Great Inspirational Story from life of Neta Ji Subhash Chandra Bose

नेता जी सुभाष चंद्र बोस के कुछ प्रेरक प्रसंग

एक समय था जब हिन्दुस्तान में आइ सी एस की परीक्षा सबसे प्रतिष्ठित परीक्षा माना जाता था। आई सी एस की परीक्षा केवल असाधारण रूप से मेधावी छात्रों को हीं नसीब होता था

नेता जी सुभाष चंद्र बोस के पिता जी की भी इच्छा थी कि उनका बेटा भी आई सी एस की परीक्षा पास करके अंग्रेजी राज में एक बड़ा अफसर बने।

Neta Ji Subhash Chandra Bose File Photo

अपनी इच्छा को उन्होंने नेता जी के समक्ष रखा। पर नेता जी तो आजादी के दीवाने थे। उनको अंग्रेज़ी राज में अंग्रेजों के अधीन काम करना मंजूर हीं नहीं था।

वो तो भारत को स्वतंत्र कराकर इसकी सेवा करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने अपने पिता जी को प्यार से मना कर दिया।

ये बात उनके पिता जी को बहुत बुरी लगी। उन्हें लगा कि आई सी एस की परीक्षा पास करना नेता जी के बस की बात नहीं है। इसमें ये क्षमता हीं नहीं है।

ये बात उन्होंने नेता जी से भी कहा। उन्होंने नेता जी से बहुत हीं गुस्से में उनके पौरुष को ललकार कर कहा कि देश सेवा की आड़ में अपनी अक्षमता को मत छुपाओ। तुम्हारे बस की बात नहीं है आई सी एस परीक्षा पास करना।

ये बात नेता जी सुभाष चंद्र बोस के दिल पर लगी। किसी नें उनके पौरुष को ललकारा था। वो भी अपने पिता जी।

उन्होंने सोच लिया कि अब तो आई सी एस की परीक्षा पास करनी हीं होगी

लग गए तैयारी में और आई सी एस की परीक्षा पास भी कर ली।

अब बारी आई सिविल सर्वेंट बन कर सरकार की सेवा करते हुए अपने लिए मेवा कमाने का। पर ये तो नेता जी के फितरत में हीं नहीं था। अंग्रेजी सरकार की नौकरी तो करनी नहीं थी उन्हें। उन्हें तो देश सेवा करनी थी। उनका लक्ष्य देश को स्वतंत्र कराना था।

उन्होंने आई सी एस की परीक्षा केवल अपने पिता जी को अपने पौरुष और क्षमता का बोध कराना था।

नेता जी नें आई सी एस की परीक्षा पास करने के बाद उससे त्यागपत्र दिया और देश सेवा में लगे रहे।

व्यवसाय जगत की हस्ती नैना लाल किदवई

नैना लाल किदवई।

इस नाम को व्यवसाय जगत में कौन नहीं जानता। ये आज के युवाओं विशेष रूप से लड़कियों के लिए प्रेरणा स्रोत हैं। अपने दम पर सफलता की इस ऊंचाई को पाना आसान नहीं होता। पर कहा गया है कि जहाँ चाह वहाँ राह।


नैना लाल किदवई HSBC बैंक की इंडिया ग्रुप की कंट्री हेड और जेनरल मैनेजर हैं

शिक्षा दीक्षा

इनकी शिक्षा दीक्षा दिल्ली विश्वविद्यालय तथा हार्वर्ड विश्वविद्यालय से हुई है। दिल्ली विश्वविद्यालय में स्नातक तथा हार्वर्ड विश्वविद्यालय से मैनेजमेंट (MBA) की पढ़ाई की है

कैरियर

इन्होंने अपने कैरियर की शुरुआत ANZ Grindless नामक कंपनी से की थी तथा आज Nestle SA की Non Executive director के पद पर भी सेवा दे रही हैं तथा साथ हीं साथ हार्वर्ड बीजिनेस स्कूल की वैश्विक सलाहकार के रूप में भी कार्य कर रही हैं।

पुरस्कार

किसी से प्रेरणा लेने की बात हो और उनको मिले सम्मान तथा पुरस्कारों की बात ना हो ये कैसे हो सकता है?

इनको भारत सरकार नें ट्रेड और इंडस्ट्री के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान के लिए पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया है तथा इसका नाम भारत के सबसे सफल उद्यमियों में लिया जाता है। इनको देश विदेश में कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है।

इनका स्वभाव बहुत हीं मृदु है तथा धैर्य से कार्य करने के लिए जाना जाता है।

एक बार इन्होंने अपने कामयाबी के बारे में कहा था कि “मुझे खुद पर हमेशा विश्वास रहा है। फलस्वरूप मैं अपने उद्देश्यों में हमेशा कामयाब रही। आप को अपने सपनों को उद्देश्य के साथ जोड़ देना चाहिए। यहीं वजह है कि मैं अपने क्षेत्र में कामयाब रही। “

उनका मानना था कि कामयाब होने के लिए अपनी आंतरिक शक्तियों को बाहर लाना होगा और खुद पर विश्वास करना होगा तभी आप किसी कार्य को बेहतर तरीके से कर सकोगे।

सपना जो हो ना सका अपना

मैनें भी देखा था एक सपना।
जो हो ना सका मेरा अपना।
तो क्या मैं जीना छोड़ दुं।
मैं तो हर रोज विष पीता हूँ तो क्या अमृत मिले तो छोड़ दुं।
जो मेरा नहीं था वो मेरा हो नहीं सका।
जो तेरा नहीं था वो तेरा हो नहीं सका।
जो तेरे लिए बना था उसे तुझसे कोई ले नहीं सकता।
जो तेरे लिए नहीं बना हो उसे तुम्हें कोई दे नहीं सकता।
तेरे वश में केवल तेरे कर्म हैं।
यहीं तो भगवान नें कहा गीता का मर्म है।
कर्म करो फल की चिंता मत करो ये गीता का सार है।
यहीं कर्म तेरे जीवन का आधार है।
उसे छोड़ कर आगे बढ़ो जो पीछे छुट गया।
मान लो वो तुम्हारा नहीं था जो पीछे छुट गया।
जो तेरा था नहीं वो तुझे मिलेगा कैसे।
जिसे तप कर सोना बनना है वो ऐसे खिलेगा कैसे।
तुम बस आगे बढ़ते रहो, भगवान फल देगा।
तेरे हर समस्या का हल देगा।

अनुभव बड़ा या शिक्षक

कहते हैं अनुभव सबसे बड़ा शिक्षक होता है। लोग अपने अनुभवों से ज्यादा सीखते हैं बनिस्पत किसी इंसान से। पर जो स्मार्ट लोग होते हैं वो अपने अनुभवों के साथ साथ दूसरों के अनुभवों से भी सीखते हैं। अगर सभी केवल अपने अनुभवों से सीखने लगें तो जिंदगी छोटी पड़ जाएगी और सीख नहीं पाएंगे। आपको जिंदगी में सफल होना है तो अपने अनुभवों के साथ साथ दूसरों के अनुभवों से भी सीखना होगा।

आप एक सफल इंसान और महान इंसान की जीवनियां पढ़ते हैं तो आपका मकसद उनके जीवन में आए उतार चढ़ाव और उससे उबरने के तरीकों से सीखना होता है। आप सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं पढ़ते।
लोगों की सफलता और असफलता दोनों से हीं कुछ सीखते हैं।

अब आते हैं अनुभव और शिक्षक पर। अनुभव और शिक्षक में कौन ज्यादा महत्वपूर्ण है हमारी जिंदगी में। अनुभव भी बहुत बड़ा शिक्षक की भूमिका निभाने का कार्य करता है हमारी जिंदगी में। बड़े से बड़े शिक्षक आपको वो नहीं सीखा सकते जो एक अनुभव आपको सीखा सकता है। तो क्या शिक्षक का महत्व कम हो गया आपकी जिंदगी में?

बिल्कुल नहीं।

अपने अनुभवों से हमें कैसे और क्या सीखना है ये एक शिक्षक हीं सीखा सकता है। अगर हमें अच्छे शिक्षक मिले हों तो अनुभव भी हमारा अच्छा शिक्षक होगा वर्ना अनुभव भी बुरा साबित होगा।

एक बार हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से किसी विद्यार्थी नें ये प्रश्न किया कि अनुभव और शिक्षक में अधिक महत्वपूर्ण भूमिका किसकी है हमारे जीवन में?

प्रधानमंत्री जी नें एक उदाहरण से इस बात को बहुत हीं अच्छे तरीके से समझाया था।

उनका कहना था कि हम अपने अनुभवों से क्या सीखते हैं ये निर्भर करता है कि हमारे जीवन में हमें किस तरह के शिक्षक मिले हैं और क्या संस्कार मिले हैं।

मान लीजिए अगर आप बस में जा रहे हैं और किसी नें  आपकी पॉकेट काट ली जिसमें आपके पैसे और डाक्यूमेंट थे। उस समय आप की मनोदशा क्या होगी? आप दुखी होंगे, गुस्से में होंगे। आपके उपर इस घटना का नकारात्मक असर और सकारात्मक असर दोनों हीं हो सकता है। आप सोच रहे होंगे कि अरे वाह, ये तो बिना मेहनत रुपये कमा लिए पॉकेट काटने वाले नें। मैं भी यहीं कर सकता हूं। कम मेहनत से ज्यादा कमाई। और आप गलत रास्ते पर चल पड़ेंगे। दुसरा आप सोच सकते हैं कि काश मैं सावधान रहा होता तो ये घटना मेरे साथ नहीं होती। और आप आगे से सावधान रहना शुरू कर देंगे। ये दोनों हीं शिक्षाएं आपको एक हीं अनुभव नें दिया। पर इन दोनों शिक्षाओं में से आपको लेना क्या है ये आपको एक शिक्षक द्वारा दिए गए संस्कार हीं बता सकते हैं।

7 असाधारण व्यक्तित्व जिन्हें पद्म पुरस्कार 2020 से सम्मानित किया गया

पद्मश्री पुरस्कार 2020 से सम्मानित 7 असाधारण व्यक्तित्व

कहते हैं कि असाधारण व्यक्ति जिनके दिल में और कुछ नहीं केवल मानवता बसती हो उन्हें किसी भी पुरस्कार की चिंता नहीं होती। वो निस्वार्थ भावना से लोगों और देश की सेवा करते रहते हैं।
अगर आप मानवता की सेवा के लिए निस्वार्थ भावना के साथ, बिना फल की चिंता किए करते जाते हैं तो फल देने वाला आपकी चिंता करता है।

इसी प्रकार से जब 7 लोगो को पद्म पुरस्कारों से सम्मानित करने की घोषणा हुई तो ये बात चरितार्थ हो गई।
इन लोगों के बारे में बहुत हीं कम लोगों को और बहुत हीं कम जानकारी थी।

1. जगदीश लाल आहूजा

जगदीश लाल आहूजा को लोग लंगर बाबा के नाम से भी जानते हैं।

जैसे कि नाम से हीं पता चल जाता है, ये पिछले दो दशकों से रोगियों के लिए निस्वार्थ भाव से मुफ्त लंगर का आयोजन करते हैं।

लंगर के साथ साथ ये रोगियों की आर्थिक सहायता भी करते हैं।

2. जावेद अहमद टाक

जावेद अहमद टाक जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले में करीब दो दशकों से दिव्यांग बच्चों को समाज के मुख्य धारा में आकर उनकी सेवा कर रहे हैं।

एक आतंकवादी घटना में इनको भी दिव्यांग होना पड़ा था। तब से ये व्हील चेयर पर रहते हैं।

3. मोहम्मद शरीफ उर्फ चचा शरीफ

चचा शरीफ फैजाबाद में एक साइकिल मैकेनिक हैं जो पिछले 25 वर्ष से लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करते आ रहे हैं।

अब तक ये 25000 से अधिक शवों का, उनके धर्म की पहचान करके उनके धार्मिक रीति रिवाजों के अनुसार अंतिम संस्कार कर चुके हैं।

लोग इन्हें चचा शरीफ के नाम से भी जानते हैं।

4. तुलसी गौडा

तुलसी गौडा को इनके पौधों के विभिन्न प्रजातियों के बारे में वृहद् रुप से जानकारी के कारण Encyclopaedia of Forest एनसाय्क्लोपेडिया आॅफ फाॅरेस्ट भी कहा जाता है।

पिछले 60 वर्षों से ये हजारो पेड़ों की देखभाल कर चुकी हैं तथा आज भी 72 वर्ष की आयु में भी लोगों के बीच पेड़ पौधों और पर्यावरण के प्रति जागरूकता फैलाने का कार्य करती हैं।

5. डाॅ सुशोवन बनर्जी

डाॅ सुशोवन बनर्जी को पश्चिम बंगाल के बोलपुर के निवासियों के बीच एक टका डाॅक्टर या One Rupee Doctor के नाम से भी जाना जाता है।

ये पिछले 57 सालों से मरीजों का इलाज उनसे महज एक रुपया लेकर करते आ रहे हैं।
ये पश्चिम बंगाल में कांग्रेस पार्टी के पुर्व विधायक रह चुके हैं।

6. उषा चौमर

अलवर, राजस्थान की रहने वाली उषा चौमर कभी मैला ढोने का काम किया करती थी। आज उन्हें उनके समाज सेवा के कार्यों के लिए पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

उषा चौमर बचपन से हीं मैला ढोने का काम करती थी जो महज दस साल की उम्र में उनकी शादी होने के बाद भी जारी रहा।

उनको ये काम पसंद नहीं होते हुए भी करना पड़ता था। पर वर्ष 2003 में सुलभ इंटरनेशनल के मालिक बिन्देश्वर पाठक से होने के बाद इनके जीवन में बदलाव आया।

बिन्देश्वर पाठक नें इन्हें सही राह दिखाई तथा ये पापड़ और जुट बनाने का कार्य करने लगी जिसमें और भी महिलाओं को जोड़ने का काम भी किया।

2003 में उषा चौमर नई दिशा संस्था से जुड़ी तथा कई महिलाओं के जीवन में बदलाव लाई।

7. हरेकाला हजब्बा

हरेकाला हजब्बा कर्नाटक में दक्षिण कन्नड़ के एक छोटे से गांव न्युपाड़ापु के रहने वाले हैं।

ठेले पर संतरा बेचने वाले हरेकाला हजब्बा के पास रहने के लिए घर नहीं था तथा कभी स्कूल नहीं जा सके पर बच्चों को पढ़ाने के लिए पुरी जिंदगी लगा दी।

वर्ष 2000 तक इनके गांव में कोई स्कूल नहीं था तथा इन्होंने अपने गांव में स्कुल खोला जिसे अब कॉलेज में अपग्रेड करने की कोशिश कर रहे हैं।

आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने के कारण पहले एक मस्जिद में स्कुल खोला तथा बाद में गांव वालों के सहयोग से स्कुल खुला।

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