अया सोफ़िया (Hagia Sophia) विवाद क्या है और इसे मस्जिद में क्यों बदल दिया गया?

अया सोफ़िया (Hagia Sophia) चर्च से मस्जिद, मस्जिद से म्यूजियम और फिर म्यूजियम से वापस मस्जिद बन गया।

अब आपके मन में कुछ सवाल आ रहे होंगे। जैसे ये अया सोफ़िया (Hagia Sophia) है क्या? ये बना कब? ये मस्जिद में कब और क्यों बदल गया? मस्जिद से म्यूजियम किसने बनाया? फिर अब ऐसा क्या हो गया की वापस मस्जिद बन गया? ये पूरा विवाद है क्या?

आपकी हर जिज्ञासा शांत होगी। धैर्य रखें और आर्टिकल पूरा पढ़ें।

Hagia Sophia Controversy
Hagia Sophia in Istanbul https://www.pexels.com/photo/hagia-sophia-museum-3969150/
अनुक्रम

  • अया सोफ़िया (Hagia Sophia) क्या है और कहाँ है?
  • इसका अर्थ
  • इसका इतिहास
    • चर्च के रूप में।
    • मस्जिद के रूप में।
    • म्यूजियम के रूप में।

हया सोफ़िया (Hagia Sophia) क्या है और कहाँ है?

अया सोफ़िया (Hagia Sophia) तुर्की के राजधानी इस्तांबुल में स्थित एक शानदार और विश्व प्रसिद्द दर्शनीय स्थल (Tourist Destination) है जिसे प्रति वर्ष लाखों लोग देखने विश्व के कोने कोने से आते हैं। जैसे की शीर्षक से ही पता चल रहा होगा की ये रोमन साम्राज्य के समय पहले चर्च के रूप में बना (चर्च में भी पहले Western Orthodox Church फिर बैजंटीन साम्राज्य के समय Estern Orthodox Church) फिर ओट्टोमन साम्राज्य (Ottomon Empire) में मस्जिद के रूप में बदल गया, फिर आधुनिक तुर्की ने निर्माता मुस्तफा कमाल पाशा (Mustafa Kemal Pasha) ने इसे म्यूजियम में बदल दिया।

जब ये बनकर तैयार हुआ  तब ये दुनिया का सबसे बड़ा आतंरिक स्ट्रक्चर वाला ईमारत था। और ये करीब 1000 साल तक विश्व का सबसे बड़ा कैथेड्रल बना रहा।

अया सोफ़िया (Hagia Sophia) का अर्थ Meaning of Hagia Sophia

इसका अर्थ Holy Wisdom या Sacred Truth होता है।

अया सोफ़िया (Hagia Sophia)का इतिहास 

 चर्च के रूप में।

इसका इतिहास शुरू होता है 360  और 415 ईस्वी से। 360 ईस्वी में  रोमन साम्राज्य द्वारा एक चर्च का निर्माण किया जाता है जो की बाद में आग लगने के कारण नष्ट हो जाता।  फिर 415 ईस्वी में दोबारा एक चर्च का निर्माण होता है जो की फिर से से नष्ट हो जाता है।

फिर 537 ईस्वी में सम्राट जस्टिनियन के द्वारा चर्च का निर्माण कराया जाता है जो आज का अया सोफ़िया (Hagia Sophia) है।

उस समय ईसाइयत में दो सेक्ट थे। Eastern Orthodox Church और Western Orthodox Church।

Eastern Orthodox Church का मुख्यालय Constantinopole  आज का इस्तांबुल में थे तथा Western Orthodox Church का मुख्यालय Vatican में था।

अया सोफ़िया (Hagia Sophia) करीब 900 वर्षों तक Eastern Orthodox Church का मुख्यालय  बना रहा।

 मस्जिद के रूप में।

1453 में Constantinopole को ओटोमन साम्राज्य के सुल्तान मेहमत (Sultan Mehmat) द्वारा जीत लिया जाता है। कई दिनों तक तुर्की में और Constantinopole लुटा जाता है। साथ ही अया सोफ़िया (Hagia Sophia) को भी लुटा जाता है, उसे पूरी तरह से बर्बाद नहीं किया जाता है। सुल्तान मेहमत को पता चलता है की इसे जीतने में तुर्क और अरब 900 वर्षों तक नाकाम रहे। वो उस चर्च  में जाता है जिसे ईसाइयत के गौरव के रूप में देखा जाता था। उस ईमारत में जाने के बाद, उसकी बनावट और खूबसूरती देखने के बाद उसे अपने जीत पर और ज्यादा गर्व होता है। उसी समय सुल्तान मेहमत वहाँ नमाज पढता है और चर्च को मस्जिद में बदल देता है।

चर्च को मस्जिद में बदलने के लिए सुल्तान ने ईसाइयत के प्रतिक चिन्हों को ढंक दिया और प्लास्टर करवा दिया। अंदर इस्लामिक प्रतिक चिन्ह बनवाये।

म्यूजियम के रूप में। 

प्रथम विश्वयुद्ध के बीतते बीतते ओटोमन साम्राज्य बिखर गया तथा उसका शाशन समाप्त हो गया।

1922 में आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष तुर्की का निर्माण मुस्तफा कमाल पाशा (Mustefa Kemal Pasha) के नेतृत्व में होता है जिन्हे “अतातुर्क” के नाम से भी जाना जाता है। इन्हे आधुनिक तुर्की का पिता या जनक भी कहा जाता है। अतातुर्क का अर्थ तुर्की का पिता (Father of Turkey) होता है।

जो सम्मान भारत में महात्मा गाँधी को है वही सम्मान तुर्की में मुस्तफा कमाल पाशा (Mustefa Kemal Pasha) को दिया जाता है।

ये आधुनिक और धर्मनिरपेक्ष विचारों के व्यक्ति थे। इनका मकसद तुर्की को एक आधुनिक और धर्मनिरपेक्ष देश बनाना था। ये एक ऐसा तुर्की चाहते थे जिसका कोई राज्य धर्म  न हो,  औरतों और अल्पसंख्यकों को समान अधिकार हो।

1934 में इन्होने अया सोफ़िया (Hagia Sophia) को मस्जिद से  बदलकर म्यूजियम में बदल दिया जिसे

1985 में UNESCO (United Nationa Educational, Scientific and Cultural Organisation) ने World Heritage Site का दर्जा दिया।

1935 में इसे जनता के लिए खोल दिया गया और ये विश्व के सबसे प्रसिद्ध दर्शनीय स्थलों में  से एक बन गया।

2013 में सरकार ने इसके मीनारों को नमाज के लिए खोल दिया।

2016 में 85 वर्षों के बाद पहली बार इसमें  नमाज पढ़ी गयी।

2018 में तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन (Recep Tayyip Erdogan) ने खुद वहाँ नमाज पढ़ी और उसे मस्जिद में बदलने की बात की।

2019 में राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन (Recep Tayyip Erdogan) की पार्टी ने इस्तांबुल के स्थानीय चुनाव में ये मुद्दा उठाया पर चुनाव में हार गए।

2020 में ओटोमन साम्राज्य के आक्रमण के 567वें वर्षगांठ के दिन उस म्यूजियम में फिर से नमाज पढ़ी जाती है।

इसके बाद न्यायलय ने Association for the Protection of Historic Monument and the Environment नाम के एक ग्रुप की याचिका पर मस्जिद में बदलने का निर्णय दिया।

अंतत: 24  जुलाई को वहाँ नमाज पढ़ी जाएगी और म्यूजियम मस्जिद बन जायेगा।

तुर्की के इस निर्णय का विरोध 

अया सोफ़िया (Hagia Sophia) 900 वर्षों तक Eastern Orthodox Church का मुख्यालय रहा था।  इससे जुड़े  लोगों के लिए इससे भावनात्मक लगाव है। इसलिए पूरी दुनिया में  जहा इस फेथ से जुड़े लोग हैं इसका विरोध कर रहे हैं।  जैसे Greece, France, Russia, United States of America आदि। साथ ही साथ World Council of Churches और पोप भी इसका पुरजोर विरोध कर रहे हैं।

UNESCO भी अपने World Heritage Committee के नियमों का हवाला देकर विरोध जता रहा है। इस नियम के मुताबिक World Heritage Site में शामिल किसी भी ईमारत का नाम या उपयोग को बदलने के लिए UNESCO के World Heritage Committee का अप्रूवल लेना होता है।

उम्मीद है आप लोग हया सोफ़िया विवाद (Hagia Sophia Controversy) को समझ गए होंगे। इसके बारे में आपकी सारी जिज्ञासा शांत हो गयी होगी। ये जानकारी आपके परीक्षाओं में भी काम आएंगी जैसे UPSC, State PSC इत्यादि।

अगर आप भी इसमें अपना अनुभव जोड़ना चाहते हैं या कुछ और भी लिखने का शौक रखते हैं तो Mail Us at ” [email protected] “साथ में अपना परिचय एक फोटो के साथ भी भेजें। आपकी रचना आपके नाम और फोटो के साथ प्रकाशित की जाएगी।

जिओ ग्लास (Jio Glass) क्या है और कैसे काम करता है?

कोरोना महामारी ने लोगो के जीने का तरीका ही बदल दिया है। पहले जो लोग मिलना जुलना पसंद करते थे, आमने सामने उपस्थित होकर काम करना पसंद करते थे, बॉस अपने एम्प्लोयी को ऑफिस आने के लिए  बोलते थे, वही आजकल सबकी यही इच्छा है कि work from home यानि घर बैठे काम करें। इसके लिए  बहुत सारे ऑनलाइन टूल्स भी हैं जैसे वीडियो एप्प (Zoom, Cisco Webex, Google Meet) इत्यादि। पर ये सभी टूल्स  वीडियो कॉलिंग और वीडियो मीटिंग के लिए हैं। कैसा रहेगा जब आप काम तो ऑनलाइन करोगे, मीटिंग, कॉन्फ्रेंस ऑनलाइन होगा पर आपको फील बिलकुल फेस टु फेस का होगा? आपको लगेगा की आप साथ में ही बैठे हो? साधारण शब्दों में की घर बैठे आप 3D मीटिंग कर पाओ।

दोस्तों ये सच होने वाला है।

रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (Reliance Industries Limited) चेयरमैन मुकेश अम्बानी ने अपने कंपनी के 43वें Annual General Meeting (AGM) में  की

आत्मनिर्भर भारत (Self Reliant India)

Jio has created a complete 5G solution from scratch, that will enable us to launch a world-class 5G service in India, using 100% homegrown technology and solutions.

                                                   Mukesh Ambani, Chairman, RIL.

 

मुकेश अम्बानी, जैसा की रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड अपने हर Annual General Meeting (AGM) में अपनी वित्तीय अवस्था के साथ साथ अपने आगे के प्लान्स जैसे इन्वेस्टमेंट आदि के बारे में घोषणा करते हैं, ने इस बात की भी घोषणा की कि रिलायंस जिओ की तरफ से एक 3D 2D वीडियो कालिंग और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, मीटिंग के लिए जिओ ग्लास (Jio Glass) का लांच किया जायेगा। हालाँकि इसके कीमत के बारे में कोई घोषणा नहीं हुई।

इस से न सिर्फ आप किसी से फेस टु फेस बात कर पाओगे, मीटिंग्स कर पाओगे बल्कि एक दूसरे को फील भी कर पाओगे। आपको लगेगा की आप Distance Calling  नहीं  बल्कि आमने सामने बैठकर बातें कर रहे हो।

जिओ ग्लास क्या है? What is Jio Glass?

जिओ गिलास एक वर्चुअल डिवाइस है जिसे चश्मे की तरह इस्तेमाल करके लोग 3D, 2D वीडियो कालिंग, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, नार्मल ऑडियो कॉलिंग और मीटिंग कर सकते हैं। इसमें होलोग्राफिक कंटेंट के लिए भी अपने स्मार्टफोन को जिओ ग्लास के साथ कनेक्ट करके इस्तेमाल किया जा सकता है।

Jio Glass

जिओ ग्लास का उपयोग Use of Jio Glass

3 D वीडियो कॉल 

2 D वीडियो कॉल 

वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (मीटिंग)

होलोग्राफिक सेशंस

जिओ ग्लास  काम कैसे करेगा ? How Jio Glass will Work?

जिओ गिलास  को आँखों में लगाकर उसमें दिए गए सेंसर और कैमरा को अपने स्मार्ट फ़ोन से कनेक्ट करके वीडियो कॉल और  कॉन्फ्रेंसिंग के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।  अपने स्मार्टफोन का इस्तेमाल करने के लिए ग्लास को अपने स्मार्ट फ़ोन को केबल से कनेक्ट करना होगा। जिससे आप अपने स्मार्ट फ़ोन के फोटोज को 3 D टेक्नोलॉजी में अनुभव कर सकते हैं।

 जिओ ग्लास की विशेषताएं Special about Jio Glass

High Resolution Display

जिओ गिलास से आप 3 D और 2 D वीडियो कॉल और कॉन्फ्रेंसिंग का अनुभव तो करेंगे ही साथ ही साथ नार्मल कॉल और होलोग्राफिक कॉल भी आसानी से कर सकेंगे। जिओ ग्लास (Jio Glass) में सेंसर और कैमरा लगा हुआ है जिससे ये ग्लास आपके स्मार्ट फ़ोन से कनेक्ट होगा और आप इसके फीचर्स का उपयोग कर सकेंगे। इस गिलास का उपयोग नार्मल फ़ोन में नहीं किया जा सकता है। इसके लिए आपके फ़ोन में एक्सेलेरोमीटर (Accelerometer), मैग्नेटोमीटर (Magnetometer), गोरोस्कोप (Gyroscope) और प्रोक्सिमिटी सेंसर (Proximity Sensor) होना चाहिए जो कि उपयोगकर्ता के गति का पता लगा सके।

इसका वजन केवल 75  ग्राम है जो की काफी हल्का है।

ये वर्चुअल क्लास रूम सेशन (Online Class Room Session ) के लिए बहुत बेहतर है क्योंकि इस से होलोग्रफिक सेशंस का इस्तेमाल किया जा सकता है जिससे की ऐतिहासिक स्थल जैसे प्राचीन मंदिरों, पिरामिडों, पहाड़ो इत्यादि को 3 D टेक्नोलॉजी से समझा जा सकता है जो की एक बेहतरीन अनुभव होने के साथ साथ विद्यार्थियों को समझने में भी आसानी रहेगी। ऑनलाइन एजुकेशन में विद्यार्थियों को ऐसा फील होगा जैसे वो क्लास रूम्स में बैठकर पढाई कर रहे हैं। उन्हें नक़्शे में  दिखानी हो तो सिर्फ फोटो न देखकर वो उस जगह को फील करेंगे।

अब भूगोल पढ़ने के पारम्परिक तरीके इतिहास हो जायेंगे। Traditional way of learning Geography will be History.

जिओ ग्लास (Jio Glass) हर तरह के ऑडियो फॉर्मेट को सपोर्ट करता है। साथ ही बिना किसी बाहरी एक्सेसरीज के personalized audio system सपोर्ट करता है।

जिओ ग्लास 25 से ज्यादा मिक्स्ड रियलिटी एप्प को भी सपोर्ट करता है जो मनोरंजन, शिक्षा, गेमिंग और शॉपिंग के हैं। जिस से आप अपने स्मार्ट फ़ोन के कंटेंट को भी एक्सेस कर सकेंगे वो भी वर्चुअल रियलिटी (Virtual Reality) के साथ। इसके लिए आपको अपने स्मार्ट फ़ोन को बस  से कनेक्ट करना है। साथ ही साथ वर्चुअल रियलिटी (Virtual Reality) के साथ शॉपिंग भी कर सकेंगे।

कुछ एप्प जिसे जिओ ग्लास सपोर्ट करता है।

जिओ ग्लास 25 से ज्यादा एप्प को सपोर्ट करता है जिनमे से कुछ ये हैं।

जिओ सिनेमा (Jio Cinema), जिओ सौन (Jio Sawn), जिओ टी वी + (Jio TV+), जिओ मीट (Jio Meet), रिलायंस डिजिटल (Reliance Digital), हैमलेस (Hamles), हॉर्स कार्ट (Horse Cart), स्पाइरल स्केट (Spiral Skate), फनी बन्नी (Funny Bunny) इत्यादि।

जिओ ग्लास के लिए रजिस्ट्रेशन कैसे करें? How and where to register for Jio Glass?

जिओ ग्लास कब तक बाजार में मिलेगा और इसकी कीमत क्या होगी, इसके बारे में कंपनी ने अभी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की है। अगर आप चाहते  हैं कि जिओ ग्लास (Jio Glass) आपको बाजार में एते ही मिले तो आप कंपनी के website पर जाकर  रजिस्टर कर सकते हैं।  आपको अपना कुछ डिटेल देने होंगे।  Go to official website

 

अगर आप भी इसमें अपना अनुभव जोड़ना चाहते हैं या कुछ और भी लिखने का शौक रखते हैं तो Mail Us at ” [email protected] “साथ में अपना परिचय एक फोटो के साथ भी भेजें। आपकी रचना आपके नाम और फोटो के साथ प्रकाशित की जाएगी।

 

विजय दिवस कब और क्यों मनाया जाता है ?

तू शहीद हुआ 

तो न जाने  कैसे तेरी माँ सोई होगी। 

एक बात तय है 

तुझे लगने वाली गोली सौ बार रोई होगी। 

शत शत नमन कारगिल , एक अटल विजय 

श्री अटल बिहारी वाजपेयी, पूर्व प्रधानमंत्री 

आज 26 जुलाई का वो गौरव पूर्ण दिन है जिस दिन हमारी भारतीय सेना ने कारगिल की पहाड़ियों से पाकिस्तानी सैनिकों और घुसपैठियों को बुरी तरह से हराकर भगाया था। हमारी सेना के पास काम संसाधनों और बुरी परिस्थितियाँ थी, उसके बावजूद हमारी सेना के अदम्य सहस और पराक्रम के आगे पाकिस्तानी फ़ौज और पाकिस्तानी आतंकवादी टिक नहीं पाए। उन्हें दुम दबाकर भागना पड़ा।

तभी कहा जाता है

योद्धा पैदा नहीं होते,

वो भारतीय सेना में बनते हैं। 

और उसी उपलक्ष्य में हम प्रति वर्ष 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस के रूप में मनाते हैं और उस दिन  वीर सैनिकों को नाम आँखों से याद करते हैं तथा उनकी महान शहादत को नमन करते हैं।

है नमन उनको की जिनके सामने बौना हिमालय

महान कवि कुमार विश्वास

कारगिल युध्द की शुरुआत 

कारगिल युद्ध की पृष्ठभूमि तभी बनने लगी थी फरवरी 1999 में जब प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी लाहौर बस यात्रा पर गए और जब भारत और पाकिस्तान के बीच लाहौर एग्रीमेंट हुआ जिसमे कुछ बातों पर दोनों देशों में सहमति बनी थी जैसे

परमाणु हथियारों के इस्तेमाल से दोनों देश दूर रहेंगे।

किसी भी तरह के संघर्ष से दूर रहेंगे।

सभी विवादों का निपटारा शांतिपूर्ण तरीके से होगा।

पर ऐसा हुआ नहीं।

अब आपके दिमाग में ये प्रश्न भी आ रहा होगा की कारगिल के भारतीय चौकियों पर पाकिस्तानी फ़ौज का कब्ज़ा कैसे हो गया ? हमारी सेना क्या कर रही थी ?

तो आपका ये जानना बेहद जरुरी है कि भारत और पाकिस्तान सीमा पर कुछ पोस्ट बहुत उचाई पर हैं जहा से नवंबर दिसंबर में सर्दियों में बर्फ गिरने लगती है तो दोनों देशों की सेनाएं पीछे हट जाती हैं  गर्मी आती है मई महीने में तो फौजें वापस अपने पोस्ट पर जाती हैं। पर 1999 के फ़रवरी और मई के बिच में जब भारतीय सेना अपने पोस्ट पर नहीं थी तब पाकिस्तानी फ़ौज ने उन पोस्ट्स कर कब्ज़ा कर लिया। जब गरखुन गाँव का एक चरवाहा ताशी नामग्याल अपनी भेड़े और एक चरा रहा था तब उसकी एक एक खो गयी। एक को खोजने के लिए ताशी नामग्याल पहाड़ी पर ऊपर गया तो उसने कुछ लोगों को हथियारों के साथ पहाड़ी पर चढ़ते देखा जो उसे अजीब लगा।  उसने इसकी सुचना भारतीय सेना को दी तब भारतीय फ़ौज की एक टुकड़ी को पेट्रोलिंग के लिए भेजा गया। और ये घुसपैठ को सच पाया गया।

पाकिस्तानी फ़ौज का भारतीय चौकियों पर कब्ज़ा करने का मुख्य उद्देश्य कश्मीर का लेह लद्दाख से संपर्क को तोडना था क्योंकि वो चौकियाँ ऊंचाई पर थी जिस से श्री नगर को लेह से जोड़ने वाली सड़क राष्ट्रीय राजमार्ग 1 D (NH1D) पर नजर रखना आसान था। ये राजमार्ग भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण था। अगर इसपर पाकिस्तान का कब्ज़ा होने का मतलब था कश्मीर का लेह लद्दाख से संपर्क टूटना। और भारतीय चौकियाँ जिस पर पाकिस्तानी फ़ौज ने घुसपैठ करके कब्ज़ा कर लिया था इस राजमार्ग पर नजर रखे हुए थे।

इस राजमार्ग के महत्व का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं की इसी राजमार्ग से सियाचिन पर सेना का मूवमेंट होता था। इस राजमार्ग भारत के हाथ से निकलने का मतलब था भारत का लेह लद्दाख और सियाचिन से हाथ धोना।

 

फिर भारतीय सेना ने ऑपरेशन स्टार्ट किया जिसे नाम दिया गया

थल सेना – ऑपरेशन विजय

वायु सेना – ऑपरेशन सफ़ेद सागर।

 

26 जुलाई को विजय के रूप में क्यों मनाते हैं ?

करीब दो महीने तक चली इस युद्ध का समापन 26 जुलाई 1999 को हुआ। इसीलिए प्रति वर्ष 26  विजय दिवस के रूप में मनाते हैं।

कारगिल युद्ध घटना चक्र

2 मई 1999 – ताशी  नामग्याल नामक चरवाहे ने भारतीय सेना को घुसपैठ की जानकारी दी।

5 मई 1999 – एक भारतीय सैनिक टुकड़ी पेट्रोलिंग के लिए गयी जिसमे 5  वीरगति को प्राप्त हुए।

10 मई 1999  – द्रास, काकसर और मुश्कोह  सेक्टर में पाकिस्तानी घुसपैठियों को देखा गया।

26  मई 1999 – भारतीय वायुसेना ने ऑपरेशन सफ़ेद सागर की शुरुआत की।

26 जुलाई 1999 – कारगिल युद्ध समाप्त हुआ और ऑपरेशन विजय  सफल हुआ।

सैनिकों का बलिदान नहीं भूलेगा हिंदुस्तान

कारगिल युद्ध के घटनाक्रम को देखकर लगता है की कारगिल विजय बहुत आसान था पर इसके पीछे की कहानी हमारे सैनिकों के अदम्य साहस, देशभक्ति और ओज से पूर्ण तथा उनके बलिदानों की कहानी है। इस युद्ध में 500  से ज्यादा भारतीय वीर गति को प्राप्त हुए तथा 1500  के करीब घायल हुए।

हमारे वीर सैनिकों का बलिदान व्यर्थ नहीं गया और हमारा देश कारगिल युद्ध जीत गया।  ऑपरेशन विजय को सफल बनाने में हमारे हर एक सैनिक का योगदान था। उन्हें सम्मान भी मिला जो की हमारा कर्त्तव्य था। कुछ असाधारण वीरता दिखाने वाले जवानों को बड़े बड़े सैन्य पुरष्कारों द्वारा सम्मानित किया गया। किसी को मरणोपरांत तो किसी को जीवित अवस्था में।

इनमें से प्रमुख नाम हैं।

1 . लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडेय –           परमवीर चक्र (मरणोपरांत)

2 . कैप्टेन विक्रम बत्रा –              परमवीर चक्र (मरणोपरांत)

कैप्टेन विक्रम बत्रा का एक कोट बहुत प्रचलित हुआ था ” ये दिल माँगे मोर ” जो बाद में पेप्सी का  स्लोगन भी बना।

3 . ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव –              परमवीर चक्र

4 . राइफल मैन संजय कुमार –                    परमवीर चक्र

ऐसे और भी बहुत सैनिक थे जिन्हे महावीर चक्र, वीर चक्र आदि पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।

 

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ऐसे थे महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद

नाम – आज़ाद
बाप का नाम – स्वतंत्र
घर कहाँ है – जेल


ये शब्द थे महान क्रांतिकारी श्री चंद्रशेखर आज़ाद (Chandrashekhar Azad) के जब उन्हें पुलिस ने गिरफ्तार किया गया और जब उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया और मजिस्ट्रेट ने उनसे पूछा।  तब वो महज 15 वर्ष के थे।

By Vishanksingh1 – Own work, CC BY-SA 4.0, http://By Vishanksingh1 – Own work, CC BY-SA 4.0, https://commons.wikimedia.org/w/index.php?curid=41785459

दुश्मन की गोलियों का सामना हम करेंगे, आज़ाद हैं और आज़ाद ही रहेंगे – ये शब्द हैं देश के लिए अपना जीवन न्योछावर कर देने वाले चंद्रशेखर आज़ाद के।
ऐसे बहुत सारी बातें और कार्य हैं जिनसे लोगो के मन में देशभक्ति का जोश भर जाता है। पूरा देश चंद्रशेखर आज़ाद को नमन कर रहा है।

आज महान क्रन्तिकारी श्री चंद्रशेखर आज़ाद (Chandrashekhar Azad) से जुडी बहुत सारी प्रेरणा देने वाली कहानियाँ जानेंगे।
पर उस से पहले थोड़ा उनका जीवन परिचय जान लें। चंद्रशेखर आज़ाद देश के महानतम क्रांतिकारियों में से एक थे जिन्होंने न सिर्फ अपना जीवन देश के लिए न्योछावर किया बल्कि हजारो युवाओं को देश पर बलिदान के लिए प्रेरित किया और आज भी लोग उनके जीवन और कर्मों के बारे में जानकर प्रेरित होते हैं।

पर अफ़सोस आज हमारा देश उन्हें वो सम्मान नहीं दे पा रहा है जो उन्हें देना चाहिए।

चंद्रशेखर आज़ाद का जीवन परिचय

महज 25 वर्ष की आयु में देश के लिए बलिदान होने वाले चंद्रशेखर आज़ाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के भावरा नामक गाँव में इनका जन्म हुआ और जन्म के समय इनका नाम था चंद्रशेखर तिवारी। इनके पिता का नाम सीताराम तिवारी और माँ का नाम जगरानी देवी था। उनकी माँ की इच्छा थी की चंद्रशेखर आज़ाद संस्कृत के विद्वान बने, इसलिए वो चाहती थी की ये कशी जाकर संस्कृत और धार्मिक शिक्षा ले पर ये बात न तो चंद्रशेखर आज़ाद को मंजूर थी और न ही ईश्वर को। चंद्रशेखर आज़ाद के मन में कुछ और ही चल रहा था।  बचपन से ही चंद्रशेखर आज़ाद के मन में भारत में अंग्रेजों का शाशन खटकता था और उनके मन में हमेशा यही प्लानिंग चलती रहती थी की किस तरह से हमारा देश इन अंग्रेजों के चंगुल से आज़ाद होगा।
तभी देश में 13 अप्रैल 1919 में जलियावाला बाग हत्याकांड (Jaliawala Bagh Masacre) हुआ जिसमे करीब 1600 भारतियों को जनरल डायर (General Dayar) के आदेश पर गोलियों से भून दिया गया। अंग्रेजों की इस क्रूरता से पूरा देश उबाल रहा था और इस घटना ने आज़ाद के मन में गहरा ठेस पहुंचाया। इस घटना ने आज़ाद के मन के कोने में पड़ी क्रन्तिकारी विचार को उभारने का काम किया और 1921 में महज 15 वर्ष की आयु में चंद्रशेखर आज़ाद ने महात्मा गाँधी के असहयोग आंदोलन में भाग लिया। इस आंदोलन में कई देशभक्तों के साथ उन्हें भी गिरफ्तार किया गया और जब उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया और मजिस्ट्रेट ने उनसे पूछा
नाम – आज़ाद
बाप का नाम – स्वतंत्र
घर कहाँ है – जेल 
इस जवाब से मजिस्ट्रेट इतना क्षुब्ध हुआ की महज 15 वर्ष के बच्चे को 15 कोड़े मारने की सजा सुना दी। जब आज़ाद को कोड़े पड़ रहे थे तो एक आम बच्चे से उलट उनके मुँह से आह निकलने की जगह हर कोड़े के साथ ” भारत माता की जय ” निकल रहा था। इसी घटना के बाद उनके नाम के साथ आज़ाद शब्द जुड़ गया तथा उन्हें चंद्रशेखर आज़ाद बुलाया जाने लगा।
फिर अचानक १९२२ में महात्मा गाँधी ने असहयोग आंदोलन को वापस ले लिया। महात्मा गाँधी के इस कार्य ने देश में बहुत लोगो को अचंभित तथा निराश किया। उसमे चंद्रशेखर आज़ाद भी थे। अब इन्होने आंदोलनों का राष्ट त्याग कर क्रन्तिकारी रास्ता अपनाने का सोचा। अब इनकी मुलाकात मन्मथ नाथ गुप्ता (Manmath Nath Gupta) से हुई  जिनके माध्यम से चंद्रशेखर आज़ाद की मुलाकात रामप्रसाद बिस्मिल (Ramprasad Bismil) से हुई जो हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (Hindustan Republican Association) HRA के संस्थापक थे। रामप्रसाद बिस्मिल चंद्रशेखर आज़ाद बहुत प्रभावित हुए तथा उन्हें हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का सदस्य बना लिया।
और हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (Hindustan Republican Association) ने पैसे इकठ्ठा करने के लिए एक ट्रैन लूटने की योजना बनाई जिसको 9 अगस्त 1925 को काकोरी स्टेशन पर अंजाम दिया गया। इस घटना को हम काकोरी कांड (Kakori Kand) के नाम से भी जानते हैं। इस लूट कांड में बहुत क्रांतिकारियों ने भाग लिया जिनमे से कई पकडे गए पर चंद्रशेखर आज़ाद पुलिस की गिरफ्त से दूर रहे और वो अंग्रेजी शाशन के लिए सर दर्द बने रहे। फिर 1928 में आज़ाद ने भगत सिंह के साथ मिलकर हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (Hindustan Republican Association) को हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (Hindustan Socialist Republican Association) बना दिया। 1928 में जब लाला लाजपत राय की पुलिस की लाठियों से मृत्यु हो गयी तो क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों से इसका बदला लेने का प्राण किया और ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन सांडर्स की हत्या कर दी। इस घटना के बाद अंग्रेजी सरकार ने बहुत क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया पर आज़ाद अब भी पकड़ से बहार थे।  अब आज़ाद ने प्राण कर लिया था की न तो अंग्रेजो की पकड़ में आना है और न ही पुलिस की गोली से मरना है। 1931 में जब भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव जेल में थे और चंद्रशेखर आज़ाद अलाहाबाद में उनकी पैरवी क लिए थे। 27 फरवरी 1931 को जब चंद्रशेखर आज़ाद इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क (Alfred Park) में एक पेड़ के निचे बैठे थे तभी पुलिस को उनके वह होने की सुचना मिल गयी। उनकी सुचना पुलिस के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी। क्यूंकि जिनको पकड़ने के लिए पूरा अंग्रेजी शाशन लगा था और वो उनकी पकड़ से बहार था ऐसे में एक सुचना उनके लिए बहुत मायने रखती थी। उसके बाद पुलिस ने उस पार्क को चारो तरफ से घेर लिया।  
आज़ाद के पास हथियार के नाम पर महज एक पिस्तौल था जिस से उन्होंने पुलिस का डट कर मुकाबला किया और जब उनके पास सिर्फ एक गोली बच गयी तो उन्होंने उस गोली से खुद को मारकर अपना अंग्रेजो की पकड़ में नहीं आने का और पुलिस की गोली से न मरने का प्राण पूरा किया।
पर मरने के पहले चंद्रशेखर आज़ाद ने कई पुलिस वालो को मारा। उनकी इतनी दहशत थी की उनके मरने के घंटों बाद भी किसी पुलिसवाले और गोरे अंग्रेज की हिम्मत नहीं हुई की उनके शव के पास जा सके। घंटों बाद उनके शव को हिला डुला कर उनकी मृत्यु सुनिश्चित करने के बाद ही उनके शव को हटाया गया। ये था महान क्रन्तिकारी चंद्रशेखर आज़ाद का संक्षिप्त जीवन परिचय। उनके जीवन से प्रेरणा लेने के लिए हमारे पास बहुत ही कहानियां हैं जिनमे से कुछ के बारे में आज बात करते हैं। 

आज़ाद के पिस्तौल की कहानी Story of Azad’s Pistol

By INDIATECK1435 – Own work, CC BY-SA 4.0, Link http://By INDIATECK1435 – Own work, CC BY-SA 4.0, https://commons.wikimedia.org/w/index.php?curid=76779101

Colt कम्पनी की इस पिस्टल को तो बहुत लोग पहचानते होंगे लेकिन बहुत सारे लोग 0. 32 बोर की कोल्ट पिस्टल के भारत आने की कहानी नहीं जानते होंगे।
1970 के आसपास कुछ लोगों ने उसे तलाशना शुरू किया। इलाहाबाद के सरकारी मालखाने से पता चला कि वह पिस्तौल उस अधिकारी जिसने चंद्रशेखर आज़ाद को उस पार्क में घेरा था यानि नॉट बाबर को इंग्लैंड जाते समय भेंट में दे दी गई थी। तब नॉट बाबर से पत्राचार कर पिस्तौल की मांग की गई। इलाहाबाद के आयुक्त मुस्तफी ने नॉट बाबर को खत लिखा था। नॉट बाबर ने कोई उत्तर नहीं दिया। इसके बाद भारतीय उच्चायोग से हस्तक्षेप करने का आग्रह किया गया। इंग्लैंड में तैनात भारत के उच्चायुक्त ने नॉट बाबर से पिस्तौल लौटाने का आग्रह किया। कुछ ना-नुकुर के बाद नॉट बाबर पिस्तौल लौटाने को राजी हो गया, लेकिन उसने एक शर्त रखी। कहा कि उसके पास भारत सरकार अनुरोध पत्र भेजे, जिसमें आजाद के शहादत स्थल पर आज़ाद की मूर्ति लगाकर उसकी फ़ोटो भेजे तभी वो आज़ाद की पिस्तौल वापस करेगा। ऐसा किया गया तब जाकर उस अधिकारी ने वो पिस्तौल इंडिया को वापस की। मतलब वो अंग्रेज अधिकारी जानता था कि हम भारतीय अपने देश के असली हीरोज़ के लिए कितने सीरीयस हैं…

आज़ाद और उनका फोटो Azad and his Photograph


आज हम चंद्रशेखर आज़ाद का एक रोबदार फोटो जिसमे उनकी हाथों में पिस्तौल है और वो अपने मूछों पर बड़ी शान से ताव दे रहे हैं, देखते हैं। उस फोटो के पीछे भी एक कहानी है। क्या वो कहानी आप जानते हैं? वो फोटो कब और किसके द्वारा लिया गया था और उसके बाद आज़ाद की क्या प्रतिक्रिया थी?

आज़ाद उस फोटो को नष्ट करना चाहते थे। जी हाँ। आपने बिलकुल सही सुना।


आज़ाद एक क्रन्तिकारी थे और उनकी कोई भी पहचान पुलिस के पास नहीं थी और वो नहीं चाहते थे की उनकी फोटो अंग्रेजी शाशन के हाथ लगे। वो अपनी पहचान हमेशा छुपा के रखना चाहते थे।
अब आपके मन में एक सवाल आ रहा होगा की फिर उनकी तस्वीर ली किसने और वो अपनी तस्वीर खिचाने के लिए राजी कैसे हुए?


दोस्तों इसके पीछे की कहानी बहुत दिलचस्प है। 


काकोरी कांड के बाद जब आज़ाद और बाकि क्रांतिकारी भूमिगत हो गए थे तब आज़ाद अपने मित्र रूद्र नारायण (Rudra Narayan) के घर झाँसी में रह रहे थे। वहाँ रूद्र नारायण ने चंद्रशेखर आज़ाद को ये तस्वीर खिंचवाने के लिए राजी किया था। पहले तो आज़ाद बिलकुल राजी नहीं थे क्यूंकि वो नहीं चाहते थे कि किसी भी तरह से उनकी तस्वीर पुलिस के पास पहुंचे। उनका मानना था कि न तो उनकी तस्वीर रहेगी और न ही पुलिस के पास पहुंचने का खतरा रहेगा। अंततः वो अपने मित्र की बात मन कर तस्वीर खिंचवाने के लिए राजी हो गए। पर तस्वीर खिंच जाने के बाद उनको लगा की उनसे गलती हो गयी है, उन्हें अपनी तस्वीर नहीं खिंचवानी चाहिए थी। वो उस तस्वीर को नष्ट करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने अपने मित्र और क्रांतिकारी विश्वनाथ वैशम्पायन (Vishwanath Vaishampayan) को रूद्र नारायण के पास तस्वीर नष्ट करवाने के लिए भेजा। रूद्र नारायण ने कहा की उन्हें आज़ाद के अंदेशा और मामले की गंभीरता की समझ है। ये तस्वीर उन्होंने इस लिए लिया है की जब आगे की पीढ़ी आज़ाद के बारे में पढ़े, उनके गौरव गाथा के बारे में जाने तो उनके पास कुछ ऐसा रहे जिस से वो आज़ाद की अपने आप से जुड़ा महसूस कर सके। विश्वनाथ वैशम्पायन से रूद्र नारायण ने कहा की आप आज़ाद को बोल दें की तस्वीरें और नेगेटिव दीवार में चुनवा दी गयी हैं। इस तरह से आज हमारे पास आज़ाद की तस्वीर सुरक्षित बची है। 

Quotes of Shree Chandrashekhar Azad

  1. दूसरों को खुद से बेहतर करता हुआ न देखो, हर रोज अपना रिकॉर्ड तोड़ो क्यूंकि तुम्हारी लड़ाई बस तुम्हारे साथ है।
  2. मैं एक ऐसे धर्म में विश्वास करता हूँ जो स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा का प्रसार करती है।
  3. अगर आपके खून में उबाल नहीं है तो आपकी नसों में खून नहीं पानी दौड़ रहा है।
  4. एक जहाज जमीन पर सदैव सुरक्षित रहता है, पर ये जमीन पर रहने के लिए नहीं बना है। जीवन में ऊंचाइयों को प्राप्त करने के लिए हमेशा सार्थक जोखिम लेना चाहिए।
  5. ऐसी जवानी किसी काम की नहीं जो अपने मातृभूमि के काम न आ सके।

दोस्तों ये थी हमारे महान क्रन्तिकारी श्री चंद्रशेखर आज़ाद की प्रेरणादायी कहानी।

अगर आप भी इसमें अपना अनुभव जोड़ना चाहते हैं या कुछ और भी लिखने का शौक रखते हैं तो Mail Us at ” [email protected] “साथ में अपना परिचय एक फोटो के साथ भी भेजें। आपकी रचना आपके नाम और फोटो के साथ प्रकाशित की जाएगी।

किताबें पढ़ने के 6 चमत्कारिक फायदे

एक बार दुनिया के सबसे धनि व्यक्ति Bill Gates (Founder of Microsoft)  से पूछा गया की अगर आपको कोई एक सुपर पावर मिले तो आप क्या लेना चाहेंगे ? बिल गेट्स का जवाब था की Power to read Super Fast “मतलब किताबे बहुत जल्दी पढ़ने की शक्ति ताकि ज्यादा से ज्यादा किताबें पढ़ सके।

दुनिया में जितने भी सफल लोग हैं उन सबमे एक बात कॉमन है।  वो है पढ़ने की आदत। चाहे वो Bill Gates हो, Warren Buffett हो, Elon Musk हो, Facebook Founder Mark Zukerberg हो, स्वामी विवेकानंद या महात्मा गाँधी, सभी के जीवन में अध्ययन का बहुत बड़ा महत्व रहा है।

जैसा की हमारे देश में एक कहावत है की पढाई बेकार नहीं जाती। बिलकुल दोस्तों पढाई बेकार नहीं जाती। चाहे आप अपने  कोर्स मटेरियल को पढ़ा रहे हैं या व्यक्तित्व के विकास की पुस्तके।  
आप आप सोच रहे होंगे की बिल गेट्स को किताबें पढ़ने की क्या आवश्यकता है ? उनके पास तो अथाह पैसे हैं, वो चाहें तो दुनिया की किसी भी लक्ज़री का एन्जॉय कर सकते हैं। पर आप ये नहीं समझ पा रहे हो की बिल गेट्स के पास ये जो अथाह धन है इसमें उनकी पढ़ने की आदत का सबसे बड़ा योगदान है। उन्हें इन्ही किताबों से शक्ति मिलती है, ज्ञान मिलता है की वो सफलता की दिशा में कदम बढ़ाते रहें।
 

किताबें पढ़ने के बहुत अधिकफायदे हैं पर उनमे से 6 जबरदस्त फायदें जिनको मैनें भी महसूस किया है वो आपके सामने हैं क्यूंकि मैं सिर्फ अपने अनुभवों की साझा करना चाहता हूँ। अगर आप भी अपने अनुभव साझा करना चाहें तो स्वागत है। ब्लॉग पर कमेंट कर सकते हैं। और आपकी रचना प्रकाशित भी हो सकती है।

1.  दूसरों की गलतियों और अनुभवों से सीखना 2.  सकारात्मक ऊर्जा का संचार 3.  अच्छे लोगों का साथ 4.  मानसिक शांति और तनाव मुक्ति 5.  एकाग्रता की वृद्धि 6.  सोचने समझने की क्षमता का विकास

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दूसरों की गलतियों और अनुभवों से सीखना (Learn from other’s Mistakes and Experiences)

एक कहावत है की इंसान अपनी गलतियों से सीखता है पर क्या आपको नहीं लगता की अगर हर कोई सिर्फ अपनी हीं गलतियों और अनुभवों से सीखे तो उसकी पूरी उम्र निकल जाएगी और वो सफल नहीं हो पायेगा?

तो क्या किया जाये?

इसका सीधा उत्तर है की इंसान दूसरों की गलतियों और अनुभवों से भी सीखे? पर क्या ये भी कठिन नहीं है? आखिर इंसान किसकी गलतियों और अनुभवों से सीखे? जो सफल लोग हैं? तो उसको वो सफल लोग मिलेंगे कहाँ? हमारे संपर्क में कितने सफल लोग हैं जिनकी गलतियों से और अनुभवों से हम सीख सकते हैं?
नहीं हैं?

कोई बात नहीं। हमारे पास उनकी गलतियों और अनुभवों का निचोड़ है। उनकी लिखी किताबें जिसमे उनलोगो ने अपने जीवन की हर गलती, अच्छा अनुभव, बुरा अनुभव, सफलता, असफलता, उनलोगों ने जिन चीजों को सीखने के लिए बड़ी कीमत चुकाई हैं वो सारी बातें अपने द्वारा लिखी बुक्स में रख दी हैं।  

अगर अपने Robert T Kiyosaki द्वारा लिखी Book Rich Dad Poor Dad पढ़ा हो तो उसमे लेखक ने जो भी बातें हमें सिखाया है उसे खुद से सिखने में सालों लग जायेंगे और फिर भी जरुरी नहीं है की हम सीख ही जाएँ। 

अगर अपने Dale Carnegie की लिखी किताब “How to win friends and Influence people “पढ़ी हो तो आपको पता होगा की जो बातें आप उस किताब से दो दिनों में सीख सकते हैं वो कई लोग पूरी ज़िन्दगी नहीं सीख पाते। लोगो को दोस्त कैसे बनाना है और उन्हें प्रभावित कैसे करना है ये बातें उनके लिए बहुत सरल है जिनको इसका तकनीक पता है। पर क्या वो तकनीक सीखना आसान है? शायद नहीं जब तक कि आप उनलोगो के अनुभवों से नहीं सीखते जो इस कला में महारत हासिल किये हों। इसलिए किताबें पढ़ना शुरू करें।

अभी Rich Dad Poor Dad और How to win friends and influence People अमेज़ॉन से मंगा कर पढ़ें

 

बिल गेट्स (Bill Gates) के बुक पढ़ने के तीन तरीके

1. नोट्स बनाना (Notes Making)

2. बुक पूरी पढ़ें, अधूरा न छोड़ें (Read Book Completely)

3. रोज कम से कम एक घंटे पढ़ें। (Read at least one hour a day)

Some Quotes about Reading

  • A Reader lives thousand lives before he dies, The man who doesn’t read lives only one. George R R Martin
  • एक पाठक मृत्यु से पहले हजारों जिन्दगियाँ जीता है, पर बुक नहीं पढ़ने वाला केवल एक जिंदगी जीता है। George R R Martin (जॉर्ज आर आर मार्टिन)
  • A room without book is a body without soul. Marcus Tullius Ciero
  • बिना किताब का घर बिना आत्मा के शरीर के बराबर है।
  • Marcus Tullius Ciero (मार्कस टूलियस शियेरो)

सकारात्मक ऊर्जा का संचार (Flow of Positive Energy)

किताबें पढ़ने की आदत बना लेने से आपकी आतंरिक शक्ति मजबूत होती हैं। आपके आत्मविश्वाश में वृद्धि होती है। आपके मन से नकारात्मक विचार बहार निकलते हैं और सकारात्मक विचार भरता है। हमारा मष्तिष्क एक ऐसी जगह है जो खाली नहीं रह सकता। इसमें कुछ न कुछ भरना चाहिए। अब ये उस मस्तिष्क के मालिक पर यानि की आप पर निर्भर करता है की वो उसमे क्या भरना चाहता है ? कमजोरी या ताकत, नकारात्मक विचार या सकारात्मक विचार, मैं कर सकता हूँ का विचार या ये मुझसे नहीं होगा का विचार? अगर आप अच्छे लोगों के साथ रहें, अच्छे काम करें, अच्छी किताबें पढ़े तो मस्तिष्क में सकारत्मक ऊर्जा का संचार होगा और सकारत्मक शक्ति से भर जायेगा, फिर कोई भी कठिन से कठिन कार्य आपको कठिन नहीं लगेगा पर अगर आप बुरे लोगो की सांगत में रहते हैं, बुरे कार्य करते हैं, किताबें नहीं पढ़ते हैं तो आपके मस्तिष्क में नकारात्मक ऊर्जा भरी रहेगी जो आपके जीवन में नकारात्मक प्रभाव डालेंगी। 

अच्छे लोगों का साथ

हर कोई अपने साथ अच्छे लोगो को रखना चाहता है जो सकारात्मक सोच रखता हो, जिसको अपनी शक्ति पर विश्वास हो। जाहिर है आप भी सफल लोगों के बीच में रहना चाहते होंगे। क्या  कोई भी सफल इंसान आपको अपने साथ रखेगा जब तक की आप उसके या किसी के जीवन में वैल्यू ऐड करने की क्षमता नहीं रखते हो? आपको सफल होना है तो सफल लोगों की आदतें होनी चाहिए आपके अंदर। और अगर सफल लोगो की आदतें आप रखते हैं जैसे रोज किताबें पढ़ना तो आपको सफल लोगो का साथ मिलेगा और आप अपने जीवन में सफलता की नीत नई उचाईयों को छुएंगे। 

मानसिक शांति और तनाव मुक्त जीवन (Mental Piece and Stress Free life)

आप सोचो आपको क्या अच्छा लगता है? महापुरुषों की जीवनियां पढ़ना, मनोरंजन या कोई ऐसी बुक जिसको देख कर लगता है की आपको कुछ सीखने को मिलेगा? जो भी आपको पसंद हो आप पढ़ना शुरू करें। पढ़ते समय आप अपनी सारी थकान, तनाव भूल जायेंगे, एक अलग तरह की मानसिक शांति मिलेगी आपको। एक ऐसी शांति जो आपको कहीं नहीं मिलेगी। तो मानसिक शांति और तनाव मुक्ति के लिए पढ़ना शुरू करें।

एकाग्रता की वृद्धि (Focus and Concentration)

आप सोचो जब ऑफिस में काम करते हो तो एक साथ कितने काम करने पड़ते हैं? कंप्यूटर पर काम करना, फाइल्स संभालना, साथ में इमेल्स भी चेक कर लिया, थोड़ी चैटिंग भी कर ली और भी बहुत सारे काम। आपने कभी ध्यान दिया हो या नहीं इस से बहुत ज्यादा चिढ और तनाव महसूस होता है और एकाग्रता की शक्ति का ह्रास होता है। पर जब आप हाथ में किताब लेकर पढ़ने बैठते हैं तो आप किसी और कार्य के बारे में नहीं सोचते हैं। पूरी तरह से एकाग्र होकर उस किताब को पढ़ते हैं जो की आपकी आदत में शुमार होता है। इस से आपकी एकाग्रता की शक्ति बढ़ती है।

सोचने समझने की क्षमता का विकास

भगवान ने इंसानों को सोचने समझने की शक्ति दी है जो की हमें भगवान के द्वारा बनाये गए हर जीव से अलग करता है। पर हर इंसान सोचने समझने की शक्ति असीमित होती है पर हमारा दिमाग उस स्तर तक सोच नहीं पाता जितनी उसकी क्षमता है। कहते हैं की एक इंसान अपने दिमाग की क्षमता का सिर्फ 2 से 3 प्रतिशत का ही उपयोग कर पाता है बाकि क्षमता बेकार चली जाती है। ऐसा क्यों होता है ? क्योंकि हमारे दिमाग में नकारात्मक विचार भरे होते हैं। क्षमता को पहचान ही नहीं पाते। आपके स्वस्थ शरीर के लिए अच्छी खुराक की जिस तरह से आवश्यकता होती है उसी तरह आपके स्वस्थ मस्तिष्क के लिए भी अच्छी खुराक की आवश्यकता है। और उन खुराकों में से एक है अच्छी अच्छी किताबें पढ़ना।किताबें पढ़ने की आदत हमें हमारे क्षमता से परिचय कराती हैं और हमारे सोचने समझने की शक्ति बढ़ जाती है।

 

अगर आपको भी किताबें पढ़ने की आदत है और आप इसमें अपना अनुभव जोड़ना चाहते हैं या कुछ और भी लिखने का शौक रखते हैं तो Mail Us at ” [email protected] “साथ में अपना परिचय एक फोटो के साथ भी भेजें। आपकी रचना आपके नाम और फोटो के साथ प्रकाशित की जाएगी।

 

भाई बहन का प्यार राखी का त्यौहार

हम सभी रक्षा बंधन की तैयारी में लगे  हुए हैं। इस साल रक्षा बंधन 3 अगस्त को मनाया जायेगा। इस दिन बहन और भाई का उत्साह देखते बनता है। बहनें भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर भाइयों से अपनी रक्षा वचन लेती हैं। पर क्या आपको रक्षा बंधन पर्व के महत्व, शुरुआत आदि के बारे में पता है ? इसका महत्व क्या है? ये कब मनाया जाता है ? यह पर्व क्यों मनाया जाता है? इसके पीछे की कहानी क्या है ? इसकी शुरुआत कैसे और कब हुई थी? आज हम इसी बात का जिक्र करते हैं।

Rakhi Thali http://Photo by Deepali Phadke from Pexels

रक्षा बंधन कब मनाया जाता है?

रक्षा बंधन सावन के समापन के साथ पूर्णिमा के दिन मनाया जाता जाता है।
वर्ष 2020 के रक्षा बंधन का मुहूर्त
इस वर्ष सावन का समापन 3 अगस्त को हो रहा है यानि सावन की पूर्णिमा  अगस्त को है जिस दिन प्रति वर्ष रक्षा बंधन का पावन पर्व मनाया जाता है।
रक्षा बंधन – 3 अगस्त 2020.
राखी बांधने का मुहूर्त : 09:27:30 से 21:11:21 तक
अवधि : 11 घंटे 43 मिनट
रक्षा बंधन अपराह्न मुहूर्त : 13:45:16 से 16:23:16 तक
रक्षा बंधन प्रदोष मुहूर्त : 19:01:15 से 21:11:21 तक 

रक्षा बंधन के पीछे की कहानियाँ

हमारे हर पर्व त्यौहार के पीछे कोई न कोई कहानियाँ होती हैं। आखिर इस तरह महान  पर्व को मनाने की वजह क्या है ? इसकी शुरुआत कब हुई थी ? ये सारे सवाल आपके मन में भी तो आते होंगे ? भाई बहन के प्यार और पवित्र रिश्तों को सँभालते इस महान पर्व की शुरुआत करीब 6000 वर्ष पूर्व हुई थी।
रक्षा बंधन मनाने के पीछे कई कहानियाँ प्रचलित हैं।  इनमे से कुछ मुख्य इस तरह से हैं।

द्रौपदी और भगवान कृष्णा की कहानी

इस बारे में भी दो कहानियाँ प्रचलित हैं। एक जब भगवान श्री कृष्णा ने शिशुपाल के वध करने के लिए सुदर्शन चक्र  छोड़ा था तब  भगवान श्री कृष्णा की ऊँगली कट गई थी और उसमें से खून निकलने था। चूकिं द्रौपदी भगवान श्री कृष्णा को दिल से भाई की तरह प्यार करती थी तो उनसे ये देखा नहीं गया। तुरंत उन्होनें अपने साड़ी का पल्लू में से कपडे को काटकर भगवान की कटी ऊँगली बांध दी जिससे खून बहना बंद हो गया। कहा जाता है तभी भगवान श्री कृष्णा नें द्रौपदी के रक्षा का प्रण लिया। और जब द्रौपदी  चीरहरण हो रहा था भगवान श्री कृष्णा नें उनकी रक्षा की। दुशाशन द्रौपदी का साड़ी खींचता गया और भगवान साड़ी बढ़ाते गए। 
द्रौपदी  से जुडी रक्षा बंधन  कहानी है जिसमे एक भगवन श्री कृष्णा की ऊँगली कट जाती है तो सत्यभामा और रुक्मिणी जैसी रानियाँ  हैं कपड़ा लेने के लिए दौड़ पड़ी ताकि ऊँगली को बांध कर रक्त के बहाव  रोका जा सके। पर द्रौपदी ने  अपनी साड़ी में से कपड़ा फाड़ कर भगवान की बाँधी जिससे प्रसन्न होकर और जिसका ऋणी होकर भगवान ने चीरहरण से द्रौपदी को बचाकर ऋण  उऋण हुए। 

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महभारत के युद्ध में महाराज युद्धिष्ठिर द्वारा सैनिकों को रक्षा सूत्र बांधना 

महाभारत का युद्ध शुरू होने  था। महाराज युधिष्ठिर चिंता और निराशा में डूबे हुए थे।  भगवान श्री कृष्णा नें चिंता का कारण पूछा तो युधिष्ठिर ने बताया की युद्ध में हार जीत को लेकर आशंकित हैं। एक तरफ कौरवों की विराट सेना और बड़े बड़े योद्धा  जैसे पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य, कर्ण इत्यादि सेनापति  तरफ हमारी छोटी सी सेना। इस पर  भगवान श्री कृष्णा ने एक एक सैनिक की हाथों में रक्षा सूत्र बांधने का सुझाव दिया तथा धर्मराज युधिष्ठिर ने वो रक्षा सूत्र सैनिकों की कलाइयों में बांधा। फिर महाभारत के युद्ध में क्या हुआ, किसकी जीत और किसकी हार हुई ये छुपा नहीं है। 

राजा बलि और देवी लक्ष्मी

जब राजा बलि (भक्त प्रह्लाद के पोते)  शक्तियाँ  बहुत अधिक बढ़ गयी और देवों को युद्ध में पराजित होना पड़ा तो देवराज इंद्रा को चिंता हुई। (आपको पता होना चाहिए की देवराज इंद्रा का पद स्थायी नहीं है। कोई भी अपने सद्कर्मों से देवराज का पद प्राप्त कर सकता है ) देवराज भगवान विष्णु की शरण में गए। भगवन विष्णु वामन अवतार लेकर राजा बलि के दरबार में गए  और बलि से दान में तीन पग जमीन माँगा। राजा बलि बहुत बड़े दानवीर थे और फिर सोचे कि एक वामन तीन पग में कितनी जमीन ले सकता है ? बोले महाराज ये क्या मांग दिया आपने? कुछ बड़ी चीज मांगो। धन दौलत, सोना चाँदी, आभूषण, वस्त्र इत्यादि, पर भगवान ने बस तीन पग जमीन ही माँगा। बलि की स्वीकारोक्ति के बाद भगवान विष्णु अपने असली रूप में आ गए और एक पग में आसमान और दूसरे पग में पृथ्वी को माप दिया।  जब तीसरे पग की बारी आयी तो कुछ बचा ही नहीं था। पर राजा बलि इतने बड़े दानवीर थे की उन्होंने तीसरा पग अपने सर पर  लिया जिससे की उन्हें पृथ्वी छोड़कर पाताल लोक में जाना पड़ गया। अब भगवान विष्णु इतने बड़े दानवीर और भक्त को अकेला कैसे छोड़ सकते थे? उन्होनें उनकी रक्षा करने  निश्चय किया जब तक की राजा बलि को इंद्रा की गद्दी न मिल जाये। भगवान विष्णु उनके द्वारपाल बनकर रहने लगे। इस बात से वैकुण्ठ लोक में बैठे देवी लक्ष्मी चिंतित हो गयी। उन्होनें अपने पति को पाने के लिए एक ब्राह्मण स्त्री रूप  धरा और राजा बलि के पास पहुँच गयी और कहा की उनके पति एक लम्बी यात्रा पर गए हैं  और रहने के लिए एक स्थान की माँग की। राजा बलि नें उन्हें सच्चे मन से अपने घर में रखा तथा अपने बहन की तरह सुरक्षा प्रदान की। देवी लक्ष्मी के आने के बाद राजा बलि के घर में रौनक आ गई तथा घर धन दौलत और खुशियों से भर गया। फिर एक दिन सावन की पुर्णिमा के दिन राजा बलि को एक रक्षा सुत्र बांधा तथा अपनी खुशी और रक्षा का वचन लिया। इस बात से प्रसन्न होकर राजा बलि नें कोई भी मांग पुरी करने का वचन दिया। देवी लक्ष्मी नें द्वारपाल के रूप में खड़े भगवान विष्णु को मांगा। राजा बलि को बहुत आश्चर्य हुआ तभी देवी लक्ष्मी और भगवान विष्णु अपने असली रूप में आए। राजा बलि अपने दानवीर होने के लिए जाने जाते हैं इसलिए उन्होंने भगवान विष्णु को देवी लक्ष्मी को सौंप दिया। तभी से ये भाई बहन के प्रेम का पर्व मनाया जाता है।

अपने भाई को डिज़ाइनर राखी भेजेँ

इसीलिए रक्षा सूत्र बांधते वक्त इस मंत्र का जाप किया जाता है

” ॐ येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:। तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।

अर्थात जिस रक्षासूत्र से महान शक्तिशाली राजा बलि को बांधा गया था, उसी सूत्र से मैं तुम्हें बांधता हूं। 

रक्षाबंधन का ऐतिहासिक महत्व

महान नोबेल पुरस्कार विजेता गुरुदेव रविन्द्र नाथ टैगोर नें सन 1905 में बंगाल विभाजन के समय रक्षाबंधन पर्व को जनांदोलन बना दिया था। उन्होंने हिन्दू मुस्लिम एकता के लिए और बंगाल विभाजन के विरोध में हिन्दु औरतों से मुस्लिम पुरुषों को तथा मुस्लिम स्त्रियों से हिन्दू पुरुषों को राखी बंधवाया।  

Gift for your Brothers or Sisters

इस रक्षा बंधन बहनों से निवेदन है की वो इस बार भाई को राखी बांधते समय सिर्फ अपने रक्षा का वचन न लें, बल्कि भाई से पूरी स्त्री जाति के सम्मान करने का वचन लें।

 

अगर आपको रक्षा बंधन या किसी और पर्व त्यौहार के बारे में विशेष जानकारी है जो आप हमसे शेयर करना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। वो कहानी आपके नाम और फोटो के साथ प्रकाशित की जाएगी। साथ ही अपना परिचय और एक फोटो भेजे। Mail Us at ” [email protected]

 

 

सुबह जल्दी जागने के चमत्कारिक लाभ

क्या आपको भी सुबह की नींद बहुत प्यारी लगती है ?
अगर हाँ तो ये आपके सुखद भविष्य के लिए अच्छा नहीं है। आपको अंदाजा भी नहीं है की सुबह में थोड़ी देर और सोने के लिए आप अपने सुखद भविष्य को दांव पर लगा रहे हैं। आप अपने अस पास नजर दौड़ाइए। देखिये की कोई भी सफल व्यक्ति सुबह में देर तक सोता है या जल्दी जगता है ? मेरा दावा है की आपको एक भी सफल व्यक्ति ऐसा नहीं मिलेगा जो सुबह में देर तक सोता हो।
हमारे शाश्त्रो में भी कहा गया है की मनुष्य को ब्रह्ममुहूर्त में सोकर उठना चाहिए। उस समय प्रकृति अपने सबसे खूबसूरत रूप में होती है। हवाएं ताजी होती हैं , मनुष्य का मष्तिष्क अपनी क्षमता का ज्यादा से ज्यादा उपयोग कर सकता है , प्रकृति शांत होती है और हमारा दिमाग भी शांत होता है, हम तनाव मुक्त महसूस करते हैं। सुबह के समय हम बहुत से ऐसे काम कर सकते हैं जो पुरे दिन नहीं कर सकते।
हमारे और पूरी दुनिया के बड़े बड़े महापुरुष, बड़े आमिर लोग, सफल लोग सुबह में जल्दी जग जाते हैं। स्वामी विवेकानंद , महात्मा गाँधी , आदि महापुरुष सुबह में जल्दी जग जाते थे। 

सूर्योदय का मनोरम दृश्य
सूर्योदय का मनोरम दृश्य

स्वयं के लिए और अपने परिवार को समय देना।

आज के ज़माने में लोग अपनी जिंदगी में इस कदर व्यस्त हैं कि खुद को समय नहीं दे पाते। ऑफिस से देर से घर आये, घर आकर भी ऑफिस के काम में ही लगे रहना, फिर भोजन करके सो जाना और सुबह देर तक सोते रहना, जागने के बाद जल्दी जल्दी ऑफिस के लिए तैयार होना फिर ऑफिस का काम। ये हमारी दिनचर्या बन गयी है। न तो हमारे पास खुद के लिए समय है और न ही अपने परिवार के लिए। ऐसी जिंदगी का क्या फायदा? ऐसी कमाई का क्या फायदा?
सुबह जब आप जल्दी उठते हैं तो अपने लिए और अपने परिवार के लिए आपके पास समय होता है। परिवार के लोगो की भावनाओं में आप शरीक होते हैं। परिवार में प्रेम और सद्भावना बढ़ता है। आप परिवार के लोगों से और परिवार के लोग आपसे प्यार करने लगते हैं। इस से आपके जिंदगी में प्रसन्नता आती है जिस से आपके प्रोफेशन में , व्यवसाय में प्रगति होती है।

अपने सपनों और शौक को समय दे पाना।

क्या आपको पता है की आपके सपने क्या हैं ? क्या आप अभी वहीँ कर रहे हैं जो बचपन से करना चाहते थे ? अगर इसका उत्तर नहीं है तो सुबह जल्दी उठकर आप कुछ समय अपने सपनो के लिए निकाल सकते हैं। सोचिये कि वो कौन सा काम है जो बचपन से लेकर आज तक आपको प्रसन्नता देता है, संतुष्टि देता है, आपके वजूद को जस्टिफाई करता है ? क्या आपको किताबें पढ़ने का शौक है ? क्या आपको चित्रकारी का शौक है ? क्या आपको संगीत का शौक है ? क्या आपको लोगों से बातें करने का शौक है ? ये सरे शौक आपने कब से पूरा नहीं किया है ? क्या आपको समय नहीं मिल पाता? तो देर किस बात की? सुबह थोड़ी जल्दी जागने की शुरुआत करो और कुछ समय अपने शौक और सपनो को दो।

Positive thought comes in your mind in morning

आप अपने स्वास्थ्य को समय दे सकते हैं।

अगर आपको सुबह जल्दी जागने की आदत है तो ये आपके स्वास्थ्य के लिए बहुत हीं फायदेमंद है।
वो चाहे शारीरिक स्वास्थ्य हो या मानसिक स्वास्थ्य।
सुबह जल्दी जागकर आपके पास समय होगा व्यायाम करने का , योग करने का , ध्यान करने का जिस से आपके शारीरक और मानसिक स्वास्थ्य अच्छा होगा। सुबह जल्दी जागने से आपके शरीर की ऊर्जा बढ़ी रहेगी और पुरे दिन आप तरोताजा महसूस करेंगे। सुबह जल्दी उठने का फायदा ये है कि इस से आपका हर कार्य समयानुसार होने लगता है। सही समय पर नाश्ते भोजन से लेकर सोने तक का। इस से आपके शरीर को प्राकृतिक रूप से मजबूती मिलती है।

” Early to bed and early to rise, makes a man healthy, wealthy and wise.”

आप किसी भी क्षेत्र में विशेषज्ञ बन सकते हैं।

अब आप कहेंगे की ये कैसे हो सकता है ? तो ये बिलकुल हो सकता है। कहा जाता है की अगर किसी भी क्षेत्र का विशेषज्ञ बनना है तो रोज करीब 1 या 2 घंटे उसका अभ्यास होना चाहिए वो भी पुरे दिल से, समर्पण भाव से , पूरी तरह से उसको समय देकर। तो क्या आप जिस भी क्षेत्र में विशेषज्ञ बनना चाहते हैं उसके लिए समर्पित समय अपने व्यस्त दिनचर्या में से निकल सकते हैं ? कई लोग आपको ऐसे मिल जायेंगे जिनकी हमेशा ये शिकायत होती है की यार मैं संगीत में बचपन से अच्छा हूँ, पर अब भागदौड़ भरी जिंदगी में समय नहीं मिल पाता और उनके सपने कही किसी कोने में दबे रह जाते हैं। अगर आप सुबह में जल्दी जागने की आदत बना ले तो आप , उस चीज को समर्पित समय दे सकते हैं जो भी आप करना चाहते हैं और धीरे धीरे आप उसमे विशेषज्ञ बन सकते हैं।

किताबें पढ़ने के लिए समय निकालना

कहते हैं किताबें पढ़ना हर किसी की आदत में शुमार होनी चाहिए। पर क्या सुबह में देर तक सोने वाला इसके लिए समय निकाल पता है ? नहीं ? आप सुबह जल्दी उठकर अपने लिए सबसे अच्छी किताबें चुनकर रोज थोड़ी देर पढ़ सकते हैं जो आपके जीवन में एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार करेंगी , आपके मन मष्तिष्क को विकसित करेंगी।

कुछ अच्छे बुक्स का लिंक नीचे दे रहा हूँ एक बार पढ़ कर देखें।

तो आज से सुबह जल्दी उठना शुरू करें और चमत्कारिक लाभ लें।

प्रधानमंत्री जी , लॉकडाउन में मर रहे मजदूरों पर देश जवाब मांग रहा है

प्रधानमंत्री जी जब आपने राष्ट्र के नाम संदेश में लाॅकडाउन की घोषणा की थी तो क्या आपको नहीं पता था कि पुरे देश में लोग इधर-उधर फंसे हुए हैं? वो कैसे रहेंगे, कैसे जिएंगे लाॅकडाउन में? देश के विभिन्न स्थानों में फंसे ए लोगों में हर तरह के लोग हैं।

कुछ अमीर हैं जिन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि वो कहाँ हैं। वो जहाँ हैं आराम से हैं।

कुछ मध्यम वर्ग के लोग हैं जिनके पास इतना पैसा है कि कुछ महीनों तक बिना कमाए खा सकते हैं और रह सकते हैं। पर ये उनका बिना कमाए रहना उनके जीवन पर नकारात्मक प्रभाव डालेगा।

और कुछ ऐसे हैं जो गरीब की श्रेणी में आते हैं। किसी फैक्ट्री में मजबूती से मजदूरी करते हैं। रोज कमाते हैं और खाते हैं। और अगर माहवारी भी कमाते हैं तो उनकी बचत इतनी नहीं होती कि वो दस दिन भी घर बैठे खा सकें।

ये ऐसे लोग हैं जिनके सामने दोहरी मार है। एक तरफ कोरोना और दुसरी तरफ भुखमरी। अगर वो किसी तरह अपने घर पहुच जाते तो कुछ दिन बिना कमाए खा भी लेते पर ये दिल्ली मुंबई जैसे महानगरों में ये संभव नहीं था जहाँ कदम कदम पर पैसों की आवश्यकता है।

कोई अपने बच्चों को कोरोना से मर जाने पर संतोष कर लेगा पर भुखमरी से मरने पर नहीं। उसके लिए उसके परिवार का भुख से मरना उसके पौरुष पर धब्बा है। वर्ना ऐसे हीं कोई हजार किलोमीटर पैदल नहीं चलता। बीबी बच्चों को लेकर साईकिल से हजारों किलोमीटर की दूरी तय नहीं करता।
क्या इतनी छोटी सी बात सरकार में बैठे लोगों को समझ नहीं आई? अरे आप लोग नेता बाद में पहले इंसान तो हैं। क्या रात में सो पाते हैं ये देखते हुए भी कि लोग अपनी जान बचाने के लिए जान दे रहे हैं?
जब लाॅकडाउन किया गया देश में, जब सारी ट्रेनें बन्द हुई तभी ये श्रमिक स्पेशल ट्रेनें ( जो आज चलाई जा रही हैं ) चलाकर सभी लोगों को अपने-अपने घर पहुंचा दिया गया होता। उस समय उन गरीब लाचार लोगों के पास टिकट के पैसे भी होंगे। आज जो लोग 5,5 हजार रुपये देकर अपने घरों को आ रहे हैं, उनमें से कितने लोगों नें उन 5 हजार रुपयों के लिए क्या क्या किया होगा, कौन सी अपनी प्यारी चीजें बेची होंगी इसका अंदाजा आप कैसे लगा सकते हैं? ये गरीब अपने घरों में दोनों मार से सुरक्षित हो जाते। भुख से भी और कोरोना से भी।
जितने भी लोग अपने घरों के लिए निकले पर घर नहीं पहुंच पाए उसका जिम्मेदार कौन है? उनकी मृत्यु दुर्घटना नहीं है बल्कि हत्या है।
जब आपको पता है कि देश में करोड़ों लोग अलग अलग स्थान पर रहते हैं तो उन्हें उनके घरों तक सुरक्षित पहुंचा देने से वो शहर भी सुरक्षित हो जाते जहाँ ये लोग फंसे हुए थे तो क्या प्रोब्लम थी उन्हें सही समय पर पहुंचाने में?
आज भी बस राजनीति हीं क्यों हो रही है? जो भी कार्य हो रहे हैं उनका रिजल्ट क्यों नहीं दिख रहा है? ट्रेन में मजदूरों से पैसे लिए जा रहे हैं या नहीं इसका कोई क्लियर पिक्चर हमलोगों के सामने क्यों नहीं आ रहा है? हम किस दौर में जी रहे हैं जहाँ सही सुचना किसी के पास पहुंच हीं नहीं रहा है? कहने को तो हम सुचना क्रांति के दौर में जी रहे हैं जहाँ हर सुचना बस एक क्लिक दूर है, पर क्या हमारे पास सही सुचना पहुंच रही है? नहीं। दोनों तरफ ( सत्ता और विपक्ष के बीच ) हो राजनीती में कर रह गए हैं। हमारे पास सच क्या है इसकी जानकारी पहुंच हीं नहीं पा रही है। कभी लगता है सरकार सही ढंग से काम नहीं कर रही है ( जो की सच्चाई है ) और और कभी विपक्ष भी बहुत ही घटिया राजनीती करता नजर आता है।

जो घटनाएं हमे हृदय विदारक लगती हैं वो आप लोगों को विचलित क्यों नहीं करती?

एक लड़की हजारों किलोमीटर साईकिल से आती है अपने बीमार पिता को लेकर। एक माँ अपने बच्चे को ट्राली बैग के उपर रख के लाती है।

एक दिव्यांग ( जिसे कि दिव्यांग नाम तो आप हीं नें दिया था प्रधानमंत्री जी, वर्ना हम तो विकलांग कहा हीं करते थे) दिल्ली से आगरा अपनी बनाई गाड़ी से पहुंचता है, ( अब बताईए प्रधानमंत्री जी कि वो दिव्यांग कहाँ सुरक्षित था? कोरोना से भी और भुखमरी से भी? अपने घर में या दिल्ली में? )

एक स्त्री चलते चलते रास्ते में बच्चे को जन्म देती है और फिर उठ कर चलने लगती है। ये सोचकर हीं हृदय विचलित हो जाता है। जब वो बच्चा बड़ा होगा तो उसके मन में अपने देश और सरकार के बारे में क्या इंप्रेशन पडे़गा?

हमारा देश वेलफेयर स्टेट ( लोक कल्याणकारी राज्य ) है अब तो ये सोच भी बेमानी लगती है। क्या किया हमनें लोक कल्याण के लिए? हमें भारतीय होने पर गर्व है पर अब तो कभी कभी भारत में होनें पर शर्म भी आ जाती है। किसी तरह से दिल को समझाते हैं कि नहीं शर्म नहीं आनी चाहिए। कसम से अगर शुरुआत में गरीबों के लिए ट्रेनें चलाकर आपने उन्हें घर पहुंचा दिया होता और उनसे टिकट के पैसे भी ले लिए होते तो वो खुशी-खुशी दे देते। आप समझ सकते हैं कि कितनी जानें बच जाती और देश में कोरोना संक्रमण भी कम होता। अगर उन्हें घर नहीं पहचाना था तो हर राज्य सरकारें उनके रहने खाने का व्यवस्था कर सकती थी। अगर किसी नें नहीं किया तो उनके गृह राज्य को ये जिम्मेदारी लेनी चाहिए थी। पर ना तो केंद्र सरकार जिम्मेदारी लेगी ना राज्य सरकारों तो आखिर कोई क्या करेगा? मरेगा या जब तक जिंदा है तब तक बचने का उपाय करेगा? वहीं लोग कर रहे हैं। लोगों के बारे में सरकारें सोचे या ना सोचे पर लोग अपने बारे में तो जरूर सोचेंगे।
जै हिन्द। वन्दे मातरम।

मोटेरा स्टेडियम

नमस्ते ट्रंप इवेंट होने के बाद से हीं मोटेरा स्टेडियम चर्चा में है।


मोटेरा स्टेडियम 110000 लोगों के बैठने की क्षमता के साथ विश्व का सबसे बड़ा क्रिकेट स्टेडियम तथा विश्व का दुसरा सबसे बड़ा स्टेडियम है।


विश्व का सबसे बड़ा स्टेडियम रुंग्राडो मे डे स्टेडियम, Rungrado May  Day Stadium प्योंगयांग, उत्तर कोरिया में है।


इसे सरदार पटेल स्टेडियम के नाम से भी जाना जाता है। इसका आर्किटेक्ट आस्ट्रेलियाई कंपनी पॉपुलस है।


इसके पहले मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड 95000 लोगों के बैठने की क्षमता के साथ विश्व का सबसे बड़ा क्रिकेट स्टेडियम था।


ये स्टेडियम पहली बार 1983 में बन कर तैयार हुआ था जिसमें बहुत घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच खेले जा चुके हैं।


पहले इसको गुजरात स्टेडियम के नाम से जाना जाता था जिसकी सीटिंग क्षमता 54000 थी।
इसको दोबारा बनवा कर इसकी सीटिंग क्षमता को बढ़ाकर 110000 किया गया, जिससे यह विश्व का सबसे बड़ा क्रिकेट स्टेडियम बन गया, तथा इसका नाम सरदार पटेल स्टेडियम किया गया।

कट, कॉपी और पेस्ट के अविष्कारक Larry Tesler नहीं रहे

क्या आप Larry Tesler के बारे में जानते हैं?

नहीं?

आज के ज़माने में कंप्यूटर का उपयोग किसने नहीं किया होगा? अगर किसी ने कंप्यूटर का उपयोग नहीं किया होगा तो काम से काम स्मार्ट फ़ोन का तो अवश्य किया होगा?

आपने कंप्यूटर, लैपटॉप या स्मार्टफोन में कट (Cut), कॉपी (Copy) और पेस्ट (Paste) तो अवश्य किया होगा?

Ctrl+X =Cut, कंप्यूटर कीबोर्ड पर कण्ट्रोल बटन के साथ जब एक्स बटन को प्रेस करते हैं तो कट होता है,

Ctrl+c = Copy, कंप्यूटर कीबोर्ड पर कण्ट्रोल बटन के साथ जब सी बटन को प्रेस करते हैं तब कॉपी होता है तथा

Ctrl+V = Paste। कंप्यूटर कीबोर्ड पर कण्ट्रोल बटन के साथ जब वी बटन को प्रेस करते हैं तब पेस्ट होता है।

क्या आपको पता है इन तीन कंप्यूटर फीचर्स का अविष्कार किसने किया था?


नहीं पता?

इन तीन फीचर्स के साथ ही साथ “Find” और “Replace” और भी बहुत कुछ का अविष्कार किया था Larry Tesler ने।

Larry Tesler

Larry Tesler एक अमेरिकन कंप्यूटर वैज्ञानिक थे जिनका जन्म 24 अप्रैल 1945 को हुआ था। ये Xerox और Apple जैसी बड़ी कंपनियों में काम कर चुके हैं। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से पढाई करने के बाद Larry Tesler ह्यूमन कंप्यूटर इंटरेक्शन (Human Computer Interaction) के क्षेत्र में काम किया।
Larry Tesler की मृत्यु 17,फरवरी 2020 को हुई।