge पर ज्यादा ध्यान दिए हैं। पर नयी शिक्षा नीति में Theoretical Knowledge की जगह Practical Knowledge पर ज्यादा ध्यान दिया गया है।

आज़ादी  के बाद भारतीय शिक्षा नीति  का इतिहास History of Indian Education Policy after Independence 

हमारे  देश में अब तक कुल 3 बार शिक्षा नीति लागु हो चुकी है।

1968 में इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री थी  दूसरी बार 1986 में जब राजीव गाँधी प्रधानमंत्री थे। आज़ादी  के बाद से हमारे देश में शिक्षा को नियंत्रित करने के लिए शिक्षा मंत्रालय काम करता था 1986 में बदल कर मानव संशाधन विकास मंत्रालय कर दिया गया।

1992 में 1986 के शिक्षा नीति में कुछ संशोधन किया गया  शिक्षा नीति को बदला नहीं गया।

भारत सरकार ने 1964 में तत्कालीन विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (University Grant Commission) के अध्यक्ष डॉक्टर दौलत सिंह कोठारी अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया जिसे आयोग कहा। कोठारी आयोग (Kothari Commission) की सिफारिश पर नयी शिक्षा नीति लागु हुई। इसमें आयोग की सभी सिफारिशों को मन लिया गया बस एक को छोड़कर। वो था शिक्षा पर अपने GDP का 6 % खर्च करना।

भारत सरकार के National Education Policy Draft 2019 के अनुसार भारत में 2017 -2018 में हमारे GDP का मात्रा 2.7 % ही शिक्षा पर खर्च हुआ। अब तक कभी भी हमने अपने GDP का 4 % से अधिक शिक्षा पर खर्च नहीं किया।

जबकि कई देश  GDP का 5 -6 % तक खर्च करते हैं शिक्षा पर जैसे भूटान, जिम्बाब्वे, स्वीडन और बाकि और भी कई देश।

 घटना क्रम

नयी शिक्षा नीति का ड्राफ्ट बनकर तैयार हो गया है। इसको कैबिनेट में पास किया जा  चूका है। अब ये लोकसभा और राज्यसभा में पास होने के बाद राष्ट्रपति का हस्ताक्षर होगा। उसके बाद ये लागु होगा।

ये ड्राफ्ट रातों रात बनकर तैयार नहीं हुआ है। इसपर काम बहुत दिनों से चल रहा था। इसका घटनाक्रम इस प्रकार है।

  • 2014 – भारतीय जनता पार्टी के घोषणा पत्र में शामिल।
  • 2015 – 31 अक्टूबर 2015 को पूर्व कैबिनेट सचिव T. S. R. Subramaniam  की अध्यक्षता में 5 सदस्यों की एक कमिटी का गठन।
  • 2016 – 27 मई 2016 को इस कमिटी ने अपनी रिपोर्ट दी।
  • 2017 – 24 जून 2017 को ISRO (Indian Space Research Organisation) के प्रमुख वैज्ञानिक K Kasturirangan  की अध्यक्षता में 9 सदस्यों की कमिटी को ड्राफ्ट बनाने की जिम्मेदारी दी गयी।
  • 2019 – 31 मई 2019 को इस कमिटी ने Human Resource Minister, रमेश पोखरियाल निशंक को ड्राफ्ट सौंप दिया। इसके बाद HRD मंत्रालय ने इस पर लोगों से सुझाव मांगे। कारोब 2 लाख लोगो ने इस ड्राफ्ट पर सुझाव दिए।
  • 29 जुलाई 2019 को केंद्रीय कैबिनेट ने इस ड्राफ्ट को मंजूरी दी।

बदलाव की जरुरत क्यों?

अब प्रश्न आता है की इस बदलाव की जरुरत क्या थी? केंद्र सरकार के अनुसार हमारी शिक्षा नीति पुरानी हो गयी थी। आज के ज़माने में जिस तरह की शिक्षा की लोगो को जरुरत है वो नहीं मिल पा रही थी। इसमें बदलाव के कई कारण थे।

बदलते समय की जरूरतों को पूरा करना

शिक्षा  की गुणवत्ता को बढ़ाना

Innovation और Research को बढ़ावा देना।

देश को ज्ञान का सुपर पावर बनाना।

सरकार के लक्ष्य

इस नयी नीति के द्वारा सरकार अपने लक्ष्य को प्राप्त करना चाहती है।

Making India a  Global Super Power

2035 तक सरकार कम से कम 50 % विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा तक पहुँचाना चाहती है। अभी ये आंकड़ा 25 – 26 % तक है।

शिक्षा नीति में बदलाव

अब सबसे बड़ा प्रश्न है कि आखिर शिक्षा नीति में बदलाव क्या किया गया है। हमारी शिक्षा नीति को समाप्त करके बिलकुल नयी नयी शिक्षा नीति लाया गया है। इसमें बहुत ही अहम् बदलाव किये गए हैं जो इस प्रकार हैं।

  • सबसे पहले मानव संशाधन विकास मंत्रालय का नाम बदल कर शिक्षा मंत्रालय कर दिया गया है। अब मानव संशाधन मंत्रालय को शिक्षा मंत्रालय के नाम से जाना जायेगा तथा मानव संशाधन विकास मंत्री को शिक्षा मंत्री के नाम से जाना जायेगा। (अभी मानव संशाधन विक्स मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक हैं।)
  • शिक्षा का बजट बढ़ा दिया गया है। अब पुरे GDP का 6 % शिक्षा पर खर्च किया जायेगा।
  • प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में दी जाने की कोशिश की जाएगी।
  • नयी शिक्षा नीति के तहत संस्कृत भाषा को भी बढ़ावा दिया जायेगा। संस्कृत के विश्वविद्यालयों में अलग अलग विषयों की पढाई संस्कृत माध्यम में होगी। 

अब हमारे शिक्षा का तरीका बदल जायेगा।

उच्च शिक्षा में बदलाव
  • Multiple Entry and Multiple Exit System 

अब अगर आप कभी बीच में पढाई छोड़ देते हैं तो जो पढाई अपने की है वो व्यर्थ नहीं जायेगा। अगर स्नातक में अपने 1 साल पढ़ कर छोड़  दिया तो आपको Certificate मिलेगा, 2 साल में Diploma, और 3 साल पूरा कर लिया तो Degree। इसमें Credit Transfer System लागु होगा।

स्नातक की डिग्री 3 साल और 4 साल की होगी। अगर आपको रिसर्च करना होगा तो आपको 4 साल की स्नातक डिग्री लेनी होगी। उसके बाद 1 Post Graduate और 4 साल Phd । M. Phil की डिग्री की आवश्यकता नहीं होगी।

  • Multi-Disciplinary Education System

कोई स्ट्रीम नहीं होगी जिसे Science, Arts और Commerce आदि। आप अपने मनचाहे विषयों की पढाई कर सकेंगे। अगर आपकी रूचि Physics के साथ History पढ़ने की है तो वो भी पढ़ सकते हैं।

ये बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक है।

  • College में Graded Autonomy होगी। मतलब College अपने स्तर से भी परीक्षा ले सकते हैं और डिग्री भी  दे सकते हैं।
  • College और University में नामांकन के लिए एक Common Admission Test लिया जायेगा।
  • उच्च शिक्षा को विनियमित (Regulate) करने के लिए एक Regulatory Body बनाई जाएगी। जैसे UGC, AICTE आदि अलग अलग Regulatory Body की जगह एक Body होगी।
  • चाहे केंद्रीय, राजकीय या Deemed विश्वविद्यालय हो, सबके लिए एक मानक तय होंगे।
  • निजी कॉलेज के Fee सरकार द्वारा निर्धारित किये जायेंगे और उसकी सीमा बानी रहेगी। अब निजी कॉलेज मनमानी फी नहीं ले सकेंगे।
  • Research की funding के लिए अमेरिका के तर्ज पर एक National Research Foundation बनाया जायेगा जो Science के अलावा Arts के रिसर्च के लिए भी फण्ड देगी।
  • तकनिकी द्वारा शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए Virtual Labs शुरू किये जायेंगे।

अया सोफ़िया (Hagia Sophia) विवाद क्या है और इसे मस्जिद में क्यों बदल दिया गया? 

स्कूली शिक्षा में बदलाव 

पहले हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था 10 + 2 के पैटर्न की जगह 5 + 3 + 3 + 4 कर दिया गया है।

  • 3 से 6 साल तक के बच्चे के लिए खेल के साथ पढाई का पाठ्यक्रम तैयार किया गया है। इसके लिए बालवाटिका तैयार किया गया है जिसमे  पढ़ाने के लिए शिक्षकों को विशेष ट्रेनिंग दी जाएगी।  को ECCE Qualification (Early Childhood Care) कहा जायेगा।
  • कक्षा 1 से 3 तक के बच्चों के लिखना पढ़ना सिखाने पर खास जोर।
  • छठी कक्षा से  बच्चों को Vocational Courses पढ़ाने की शुरुआत हो जाएगी। बच्चों को Computer Coding के साथ साथ उनकी रूचि वाली Skill सिखाई जाएगी। इसी कक्षा से Internship Programme की भी शुरुआत हो जाएगी। अगर किसी बच्चे को पेंटिंग का शौक है तो उसे किसी पेंटर से पेंटिंग की ट्रेनिंग  दी जाएगी। इसी तरह जिसको संगीत या चित्रकारी का शौक होगा तो उसे उसकी ट्रेनिंग दी जाएगी। 
  • कक्षा 6 से ही Project based learning शुरू हो जाएगी।
  • 9 से 12 कक्षा तक एक समान शिक्षा दी जाएगी। हर विषय गहराई  में पढाई जाएगी।
  • Multi-Stream System लागु होगा। इसमें बच्चे को ये आज़ादी रहेगी अपने पढाई वाले विषयों के साथ Extra Curricular Subject भी पढ़ सकता है। इस Extra Curricular Subject को अब अलग नहीं माना जायेगा। ये भी हर विषय की तरह बराबर महत्व के होंगे।
पाठ्यक्रम में बदलाव 
  • पुरे देश में एक तरह  पाठ्यक्रम होंगे जिसे NCERT द्वारा तैयार किया जायेगा।
  • कक्षा 5 तक बच्चों को मातृभाषा में शिक्षा देने की कोशिश की जाएगी।

अब बच्चों का मूल्यांकन 360 डिग्री Holistic Report Card के तर्ज पर किया जायेगा। इसमें बच्चों का मूल्यांकन सिर्फ शिक्षक नहीं बल्कि बच्चा खुद भी करेगा और साथ में उसके सहपाठी भी करेंगे।

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नयी नीति लागु कब से होगी?

इस बिल का नाम है National Higher Education Bill जिसे कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है। अब इसे संसद में पेश किया जायेगा। इसके बाद ये कानून का शक्ल लेगा। फिर राज्य सरकारें अपने अपने राज्यों में इसे कानून बनाकर लागु करेंगी। 

उम्मीद है आपको नए शिक्षा नीति के बारे में पूरी जानकारी मिल  गयी होगी।  अब देश की शिक्षा व्यवस्था ऐसी होगी जिस से अब छात्र कागज की डिग्री की जगह स्किल सीख कर आएंगे और उसको अपने विकास में इस्तेमाल करेंगे। अब जरुरत है इसको सही ढंग से लागु करने की। 

अगर आप भी इसमें अपना अनुभव और ज्ञान जोड़ना चाहते हैं या कुछ और भी लिखने का शौक रखते हैं तो Mail Us at ” [email protected] “साथ में अपना परिचय एक फोटो के साथ भी भेजें। आपकी रचना आपके नाम और फोटो के साथ प्रकाशित की जाएगी।

 

जन्माष्टमी कब और क्यों मनाया जाता है ?

यदा यदा हि धर्मस्य: ग्लानिर्भवति भारत:।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहं।।

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम

धर्म संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।।

By <a href="//commons.wikimedia.org/wiki/User:AroundTheGlobe" title="User:AroundTheGlobe">AroundTheGlobe</a> - Swaminarayan Sampraday <a rel="nofollow" class="external autonumber" href="http://www.swaminarayan.info/events/images/janmastmi2005/73.jpg">[1]</a>, <a href="http://creativecommons.org/licenses/by-sa/3.0/" title="Creative Commons Attribution-Share Alike 3.0">CC BY-SA 3.0</a>, <a href="https://commons.wikimedia.org/w/index.php?curid=6948025">Link</a>

भावार्थः जब जब धर्म की हानि होने लगती है और अधर्म धर्म पर हावी होने लगता है, तब तब मैं स्वयं अवतार लेता हूँ, अर्थात् जन्म लेता हूं । सज्जनों की रक्षा, दुष्टों के संहार और धर्म की पुनःस्थापना के लिए मैं विभिन्न युगों में अवतरित होता हूं ।

इस श्लोक को हम सबने कभी न कभी सुना होगा। याद भले ही न हो, अर्थ की समझ भले ही न हो, पर इस श्लोक को सुनकर मन में जिसकी छवि बनती है उसके बारे में हम कितना जानते हैं? कौन हैं वो?

जी हाँ। सही पहचाना। ये श्लोक महाभारत के युद्ध के मैदान में श्रीमद्भगवत्गीता का उपदेश देते हुए भगवान श्री कृष्णा नें अर्जुन से कहा था।

जैसा कि हम सबको मालूम है कि हमारा देश पर्व त्योहारों का देश है। हम हर छोटी बड़ी बातो में ख़ुशी तलाश लेते है।

हम श्री कृष्णा जन्माष्टमी पर्व की प्रतीक्षा कर रहे हैं। बहुत धूम धाम से हम ये पर्व मनाते हैं।

पर क्या आपको पता है जन्माष्टमी पर्व क्यों मनाया जाता  है ? जाहिर सी बात है अधिकतर लोगों को पता होगा। जैसे की नाम से ही स्पष्ट है “श्री कृष्णा जन्माष्टमी (Shree Krishna Janmashtami)” भगवान श्री कृष्णा से ही सम्बंधित होगा।

इस article में श्री कृष्ण जन्माष्टमी के बारे में बहुत जानकारियाँ  मिलने वाली है। जैसे हम जन्माष्टमी कैसे मनाते हैं, किन किन जगहों पर किस किस तरह से मनाया जाता है, जन्माष्टमी का महत्व, क्या celebration करते हैं हम इस दिन?

  • जन्माष्टमी क्यों मनाई जाती है?
  • जन्माष्टमी कब मनाई जाती है?
  • 2020 में  जन्माष्टमी कब मनाई जाएगी?
  • जन्माष्टमी कैसे मनाई जाती है?
  • दही हांड़ी महोत्सव (Dahi Handi Mahotsav)
  • जन्माष्टमी के पीछे की कहानी (Story behind Janmashtami)
  • जन्माष्टमी के अलग अलग नाम।

“हम श्री कृष्णा जन्माष्टमी (Shree Krishna Janmashtami)” क्यों मनाते है ? Why Shree Krishna Jnamashtami is Celebrated ?

जब पुरे पृथ्वी पर राक्षसों का अत्याचार बढ़ गया था, लोग त्राहि त्राहि कर रहे थे, कंस के क्रूरता से पृथ्वी कराह रही थी तब भगवान विष्णु नें मनुष्य रूप में अवतार लेकर पृथ्वी को राक्षसों के जुल्म से मुक्त करने का निर्णय लिया। फिर कंस द्वारा जेल में बंदी बनाये उसी की बहन देवकी और वासुदेव के बेटे के रूप में भाद्रपद कृष्णा पक्ष अष्टमी के दिन मथुरा में अवतार लिया। फिर भगवन श्री कृष्ण ने दुष्ट राक्षसों का संहार करके पृथ्वी को बचाया। क्योंकि उस दिन भगवान का अवतार हुआ था इसलिए हजारों वर्षों से हम श्री कृष्ण जन्माष्टमी बहुत ही धूम धाम  खुशी से मनाते हैं।

जन्माष्टमी कब मनाई जाती है? When Janmashtami is Celebrated?

प्रत्येक वर्ष भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष के अष्टमी (आठवें दिन) को बड़े ही धूम धाम से जन्माष्टमी मनाया जाता है। आज के ही दिन भगवान श्री कृष्ण का अवतार हुआ था।

ये भी पढ़ें।    रक्षाबंधन क्यों मनाया जाता है?

  • 2020 में  जन्माष्टमी कब मनाई जाएगी? When Janmashtami will be Celebrated in 2020?

जन्माष्टमी 2020

11 अगस्त

निशिथ पूजा– 00:04 से 00:48

पारण– 11:15 (12 अगस्त) के बाद

रोहिणी समाप्त- रोहिणी नक्षत्र रहित जन्माष्टमी

अष्टमी तिथि आरंभ – 09:06 (11 अगस्त)

अष्टमी तिथि समाप्त – 11:15 (12 अगस्त)

जन्माष्टमी कैसे मनाई जाती है? How Janmashtami is Celebrated?

हिन्दू धर्म में जन्माष्टमी बड़े ही धूम धाम से मनाई जाती है। इस दिन लोग भगवान श्री कृष्ण के जन्म दिवस के रूप में मनाते हैं। भारत के साथ साथ विदेशो में रहने वाले  हिन्दू भी जन्माष्टमी के त्यौहार को उल्लास और भक्ति के साथ मनाते हैं। इसे धार्मिक तरीकों के साथ ही साथ एक जन्मदिन की तरह भी मनाया जाता है।  

जन्माष्टमी के दिन लोग घर में और मंदिरों में श्रद्धा भाव से पूजा पाठ करते हैं। भगवन श्री कृष्ण को लड्डू आदि का भोग लगाते हैं। भगवान श्री कृष्ण  की नगरी मथुरा में लोग बहुत दूर दूर से  आते हैं और श्रद्धा से अपने आराध्य की आराधना करते हैं। लोग जन्माष्टमी के दिन व्रत या उपवास (Fasting) भी रखते हैं। लड्डू गोपाल (लड्डू गोपाल भगवान श्री कृष्ण का ही एक नाम है) की मूर्ति को झूला झुलाया जाता है और भजन भी गया जाता है।

जन्माष्टमी के दिन स्कूल कॉलेज में श्री कृष्ण सम्बंधित फैंसी ड्रेस कम्पटीशन (Fancy Dress Competition) के साथ ही साथ नाट्य नाटिका और सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन भी किया जाता है।

दही हांड़ी महोत्सव (Dahi Handi Mahotsav)

इस दिन युवा  दही हांड़ी (Dahi Handi) का कार्यक्रम भी आयोजित करते हैं। दही हांड़ी में युवा दही से भरी हांड़ी को ऊँचाई पर तंग देते हैं फिर एक के ऊपर एक चढ़कर, एक पिरामिड बनाकर दही से भरी हांड़ी को फोड़ते हैं। इस आयोजन का युवाओ में बहुत उत्साह होता है। युवाओं की टोली इसकी प्रतियोगिता रखती है और जितने वाले को पुरष्कार भी दिया जाता है।

जन्माष्टमी के पीछे की कहानी (Story behind Janmashtami)

जब पृथ्वी पर कंस का अत्याचार  बढ़ गया था, लोग त्राहि त्राहि कर रहे थे तब कंस की बहन देवकी के गर्भ से कृष्णा का देवकी के आठवें पुत्र के रूप में जन्म हुआ। कंस को मालूम था की देवकी का आठवां पुत्र  उसका वध करेगा इसलिए उसने देवकी और वासुदेव को कारागार में बंद कर दिया था तथा देवकी के सभी पुत्रों को मार देता था।

जब कृष्ण का जन्म हुआ तब आँधी तूफान का कहर मच गया,  घनघोर अँधेरा छा गया, मूसलाधार बारिश होने लगी, कारागार के सभी पहरेदार बेहोश हो गए, यमुना नदी उफान मारने लगी।

वासुदेव एक टोकरी में लेकर बाल कृष्ण को कंस से बचाने के लिए यमुना पर कर अपने मित्र नन्द के पास गए। वहां कृष्ण का पालन पोषण नन्द और यशोदा  द्वारा किया गया। इसीलिए कृष्णा का एक नाम नन्दलाल भी है।

बचपन से ही भगवन श्री कृष्ण ने कंस द्वारा  भेजे गए हर राक्षस राक्षसी का संहार किया और अंत में कंस का संहार करके लोगो को कंस के अत्याचारों से मुक्ति दिलाई।

जन्माष्टमी के अलग अलग नाम (Different names of Janmashtami)

कृष्ण जन्माष्टमी (Krishna Janmashtami)

कृष्णाष्टमी (Krishnashtami)

गोकुलाष्टमी (Gokulashtami)

कन्हैया अष्टमी (Kanhaiyashtami)

कन्हैया आठें (Kanhaiya Athe)

श्री कृष्ण जयंती (Shree Krishna Jayanti)

श्रीजी जयंती (Shreeji Jayanti)

पूरी पृथ्वी को कंस जैसे क्रूर राक्षस अत्याचारों मुक्ति दिलाने और ब्रह्माण्ड के कल्याण हेतु भाद्रपद के कृष्ण पक्ष के अष्टमी को भगवान श्री कृष्ण का अवतार हुआ। इसीलिए प्रति वर्ष भाद्रपद के कृष्ण पक्ष के अष्टमी के दिन हम सभी भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाते हैं।

अगर आप भी इसमें अपना अनुभव जोड़ना चाहते हैं या कुछ और भी लिखने का शौक रखते हैं तो Mail Us at ” [email protected] “साथ में अपना परिचय एक फोटो के साथ भी भेजें। आपकी रचना आपके नाम और फोटो के साथ प्रकाशित की जाएगी।

अया सोफ़िया (Hagia Sophia) विवाद क्या है और इसे मस्जिद में क्यों बदल दिया गया?

अया सोफ़िया (Hagia Sophia) चर्च से मस्जिद, मस्जिद से म्यूजियम और फिर म्यूजियम से वापस मस्जिद बन गया।

अब आपके मन में कुछ सवाल आ रहे होंगे। जैसे ये अया सोफ़िया (Hagia Sophia) है क्या? ये बना कब? ये मस्जिद में कब और क्यों बदल गया? मस्जिद से म्यूजियम किसने बनाया? फिर अब ऐसा क्या हो गया की वापस मस्जिद बन गया? ये पूरा विवाद है क्या?

आपकी हर जिज्ञासा शांत होगी। धैर्य रखें और आर्टिकल पूरा पढ़ें।

Hagia Sophia Controversy
Hagia Sophia in Istanbul https://www.pexels.com/photo/hagia-sophia-museum-3969150/
अनुक्रम

  • अया सोफ़िया (Hagia Sophia) क्या है और कहाँ है?
  • इसका अर्थ
  • इसका इतिहास
    • चर्च के रूप में।
    • मस्जिद के रूप में।
    • म्यूजियम के रूप में।

हया सोफ़िया (Hagia Sophia) क्या है और कहाँ है?

अया सोफ़िया (Hagia Sophia) तुर्की के राजधानी इस्तांबुल में स्थित एक शानदार और विश्व प्रसिद्द दर्शनीय स्थल (Tourist Destination) है जिसे प्रति वर्ष लाखों लोग देखने विश्व के कोने कोने से आते हैं। जैसे की शीर्षक से ही पता चल रहा होगा की ये रोमन साम्राज्य के समय पहले चर्च के रूप में बना (चर्च में भी पहले Western Orthodox Church फिर बैजंटीन साम्राज्य के समय Estern Orthodox Church) फिर ओट्टोमन साम्राज्य (Ottomon Empire) में मस्जिद के रूप में बदल गया, फिर आधुनिक तुर्की ने निर्माता मुस्तफा कमाल पाशा (Mustafa Kemal Pasha) ने इसे म्यूजियम में बदल दिया।

जब ये बनकर तैयार हुआ  तब ये दुनिया का सबसे बड़ा आतंरिक स्ट्रक्चर वाला ईमारत था। और ये करीब 1000 साल तक विश्व का सबसे बड़ा कैथेड्रल बना रहा।

अया सोफ़िया (Hagia Sophia) का अर्थ Meaning of Hagia Sophia

इसका अर्थ Holy Wisdom या Sacred Truth होता है।

अया सोफ़िया (Hagia Sophia)का इतिहास 

 चर्च के रूप में।

इसका इतिहास शुरू होता है 360  और 415 ईस्वी से। 360 ईस्वी में  रोमन साम्राज्य द्वारा एक चर्च का निर्माण किया जाता है जो की बाद में आग लगने के कारण नष्ट हो जाता।  फिर 415 ईस्वी में दोबारा एक चर्च का निर्माण होता है जो की फिर से से नष्ट हो जाता है।

फिर 537 ईस्वी में सम्राट जस्टिनियन के द्वारा चर्च का निर्माण कराया जाता है जो आज का अया सोफ़िया (Hagia Sophia) है।

उस समय ईसाइयत में दो सेक्ट थे। Eastern Orthodox Church और Western Orthodox Church।

Eastern Orthodox Church का मुख्यालय Constantinopole  आज का इस्तांबुल में थे तथा Western Orthodox Church का मुख्यालय Vatican में था।

अया सोफ़िया (Hagia Sophia) करीब 900 वर्षों तक Eastern Orthodox Church का मुख्यालय  बना रहा।

 मस्जिद के रूप में।

1453 में Constantinopole को ओटोमन साम्राज्य के सुल्तान मेहमत (Sultan Mehmat) द्वारा जीत लिया जाता है। कई दिनों तक तुर्की में और Constantinopole लुटा जाता है। साथ ही अया सोफ़िया (Hagia Sophia) को भी लुटा जाता है, उसे पूरी तरह से बर्बाद नहीं किया जाता है। सुल्तान मेहमत को पता चलता है की इसे जीतने में तुर्क और अरब 900 वर्षों तक नाकाम रहे। वो उस चर्च  में जाता है जिसे ईसाइयत के गौरव के रूप में देखा जाता था। उस ईमारत में जाने के बाद, उसकी बनावट और खूबसूरती देखने के बाद उसे अपने जीत पर और ज्यादा गर्व होता है। उसी समय सुल्तान मेहमत वहाँ नमाज पढता है और चर्च को मस्जिद में बदल देता है।

चर्च को मस्जिद में बदलने के लिए सुल्तान ने ईसाइयत के प्रतिक चिन्हों को ढंक दिया और प्लास्टर करवा दिया। अंदर इस्लामिक प्रतिक चिन्ह बनवाये।

म्यूजियम के रूप में। 

प्रथम विश्वयुद्ध के बीतते बीतते ओटोमन साम्राज्य बिखर गया तथा उसका शाशन समाप्त हो गया।

1922 में आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष तुर्की का निर्माण मुस्तफा कमाल पाशा (Mustefa Kemal Pasha) के नेतृत्व में होता है जिन्हे “अतातुर्क” के नाम से भी जाना जाता है। इन्हे आधुनिक तुर्की का पिता या जनक भी कहा जाता है। अतातुर्क का अर्थ तुर्की का पिता (Father of Turkey) होता है।

जो सम्मान भारत में महात्मा गाँधी को है वही सम्मान तुर्की में मुस्तफा कमाल पाशा (Mustefa Kemal Pasha) को दिया जाता है।

ये आधुनिक और धर्मनिरपेक्ष विचारों के व्यक्ति थे। इनका मकसद तुर्की को एक आधुनिक और धर्मनिरपेक्ष देश बनाना था। ये एक ऐसा तुर्की चाहते थे जिसका कोई राज्य धर्म  न हो,  औरतों और अल्पसंख्यकों को समान अधिकार हो।

1934 में इन्होने अया सोफ़िया (Hagia Sophia) को मस्जिद से  बदलकर म्यूजियम में बदल दिया जिसे

1985 में UNESCO (United Nationa Educational, Scientific and Cultural Organisation) ने World Heritage Site का दर्जा दिया।

1935 में इसे जनता के लिए खोल दिया गया और ये विश्व के सबसे प्रसिद्ध दर्शनीय स्थलों में  से एक बन गया।

2013 में सरकार ने इसके मीनारों को नमाज के लिए खोल दिया।

2016 में 85 वर्षों के बाद पहली बार इसमें  नमाज पढ़ी गयी।

2018 में तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन (Recep Tayyip Erdogan) ने खुद वहाँ नमाज पढ़ी और उसे मस्जिद में बदलने की बात की।

2019 में राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन (Recep Tayyip Erdogan) की पार्टी ने इस्तांबुल के स्थानीय चुनाव में ये मुद्दा उठाया पर चुनाव में हार गए।

2020 में ओटोमन साम्राज्य के आक्रमण के 567वें वर्षगांठ के दिन उस म्यूजियम में फिर से नमाज पढ़ी जाती है।

इसके बाद न्यायलय ने Association for the Protection of Historic Monument and the Environment नाम के एक ग्रुप की याचिका पर मस्जिद में बदलने का निर्णय दिया।

अंतत: 24  जुलाई को वहाँ नमाज पढ़ी जाएगी और म्यूजियम मस्जिद बन जायेगा।

तुर्की के इस निर्णय का विरोध 

अया सोफ़िया (Hagia Sophia) 900 वर्षों तक Eastern Orthodox Church का मुख्यालय रहा था।  इससे जुड़े  लोगों के लिए इससे भावनात्मक लगाव है। इसलिए पूरी दुनिया में  जहा इस फेथ से जुड़े लोग हैं इसका विरोध कर रहे हैं।  जैसे Greece, France, Russia, United States of America आदि। साथ ही साथ World Council of Churches और पोप भी इसका पुरजोर विरोध कर रहे हैं।

UNESCO भी अपने World Heritage Committee के नियमों का हवाला देकर विरोध जता रहा है। इस नियम के मुताबिक World Heritage Site में शामिल किसी भी ईमारत का नाम या उपयोग को बदलने के लिए UNESCO के World Heritage Committee का अप्रूवल लेना होता है।

उम्मीद है आप लोग हया सोफ़िया विवाद (Hagia Sophia Controversy) को समझ गए होंगे। इसके बारे में आपकी सारी जिज्ञासा शांत हो गयी होगी। ये जानकारी आपके परीक्षाओं में भी काम आएंगी जैसे UPSC, State PSC इत्यादि।

अगर आप भी इसमें अपना अनुभव जोड़ना चाहते हैं या कुछ और भी लिखने का शौक रखते हैं तो Mail Us at ” [email protected] “साथ में अपना परिचय एक फोटो के साथ भी भेजें। आपकी रचना आपके नाम और फोटो के साथ प्रकाशित की जाएगी।

जिओ ग्लास (Jio Glass) क्या है और कैसे काम करता है?

कोरोना महामारी ने लोगो के जीने का तरीका ही बदल दिया है। पहले जो लोग मिलना जुलना पसंद करते थे, आमने सामने उपस्थित होकर काम करना पसंद करते थे, बॉस अपने एम्प्लोयी को ऑफिस आने के लिए  बोलते थे, वही आजकल सबकी यही इच्छा है कि work from home यानि घर बैठे काम करें। इसके लिए  बहुत सारे ऑनलाइन टूल्स भी हैं जैसे वीडियो एप्प (Zoom, Cisco Webex, Google Meet) इत्यादि। पर ये सभी टूल्स  वीडियो कॉलिंग और वीडियो मीटिंग के लिए हैं। कैसा रहेगा जब आप काम तो ऑनलाइन करोगे, मीटिंग, कॉन्फ्रेंस ऑनलाइन होगा पर आपको फील बिलकुल फेस टु फेस का होगा? आपको लगेगा की आप साथ में ही बैठे हो? साधारण शब्दों में की घर बैठे आप 3D मीटिंग कर पाओ।

दोस्तों ये सच होने वाला है।

रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (Reliance Industries Limited) चेयरमैन मुकेश अम्बानी ने अपने कंपनी के 43वें Annual General Meeting (AGM) में  की

आत्मनिर्भर भारत (Self Reliant India)

Jio has created a complete 5G solution from scratch, that will enable us to launch a world-class 5G service in India, using 100% homegrown technology and solutions.

                                                   Mukesh Ambani, Chairman, RIL.

 

मुकेश अम्बानी, जैसा की रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड अपने हर Annual General Meeting (AGM) में अपनी वित्तीय अवस्था के साथ साथ अपने आगे के प्लान्स जैसे इन्वेस्टमेंट आदि के बारे में घोषणा करते हैं, ने इस बात की भी घोषणा की कि रिलायंस जिओ की तरफ से एक 3D 2D वीडियो कालिंग और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, मीटिंग के लिए जिओ ग्लास (Jio Glass) का लांच किया जायेगा। हालाँकि इसके कीमत के बारे में कोई घोषणा नहीं हुई।

इस से न सिर्फ आप किसी से फेस टु फेस बात कर पाओगे, मीटिंग्स कर पाओगे बल्कि एक दूसरे को फील भी कर पाओगे। आपको लगेगा की आप Distance Calling  नहीं  बल्कि आमने सामने बैठकर बातें कर रहे हो।

जिओ ग्लास क्या है? What is Jio Glass?

जिओ गिलास एक वर्चुअल डिवाइस है जिसे चश्मे की तरह इस्तेमाल करके लोग 3D, 2D वीडियो कालिंग, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, नार्मल ऑडियो कॉलिंग और मीटिंग कर सकते हैं। इसमें होलोग्राफिक कंटेंट के लिए भी अपने स्मार्टफोन को जिओ ग्लास के साथ कनेक्ट करके इस्तेमाल किया जा सकता है।

Jio Glass

जिओ ग्लास का उपयोग Use of Jio Glass

3 D वीडियो कॉल 

2 D वीडियो कॉल 

वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (मीटिंग)

होलोग्राफिक सेशंस

जिओ ग्लास  काम कैसे करेगा ? How Jio Glass will Work?

जिओ गिलास  को आँखों में लगाकर उसमें दिए गए सेंसर और कैमरा को अपने स्मार्ट फ़ोन से कनेक्ट करके वीडियो कॉल और  कॉन्फ्रेंसिंग के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।  अपने स्मार्टफोन का इस्तेमाल करने के लिए ग्लास को अपने स्मार्ट फ़ोन को केबल से कनेक्ट करना होगा। जिससे आप अपने स्मार्ट फ़ोन के फोटोज को 3 D टेक्नोलॉजी में अनुभव कर सकते हैं।

 जिओ ग्लास की विशेषताएं Special about Jio Glass

High Resolution Display

जिओ गिलास से आप 3 D और 2 D वीडियो कॉल और कॉन्फ्रेंसिंग का अनुभव तो करेंगे ही साथ ही साथ नार्मल कॉल और होलोग्राफिक कॉल भी आसानी से कर सकेंगे। जिओ ग्लास (Jio Glass) में सेंसर और कैमरा लगा हुआ है जिससे ये ग्लास आपके स्मार्ट फ़ोन से कनेक्ट होगा और आप इसके फीचर्स का उपयोग कर सकेंगे। इस गिलास का उपयोग नार्मल फ़ोन में नहीं किया जा सकता है। इसके लिए आपके फ़ोन में एक्सेलेरोमीटर (Accelerometer), मैग्नेटोमीटर (Magnetometer), गोरोस्कोप (Gyroscope) और प्रोक्सिमिटी सेंसर (Proximity Sensor) होना चाहिए जो कि उपयोगकर्ता के गति का पता लगा सके।

इसका वजन केवल 75  ग्राम है जो की काफी हल्का है।

ये वर्चुअल क्लास रूम सेशन (Online Class Room Session ) के लिए बहुत बेहतर है क्योंकि इस से होलोग्रफिक सेशंस का इस्तेमाल किया जा सकता है जिससे की ऐतिहासिक स्थल जैसे प्राचीन मंदिरों, पिरामिडों, पहाड़ो इत्यादि को 3 D टेक्नोलॉजी से समझा जा सकता है जो की एक बेहतरीन अनुभव होने के साथ साथ विद्यार्थियों को समझने में भी आसानी रहेगी। ऑनलाइन एजुकेशन में विद्यार्थियों को ऐसा फील होगा जैसे वो क्लास रूम्स में बैठकर पढाई कर रहे हैं। उन्हें नक़्शे में  दिखानी हो तो सिर्फ फोटो न देखकर वो उस जगह को फील करेंगे।

अब भूगोल पढ़ने के पारम्परिक तरीके इतिहास हो जायेंगे। Traditional way of learning Geography will be History.

जिओ ग्लास (Jio Glass) हर तरह के ऑडियो फॉर्मेट को सपोर्ट करता है। साथ ही बिना किसी बाहरी एक्सेसरीज के personalized audio system सपोर्ट करता है।

जिओ ग्लास 25 से ज्यादा मिक्स्ड रियलिटी एप्प को भी सपोर्ट करता है जो मनोरंजन, शिक्षा, गेमिंग और शॉपिंग के हैं। जिस से आप अपने स्मार्ट फ़ोन के कंटेंट को भी एक्सेस कर सकेंगे वो भी वर्चुअल रियलिटी (Virtual Reality) के साथ। इसके लिए आपको अपने स्मार्ट फ़ोन को बस  से कनेक्ट करना है। साथ ही साथ वर्चुअल रियलिटी (Virtual Reality) के साथ शॉपिंग भी कर सकेंगे।

कुछ एप्प जिसे जिओ ग्लास सपोर्ट करता है।

जिओ ग्लास 25 से ज्यादा एप्प को सपोर्ट करता है जिनमे से कुछ ये हैं।

जिओ सिनेमा (Jio Cinema), जिओ सौन (Jio Sawn), जिओ टी वी + (Jio TV+), जिओ मीट (Jio Meet), रिलायंस डिजिटल (Reliance Digital), हैमलेस (Hamles), हॉर्स कार्ट (Horse Cart), स्पाइरल स्केट (Spiral Skate), फनी बन्नी (Funny Bunny) इत्यादि।

जिओ ग्लास के लिए रजिस्ट्रेशन कैसे करें? How and where to register for Jio Glass?

जिओ ग्लास कब तक बाजार में मिलेगा और इसकी कीमत क्या होगी, इसके बारे में कंपनी ने अभी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की है। अगर आप चाहते  हैं कि जिओ ग्लास (Jio Glass) आपको बाजार में एते ही मिले तो आप कंपनी के website पर जाकर  रजिस्टर कर सकते हैं।  आपको अपना कुछ डिटेल देने होंगे।  Go to official website

 

अगर आप भी इसमें अपना अनुभव जोड़ना चाहते हैं या कुछ और भी लिखने का शौक रखते हैं तो Mail Us at ” [email protected] “साथ में अपना परिचय एक फोटो के साथ भी भेजें। आपकी रचना आपके नाम और फोटो के साथ प्रकाशित की जाएगी।