ऐसे थे महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद

नाम – आज़ाद
बाप का नाम – स्वतंत्र
घर कहाँ है – जेल


ये शब्द थे महान क्रांतिकारी श्री चंद्रशेखर आज़ाद (Chandrashekhar Azad) के जब उन्हें पुलिस ने गिरफ्तार किया गया और जब उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया और मजिस्ट्रेट ने उनसे पूछा।  तब वो महज 15 वर्ष के थे।

By Vishanksingh1 – Own work, CC BY-SA 4.0, http://By Vishanksingh1 – Own work, CC BY-SA 4.0, https://commons.wikimedia.org/w/index.php?curid=41785459

दुश्मन की गोलियों का सामना हम करेंगे, आज़ाद हैं और आज़ाद ही रहेंगे – ये शब्द हैं देश के लिए अपना जीवन न्योछावर कर देने वाले चंद्रशेखर आज़ाद के।
ऐसे बहुत सारी बातें और कार्य हैं जिनसे लोगो के मन में देशभक्ति का जोश भर जाता है। पूरा देश चंद्रशेखर आज़ाद को नमन कर रहा है।

आज महान क्रन्तिकारी श्री चंद्रशेखर आज़ाद (Chandrashekhar Azad) से जुडी बहुत सारी प्रेरणा देने वाली कहानियाँ जानेंगे।
पर उस से पहले थोड़ा उनका जीवन परिचय जान लें। चंद्रशेखर आज़ाद देश के महानतम क्रांतिकारियों में से एक थे जिन्होंने न सिर्फ अपना जीवन देश के लिए न्योछावर किया बल्कि हजारो युवाओं को देश पर बलिदान के लिए प्रेरित किया और आज भी लोग उनके जीवन और कर्मों के बारे में जानकर प्रेरित होते हैं।

पर अफ़सोस आज हमारा देश उन्हें वो सम्मान नहीं दे पा रहा है जो उन्हें देना चाहिए।

चंद्रशेखर आज़ाद का जीवन परिचय

महज 25 वर्ष की आयु में देश के लिए बलिदान होने वाले चंद्रशेखर आज़ाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के भावरा नामक गाँव में इनका जन्म हुआ और जन्म के समय इनका नाम था चंद्रशेखर तिवारी। इनके पिता का नाम सीताराम तिवारी और माँ का नाम जगरानी देवी था। उनकी माँ की इच्छा थी की चंद्रशेखर आज़ाद संस्कृत के विद्वान बने, इसलिए वो चाहती थी की ये कशी जाकर संस्कृत और धार्मिक शिक्षा ले पर ये बात न तो चंद्रशेखर आज़ाद को मंजूर थी और न ही ईश्वर को। चंद्रशेखर आज़ाद के मन में कुछ और ही चल रहा था।  बचपन से ही चंद्रशेखर आज़ाद के मन में भारत में अंग्रेजों का शाशन खटकता था और उनके मन में हमेशा यही प्लानिंग चलती रहती थी की किस तरह से हमारा देश इन अंग्रेजों के चंगुल से आज़ाद होगा।
तभी देश में 13 अप्रैल 1919 में जलियावाला बाग हत्याकांड (Jaliawala Bagh Masacre) हुआ जिसमे करीब 1600 भारतियों को जनरल डायर (General Dayar) के आदेश पर गोलियों से भून दिया गया। अंग्रेजों की इस क्रूरता से पूरा देश उबाल रहा था और इस घटना ने आज़ाद के मन में गहरा ठेस पहुंचाया। इस घटना ने आज़ाद के मन के कोने में पड़ी क्रन्तिकारी विचार को उभारने का काम किया और 1921 में महज 15 वर्ष की आयु में चंद्रशेखर आज़ाद ने महात्मा गाँधी के असहयोग आंदोलन में भाग लिया। इस आंदोलन में कई देशभक्तों के साथ उन्हें भी गिरफ्तार किया गया और जब उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया और मजिस्ट्रेट ने उनसे पूछा
नाम – आज़ाद
बाप का नाम – स्वतंत्र
घर कहाँ है – जेल 
इस जवाब से मजिस्ट्रेट इतना क्षुब्ध हुआ की महज 15 वर्ष के बच्चे को 15 कोड़े मारने की सजा सुना दी। जब आज़ाद को कोड़े पड़ रहे थे तो एक आम बच्चे से उलट उनके मुँह से आह निकलने की जगह हर कोड़े के साथ ” भारत माता की जय ” निकल रहा था। इसी घटना के बाद उनके नाम के साथ आज़ाद शब्द जुड़ गया तथा उन्हें चंद्रशेखर आज़ाद बुलाया जाने लगा।
फिर अचानक १९२२ में महात्मा गाँधी ने असहयोग आंदोलन को वापस ले लिया। महात्मा गाँधी के इस कार्य ने देश में बहुत लोगो को अचंभित तथा निराश किया। उसमे चंद्रशेखर आज़ाद भी थे। अब इन्होने आंदोलनों का राष्ट त्याग कर क्रन्तिकारी रास्ता अपनाने का सोचा। अब इनकी मुलाकात मन्मथ नाथ गुप्ता (Manmath Nath Gupta) से हुई  जिनके माध्यम से चंद्रशेखर आज़ाद की मुलाकात रामप्रसाद बिस्मिल (Ramprasad Bismil) से हुई जो हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (Hindustan Republican Association) HRA के संस्थापक थे। रामप्रसाद बिस्मिल चंद्रशेखर आज़ाद बहुत प्रभावित हुए तथा उन्हें हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का सदस्य बना लिया।
और हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (Hindustan Republican Association) ने पैसे इकठ्ठा करने के लिए एक ट्रैन लूटने की योजना बनाई जिसको 9 अगस्त 1925 को काकोरी स्टेशन पर अंजाम दिया गया। इस घटना को हम काकोरी कांड (Kakori Kand) के नाम से भी जानते हैं। इस लूट कांड में बहुत क्रांतिकारियों ने भाग लिया जिनमे से कई पकडे गए पर चंद्रशेखर आज़ाद पुलिस की गिरफ्त से दूर रहे और वो अंग्रेजी शाशन के लिए सर दर्द बने रहे। फिर 1928 में आज़ाद ने भगत सिंह के साथ मिलकर हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (Hindustan Republican Association) को हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (Hindustan Socialist Republican Association) बना दिया। 1928 में जब लाला लाजपत राय की पुलिस की लाठियों से मृत्यु हो गयी तो क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों से इसका बदला लेने का प्राण किया और ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन सांडर्स की हत्या कर दी। इस घटना के बाद अंग्रेजी सरकार ने बहुत क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया पर आज़ाद अब भी पकड़ से बहार थे।  अब आज़ाद ने प्राण कर लिया था की न तो अंग्रेजो की पकड़ में आना है और न ही पुलिस की गोली से मरना है। 1931 में जब भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव जेल में थे और चंद्रशेखर आज़ाद अलाहाबाद में उनकी पैरवी क लिए थे। 27 फरवरी 1931 को जब चंद्रशेखर आज़ाद इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क (Alfred Park) में एक पेड़ के निचे बैठे थे तभी पुलिस को उनके वह होने की सुचना मिल गयी। उनकी सुचना पुलिस के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी। क्यूंकि जिनको पकड़ने के लिए पूरा अंग्रेजी शाशन लगा था और वो उनकी पकड़ से बहार था ऐसे में एक सुचना उनके लिए बहुत मायने रखती थी। उसके बाद पुलिस ने उस पार्क को चारो तरफ से घेर लिया।  
आज़ाद के पास हथियार के नाम पर महज एक पिस्तौल था जिस से उन्होंने पुलिस का डट कर मुकाबला किया और जब उनके पास सिर्फ एक गोली बच गयी तो उन्होंने उस गोली से खुद को मारकर अपना अंग्रेजो की पकड़ में नहीं आने का और पुलिस की गोली से न मरने का प्राण पूरा किया।
पर मरने के पहले चंद्रशेखर आज़ाद ने कई पुलिस वालो को मारा। उनकी इतनी दहशत थी की उनके मरने के घंटों बाद भी किसी पुलिसवाले और गोरे अंग्रेज की हिम्मत नहीं हुई की उनके शव के पास जा सके। घंटों बाद उनके शव को हिला डुला कर उनकी मृत्यु सुनिश्चित करने के बाद ही उनके शव को हटाया गया। ये था महान क्रन्तिकारी चंद्रशेखर आज़ाद का संक्षिप्त जीवन परिचय। उनके जीवन से प्रेरणा लेने के लिए हमारे पास बहुत ही कहानियां हैं जिनमे से कुछ के बारे में आज बात करते हैं। 

आज़ाद के पिस्तौल की कहानी Story of Azad’s Pistol

By INDIATECK1435 – Own work, CC BY-SA 4.0, Link http://By INDIATECK1435 – Own work, CC BY-SA 4.0, https://commons.wikimedia.org/w/index.php?curid=76779101

Colt कम्पनी की इस पिस्टल को तो बहुत लोग पहचानते होंगे लेकिन बहुत सारे लोग 0. 32 बोर की कोल्ट पिस्टल के भारत आने की कहानी नहीं जानते होंगे।
1970 के आसपास कुछ लोगों ने उसे तलाशना शुरू किया। इलाहाबाद के सरकारी मालखाने से पता चला कि वह पिस्तौल उस अधिकारी जिसने चंद्रशेखर आज़ाद को उस पार्क में घेरा था यानि नॉट बाबर को इंग्लैंड जाते समय भेंट में दे दी गई थी। तब नॉट बाबर से पत्राचार कर पिस्तौल की मांग की गई। इलाहाबाद के आयुक्त मुस्तफी ने नॉट बाबर को खत लिखा था। नॉट बाबर ने कोई उत्तर नहीं दिया। इसके बाद भारतीय उच्चायोग से हस्तक्षेप करने का आग्रह किया गया। इंग्लैंड में तैनात भारत के उच्चायुक्त ने नॉट बाबर से पिस्तौल लौटाने का आग्रह किया। कुछ ना-नुकुर के बाद नॉट बाबर पिस्तौल लौटाने को राजी हो गया, लेकिन उसने एक शर्त रखी। कहा कि उसके पास भारत सरकार अनुरोध पत्र भेजे, जिसमें आजाद के शहादत स्थल पर आज़ाद की मूर्ति लगाकर उसकी फ़ोटो भेजे तभी वो आज़ाद की पिस्तौल वापस करेगा। ऐसा किया गया तब जाकर उस अधिकारी ने वो पिस्तौल इंडिया को वापस की। मतलब वो अंग्रेज अधिकारी जानता था कि हम भारतीय अपने देश के असली हीरोज़ के लिए कितने सीरीयस हैं…

आज़ाद और उनका फोटो Azad and his Photograph


आज हम चंद्रशेखर आज़ाद का एक रोबदार फोटो जिसमे उनकी हाथों में पिस्तौल है और वो अपने मूछों पर बड़ी शान से ताव दे रहे हैं, देखते हैं। उस फोटो के पीछे भी एक कहानी है। क्या वो कहानी आप जानते हैं? वो फोटो कब और किसके द्वारा लिया गया था और उसके बाद आज़ाद की क्या प्रतिक्रिया थी?

आज़ाद उस फोटो को नष्ट करना चाहते थे। जी हाँ। आपने बिलकुल सही सुना।


आज़ाद एक क्रन्तिकारी थे और उनकी कोई भी पहचान पुलिस के पास नहीं थी और वो नहीं चाहते थे की उनकी फोटो अंग्रेजी शाशन के हाथ लगे। वो अपनी पहचान हमेशा छुपा के रखना चाहते थे।
अब आपके मन में एक सवाल आ रहा होगा की फिर उनकी तस्वीर ली किसने और वो अपनी तस्वीर खिचाने के लिए राजी कैसे हुए?


दोस्तों इसके पीछे की कहानी बहुत दिलचस्प है। 


काकोरी कांड के बाद जब आज़ाद और बाकि क्रांतिकारी भूमिगत हो गए थे तब आज़ाद अपने मित्र रूद्र नारायण (Rudra Narayan) के घर झाँसी में रह रहे थे। वहाँ रूद्र नारायण ने चंद्रशेखर आज़ाद को ये तस्वीर खिंचवाने के लिए राजी किया था। पहले तो आज़ाद बिलकुल राजी नहीं थे क्यूंकि वो नहीं चाहते थे कि किसी भी तरह से उनकी तस्वीर पुलिस के पास पहुंचे। उनका मानना था कि न तो उनकी तस्वीर रहेगी और न ही पुलिस के पास पहुंचने का खतरा रहेगा। अंततः वो अपने मित्र की बात मन कर तस्वीर खिंचवाने के लिए राजी हो गए। पर तस्वीर खिंच जाने के बाद उनको लगा की उनसे गलती हो गयी है, उन्हें अपनी तस्वीर नहीं खिंचवानी चाहिए थी। वो उस तस्वीर को नष्ट करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने अपने मित्र और क्रांतिकारी विश्वनाथ वैशम्पायन (Vishwanath Vaishampayan) को रूद्र नारायण के पास तस्वीर नष्ट करवाने के लिए भेजा। रूद्र नारायण ने कहा की उन्हें आज़ाद के अंदेशा और मामले की गंभीरता की समझ है। ये तस्वीर उन्होंने इस लिए लिया है की जब आगे की पीढ़ी आज़ाद के बारे में पढ़े, उनके गौरव गाथा के बारे में जाने तो उनके पास कुछ ऐसा रहे जिस से वो आज़ाद की अपने आप से जुड़ा महसूस कर सके। विश्वनाथ वैशम्पायन से रूद्र नारायण ने कहा की आप आज़ाद को बोल दें की तस्वीरें और नेगेटिव दीवार में चुनवा दी गयी हैं। इस तरह से आज हमारे पास आज़ाद की तस्वीर सुरक्षित बची है। 

Quotes of Shree Chandrashekhar Azad

  1. दूसरों को खुद से बेहतर करता हुआ न देखो, हर रोज अपना रिकॉर्ड तोड़ो क्यूंकि तुम्हारी लड़ाई बस तुम्हारे साथ है।
  2. मैं एक ऐसे धर्म में विश्वास करता हूँ जो स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा का प्रसार करती है।
  3. अगर आपके खून में उबाल नहीं है तो आपकी नसों में खून नहीं पानी दौड़ रहा है।
  4. एक जहाज जमीन पर सदैव सुरक्षित रहता है, पर ये जमीन पर रहने के लिए नहीं बना है। जीवन में ऊंचाइयों को प्राप्त करने के लिए हमेशा सार्थक जोखिम लेना चाहिए।
  5. ऐसी जवानी किसी काम की नहीं जो अपने मातृभूमि के काम न आ सके।

दोस्तों ये थी हमारे महान क्रन्तिकारी श्री चंद्रशेखर आज़ाद की प्रेरणादायी कहानी।

अगर आप भी इसमें अपना अनुभव जोड़ना चाहते हैं या कुछ और भी लिखने का शौक रखते हैं तो Mail Us at ” [email protected] “साथ में अपना परिचय एक फोटो के साथ भी भेजें। आपकी रचना आपके नाम और फोटो के साथ प्रकाशित की जाएगी।

Leave a Comment