भाई बहन का प्यार राखी का त्यौहार

हम सभी रक्षा बंधन की तैयारी में लगे  हुए हैं। इस साल रक्षा बंधन 3 अगस्त को मनाया जायेगा। इस दिन बहन और भाई का उत्साह देखते बनता है। बहनें भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर भाइयों से अपनी रक्षा वचन लेती हैं। पर क्या आपको रक्षा बंधन पर्व के महत्व, शुरुआत आदि के बारे में पता है ? इसका महत्व क्या है? ये कब मनाया जाता है ? यह पर्व क्यों मनाया जाता है? इसके पीछे की कहानी क्या है ? इसकी शुरुआत कैसे और कब हुई थी? आज हम इसी बात का जिक्र करते हैं।

Rakhi Thali http://Photo by Deepali Phadke from Pexels

रक्षा बंधन कब मनाया जाता है?

रक्षा बंधन सावन के समापन के साथ पूर्णिमा के दिन मनाया जाता जाता है।
वर्ष 2020 के रक्षा बंधन का मुहूर्त
इस वर्ष सावन का समापन 3 अगस्त को हो रहा है यानि सावन की पूर्णिमा  अगस्त को है जिस दिन प्रति वर्ष रक्षा बंधन का पावन पर्व मनाया जाता है।
रक्षा बंधन – 3 अगस्त 2020.
राखी बांधने का मुहूर्त : 09:27:30 से 21:11:21 तक
अवधि : 11 घंटे 43 मिनट
रक्षा बंधन अपराह्न मुहूर्त : 13:45:16 से 16:23:16 तक
रक्षा बंधन प्रदोष मुहूर्त : 19:01:15 से 21:11:21 तक 

रक्षा बंधन के पीछे की कहानियाँ

हमारे हर पर्व त्यौहार के पीछे कोई न कोई कहानियाँ होती हैं। आखिर इस तरह महान  पर्व को मनाने की वजह क्या है ? इसकी शुरुआत कब हुई थी ? ये सारे सवाल आपके मन में भी तो आते होंगे ? भाई बहन के प्यार और पवित्र रिश्तों को सँभालते इस महान पर्व की शुरुआत करीब 6000 वर्ष पूर्व हुई थी।
रक्षा बंधन मनाने के पीछे कई कहानियाँ प्रचलित हैं।  इनमे से कुछ मुख्य इस तरह से हैं।

द्रौपदी और भगवान कृष्णा की कहानी

इस बारे में भी दो कहानियाँ प्रचलित हैं। एक जब भगवान श्री कृष्णा ने शिशुपाल के वध करने के लिए सुदर्शन चक्र  छोड़ा था तब  भगवान श्री कृष्णा की ऊँगली कट गई थी और उसमें से खून निकलने था। चूकिं द्रौपदी भगवान श्री कृष्णा को दिल से भाई की तरह प्यार करती थी तो उनसे ये देखा नहीं गया। तुरंत उन्होनें अपने साड़ी का पल्लू में से कपडे को काटकर भगवान की कटी ऊँगली बांध दी जिससे खून बहना बंद हो गया। कहा जाता है तभी भगवान श्री कृष्णा नें द्रौपदी के रक्षा का प्रण लिया। और जब द्रौपदी  चीरहरण हो रहा था भगवान श्री कृष्णा नें उनकी रक्षा की। दुशाशन द्रौपदी का साड़ी खींचता गया और भगवान साड़ी बढ़ाते गए। 
द्रौपदी  से जुडी रक्षा बंधन  कहानी है जिसमे एक भगवन श्री कृष्णा की ऊँगली कट जाती है तो सत्यभामा और रुक्मिणी जैसी रानियाँ  हैं कपड़ा लेने के लिए दौड़ पड़ी ताकि ऊँगली को बांध कर रक्त के बहाव  रोका जा सके। पर द्रौपदी ने  अपनी साड़ी में से कपड़ा फाड़ कर भगवान की बाँधी जिससे प्रसन्न होकर और जिसका ऋणी होकर भगवान ने चीरहरण से द्रौपदी को बचाकर ऋण  उऋण हुए। 

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महभारत के युद्ध में महाराज युद्धिष्ठिर द्वारा सैनिकों को रक्षा सूत्र बांधना 

महाभारत का युद्ध शुरू होने  था। महाराज युधिष्ठिर चिंता और निराशा में डूबे हुए थे।  भगवान श्री कृष्णा नें चिंता का कारण पूछा तो युधिष्ठिर ने बताया की युद्ध में हार जीत को लेकर आशंकित हैं। एक तरफ कौरवों की विराट सेना और बड़े बड़े योद्धा  जैसे पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य, कर्ण इत्यादि सेनापति  तरफ हमारी छोटी सी सेना। इस पर  भगवान श्री कृष्णा ने एक एक सैनिक की हाथों में रक्षा सूत्र बांधने का सुझाव दिया तथा धर्मराज युधिष्ठिर ने वो रक्षा सूत्र सैनिकों की कलाइयों में बांधा। फिर महाभारत के युद्ध में क्या हुआ, किसकी जीत और किसकी हार हुई ये छुपा नहीं है। 

राजा बलि और देवी लक्ष्मी

जब राजा बलि (भक्त प्रह्लाद के पोते)  शक्तियाँ  बहुत अधिक बढ़ गयी और देवों को युद्ध में पराजित होना पड़ा तो देवराज इंद्रा को चिंता हुई। (आपको पता होना चाहिए की देवराज इंद्रा का पद स्थायी नहीं है। कोई भी अपने सद्कर्मों से देवराज का पद प्राप्त कर सकता है ) देवराज भगवान विष्णु की शरण में गए। भगवन विष्णु वामन अवतार लेकर राजा बलि के दरबार में गए  और बलि से दान में तीन पग जमीन माँगा। राजा बलि बहुत बड़े दानवीर थे और फिर सोचे कि एक वामन तीन पग में कितनी जमीन ले सकता है ? बोले महाराज ये क्या मांग दिया आपने? कुछ बड़ी चीज मांगो। धन दौलत, सोना चाँदी, आभूषण, वस्त्र इत्यादि, पर भगवान ने बस तीन पग जमीन ही माँगा। बलि की स्वीकारोक्ति के बाद भगवान विष्णु अपने असली रूप में आ गए और एक पग में आसमान और दूसरे पग में पृथ्वी को माप दिया।  जब तीसरे पग की बारी आयी तो कुछ बचा ही नहीं था। पर राजा बलि इतने बड़े दानवीर थे की उन्होंने तीसरा पग अपने सर पर  लिया जिससे की उन्हें पृथ्वी छोड़कर पाताल लोक में जाना पड़ गया। अब भगवान विष्णु इतने बड़े दानवीर और भक्त को अकेला कैसे छोड़ सकते थे? उन्होनें उनकी रक्षा करने  निश्चय किया जब तक की राजा बलि को इंद्रा की गद्दी न मिल जाये। भगवान विष्णु उनके द्वारपाल बनकर रहने लगे। इस बात से वैकुण्ठ लोक में बैठे देवी लक्ष्मी चिंतित हो गयी। उन्होनें अपने पति को पाने के लिए एक ब्राह्मण स्त्री रूप  धरा और राजा बलि के पास पहुँच गयी और कहा की उनके पति एक लम्बी यात्रा पर गए हैं  और रहने के लिए एक स्थान की माँग की। राजा बलि नें उन्हें सच्चे मन से अपने घर में रखा तथा अपने बहन की तरह सुरक्षा प्रदान की। देवी लक्ष्मी के आने के बाद राजा बलि के घर में रौनक आ गई तथा घर धन दौलत और खुशियों से भर गया। फिर एक दिन सावन की पुर्णिमा के दिन राजा बलि को एक रक्षा सुत्र बांधा तथा अपनी खुशी और रक्षा का वचन लिया। इस बात से प्रसन्न होकर राजा बलि नें कोई भी मांग पुरी करने का वचन दिया। देवी लक्ष्मी नें द्वारपाल के रूप में खड़े भगवान विष्णु को मांगा। राजा बलि को बहुत आश्चर्य हुआ तभी देवी लक्ष्मी और भगवान विष्णु अपने असली रूप में आए। राजा बलि अपने दानवीर होने के लिए जाने जाते हैं इसलिए उन्होंने भगवान विष्णु को देवी लक्ष्मी को सौंप दिया। तभी से ये भाई बहन के प्रेम का पर्व मनाया जाता है।

अपने भाई को डिज़ाइनर राखी भेजेँ

इसीलिए रक्षा सूत्र बांधते वक्त इस मंत्र का जाप किया जाता है

” ॐ येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:। तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।

अर्थात जिस रक्षासूत्र से महान शक्तिशाली राजा बलि को बांधा गया था, उसी सूत्र से मैं तुम्हें बांधता हूं। 

रक्षाबंधन का ऐतिहासिक महत्व

महान नोबेल पुरस्कार विजेता गुरुदेव रविन्द्र नाथ टैगोर नें सन 1905 में बंगाल विभाजन के समय रक्षाबंधन पर्व को जनांदोलन बना दिया था। उन्होंने हिन्दू मुस्लिम एकता के लिए और बंगाल विभाजन के विरोध में हिन्दु औरतों से मुस्लिम पुरुषों को तथा मुस्लिम स्त्रियों से हिन्दू पुरुषों को राखी बंधवाया।  

Gift for your Brothers or Sisters

इस रक्षा बंधन बहनों से निवेदन है की वो इस बार भाई को राखी बांधते समय सिर्फ अपने रक्षा का वचन न लें, बल्कि भाई से पूरी स्त्री जाति के सम्मान करने का वचन लें।

 

अगर आपको रक्षा बंधन या किसी और पर्व त्यौहार के बारे में विशेष जानकारी है जो आप हमसे शेयर करना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। वो कहानी आपके नाम और फोटो के साथ प्रकाशित की जाएगी। साथ ही अपना परिचय और एक फोटो भेजे। Mail Us at ” [email protected]

 

 

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