भारतीय इतिहास के महान दानवीर कर्ण, राजा बलि, राजा शिवि, राजा मोरध्वज, महर्षि दधीचि

हमारे देश, धर्म और संस्कृति में दान का बहुत बड़ा  महत्व है। कहा जाता है आपके पास जो भी है उसमे से कुछ हिस्सा उन जरूरतमंदों को दान करते हैं तो ये सबसे बड़ा पुण्य का काम है। वो चीज चाहे आपकी विद्या हो, धन हो, शारीरिक श्रम हो या कुछ और। 

दान धन का ही हो, यह जरुरी नहीं, भूखे को रोटी, बीमार का उपचार, किसी व्यथित व्यक्ति को अपना समय, उचित परामर्श, आवश्यकतानुसार वस्त्र, सहयोग, विद्या जिसको जिस चीज की आवश्यकता हो और वो हमारे पास हो। जब हम  कुछ पाने  की अपेक्षा नहीं करते, यही सच्चा दान है।

रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि परहित के समान कोई धर्म नहीं है और दूसरों को कष्ट देने के समान कोई पाप नहीं है। इसी तरह संस्कृत में एक  श्लोक है “परोपकाराय पुण्याय, पापाय परपीड़नाम”।

दानो में विद्या दान सबसे बड़ा दान है क्योंकि ये आपके अंदर की ऐसी संपत्ति है देने से घटती नहीं है बल्कि बढ़ती जाती है। 

आजकल अंग दान का महत्व भी बहुत गया है। अंग दान और रक्त दान से आप किसी को  जीवन दान देते हैं। जो दान किसी जीव के प्राणों की रक्षा करे उससे उत्तम और क्या हो सकता है? हमारे शास्त्रों में ॠषि दधीची का वर्णन है जिन्होंने अपनी हड्डियाँ तक दान में दे दी थीं, कर्ण का वर्णन है जिसने अपने अन्तिम समय में भी अपना स्वर्ण दंत याचक को दान दे दिया था। देना तो हमें प्रकृति रोज सिखाती है, सूर्य अपनी रोशनी, फूल अपनी खुशबू, पेड़ अपने फल, नदियाँ अपना जल, धरती अपना सीना छलनी कर के भी दोनों हाथों से हम पर अपनी फसल लुटाती है। इसके बावजूद न तो सूर्य की रोशनी कम हुई, न फूलों की खुशबू, न पेड़ों के फल कम हुए न नदियों का जल, अत: दान एक हाथ से देने पर अनेकों हाथों से लौटकर हमारे ही पास वापस आता है बस शर्त यह है कि निस्वार्थ भाव से श्रद्धा पूर्वक समाज की भलाई के लिए किया जाए।

हमारे इतिहास और संस्कृति में हजारों लाखों महान पुरुष मिलेंगे जिन्होंने दानवीरता में बड़े कीर्तिमान स्थापित किये हैं। इनमे से कुछ प्रमुख नाम हैं राजा बलि, राजा शिवि, दानवीर कर्ण, महर्षि दधीचि और राजा मोरध्वज। 

  1. #राजा बलि की दानवीरता 

जब राजा बलि (भक्त प्रह्लाद के पोते)  शक्तियाँ  बहुत अधिक बढ़ गयी और देवों को युद्ध में पराजित होना पड़ा तो देवराज इंद्रा को चिंता हुई। (आपको पता होना चाहिए की देवराज इंद्रा का पद स्थायी नहीं है। कोई भी अपने सद्कर्मों से देवराज का पद प्राप्त कर सकता है ) देवराज भगवान विष्णु की शरण में गए। भगवन विष्णु वामन अवतार लेकर राजा बलि के दरबार में गए  और बलि से दान में तीन पग जमीन माँगा। राजा बलि बहुत बड़े दानवीर थे और फिर सोचे कि एक वामन तीन पग में कितनी जमीन ले सकता है ? बोले महाराज ये क्या मांग दिया आपने? कुछ बड़ी चीज मांगो। धन दौलत, सोना चाँदी, आभूषण, वस्त्र इत्यादि, पर भगवान ने बस तीन पग जमीन ही माँगा। बलि की स्वीकारोक्ति के बाद भगवान विष्णु अपने असली रूप में आ गए और एक पग में आसमान और दूसरे पग में पृथ्वी को माप दिया।  जब तीसरे पग की बारी आयी तो कुछ बचा ही नहीं था। पर राजा बलि इतने बड़े दानवीर थे की उन्होंने तीसरा पग अपने सर पर  लिया जिससे की उन्हें पृथ्वी छोड़कर पाताल लोक में जाना पड़ गया। अब भगवान विष्णु इतने बड़े दानवीर और भक्त को अकेला कैसे छोड़ सकते थे? उन्होनें उनकी रक्षा करने  निश्चय किया जब तक की राजा बलि को इंद्रा की गद्दी न मिल जाये। भगवान विष्णु उनके द्वारपाल बनकर रहने लगे। इस बात से वैकुण्ठ लोक में बैठे देवी लक्ष्मी चिंतित हो गयी। उन्होनें अपने पति को पाने के लिए एक ब्राह्मण स्त्री रूप  धरा और राजा बलि के पास पहुँच गयी और कहा की उनके पति एक लम्बी यात्रा पर गए हैं  और रहने के लिए एक स्थान की माँग की। राजा बलि नें उन्हें सच्चे मन से अपने घर में रखा तथा अपने बहन की तरह सुरक्षा प्रदान की। देवी लक्ष्मी के आने के बाद राजा बलि के घर में रौनक आ गई तथा घर धन दौलत और खुशियों से भर गया। फिर एक दिन सावन की पुर्णिमा के दिन राजा बलि को एक रक्षा सुत्र बांधा तथा अपनी खुशी और रक्षा का वचन लिया। इस बात से प्रसन्न होकर राजा बलि नें कोई भी मांग पुरी करने का वचन दिया। देवी लक्ष्मी नें द्वारपाल के रूप में खड़े भगवान विष्णु को मांगा। राजा बलि को बहुत आश्चर्य हुआ तभी देवी लक्ष्मी और भगवान विष्णु अपने असली रूप में आए। राजा बलि अपने दानवीर होने के लिए जाने जाते हैं इसलिए उन्होंने भगवान विष्णु को देवी लक्ष्मी को सौंप दिया। तभी से  इस दिन को रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाता है।

2. #कर्ण की दानवीरता 

दानवीर कर्ण के दानवीरता की ख्याति युगों युगों तक फैली हुई है। कर्ण के दान की कई कहानियाँ हैं जो उसे विश्व के महानतम दानवीरों में से एक बनाती हैं। पर उनमे से तीन कहानियों की बात करते हैं। पहली कहानी कर्ण द्वारा अपने कवच कुण्डल का दान और दूसरी सोने के दातों का दान और तीसरे अपने महल के  खिड़कियों और दरवाजों को तोड़कर उनमे से चन्दन की लकड़ियों का दान। 

कवच कुण्डल का दान 

सभी जानते हैं कि कर्ण सूर्य पुत्र था जिसे सूर्य ने एक ऐसा कवच कुण्डल दिया था जिसपर किसी भी अस्त्र शस्त्र का असर नहीं हो सकता था। महाभारत युद्ध में कर्ण कौरवों की तरफ से युद्ध लड़ रहा था जिसे हराना अर्जुन के लिए असंभव सिद्ध हो रहा था। कहा जाता है अर्जुन इंद्र पुत्र थे। इंद्रा को अर्जुन की चिंता हुई। फिर इन्द्र ने छल करके कर्ण के दानवीरता का फायदा उठाना चाहा। एक दिन जब कर्ण संध्या वंदन कर रहा था तभी इंद्र एक ब्राह्मण का वेश धरकर उसके पास गए। ब्राह्मण को देखकर कर्ण ने उनके आने का कारन पूछा। इंद्र ने उस से दान मांगने की।  कर्ण ने कहा की हे विप्र देव माँगो जो माँगना है। इंद्र भी बहुत शातिर और चालक थे। कहा की हे कर्ण मैं ऐसे कुछ नहीं मांग सकता। पहले तुम्हे वचन देना होगा की जो भी मैं मांगूंगा वो तुम मुझे दोगे। कर्ण ने हाथ में जल लेकर वचन दिया की हे विप्रवर मैं वचन देता हूँ की आप जो मांगेंगे वो मैं दूंगा।

तब इंद्रा ने कर्ण से उसके कवच कुण्डल मांग लिए। कर्ण को थोड़ा धक्का लगा पर उसने बिना देर किये वो कवच और कुण्डल दे दिए। 

जब इंद्र जाने लगे तब उनके रथ का पहिया धंस गया और आकाशवाणी हुई “देवराज इन्द्र, तुमने बड़ा पाप किया है। अपने पुत्र अर्जुन की जान बचाने के लिए तूने छलपूर्वक कर्ण की जान खतरे में डाल दी है। अब यह रथ यहीं धंसा रहेगा और तू भी यहीं धंस जाएगा। ” तब देवराज नें कर्ण को अमोघ अस्त्र दिए। 

कर्ण द्वारा सोने के दातों का दान 

जब कर्ण युद्ध भूमि में पड़ा अंतिम साँस ले रहा था तब भगवान श्री कृष्ण ने उसके दानवीरता की परीक्षा लेनी चाही। वो एक ब्राह्मण का वेश बनाकर कर्ण के पास पहुंच गए।  कहा की तुम्हारे बारे में बहुत सुना है। मुझे कुछ स्वर्ण की आवश्यकता है। क्या वो तुम दे सकते हो? कर्ण ने कहा की मेरे पास अभी सोना नही है पर मेरे दांत सोने के बने हैं। आप चाहें तो उन्हें ले सकते हैं। 

भगवान ने कहा मैं तुम्हारे दांत नहीं।  कर्ण ने स्वयं अपने दांत तोड़ दिए। भगवान ने उसे भी लेने से इंकार कर दिया। वो खून से सने दांत नहीं लेना चाहते थे। 

कर्ण ने अपने बाणों से वर्षा करके दांत धो कर दिए। 

कर्ण और चन्दन की लकड़ी

एक बार भीम और अर्जुन भगवान श्री कृष्ण से युधिष्ठिर के दानवीरता का बखान कर रहे थे। भगवान श्री कृष्ण मंद मंद मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने कहा की भाई  हमने तो कर्ण से बड़ा दानी नहीं देखा। पांडवों को ये बात पसंद नहीं आयी। 

भगवान ने कहा समय आने पर ये बात सिद्ध हो जाएगी। 

कुछ दिनों बाद युधिष्ठिर के पास एक याचक आया। उसे यज्ञ करने के लिए चन्दन की सुखी लकड़ी की आवश्यकता थी। उस समय मूसलाधार बारिश हो रही थी। सुखी लकड़ी नहीं मिल रही थी। युधिष्ठिर ने कोष से लकड़ी देने का आदेश दिया पर संयोग से कोष में सुखी लकड़ी नहीं थी। युधिष्ठिर ने बहुत प्रयास किया। पर सुखी लकड़ी की व्यवस्था नहीं हो पायी।

अंतत: याचक ने कहा की महाराज मेरा यज्ञ तो पूरा नहीं हो पायेगा और मैं भी भूखा प्यासा मर जाऊँगा क्योंकि यज्ञ पूरा किये बिना मैं कुछ खाता पीता नहीं हु।

तब भगवान श्री कृष्ण याचक को कर्ण के पास गए। याचक ने कर्ण से भी चन्दन की सुखी लकड़ी माँगी। कर्ण ने भी बहुत प्रयास किया पर चन्दन की सुखी लकड़ी नहीं मिली। फिर कर्ण ने अपने महल की खिड़कियों और दरवाजों को तोड़कर चन्दन की लकड़ियों का ढेर लगा दिया। 

भगवान श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि धर्मराज आपके महल में भी दरवाजे और खिड़कियां भी चन्दन के लकड़ी की हीं बनी हैं। अपने क्यों नहीं उन लकड़ियों को दिया? साधारण अवस्था में दान देना कोई विशेषता नहीं है, असाधारण परिस्थिति में किसी के लिए अपने सर्वस्व को त्याग देने का ही नाम दान है। 

3. #महाराजा शिवि और कबूतर की कहानी 

महाराज शिवि की दानवीरता और न्यायप्रियता की कहानी संसार भर में प्रसिद्द थी। देव, दानव, मानव सभी उनकी न्यायप्रियता का लोहा मानते थे। जब देवराज इंद्रा ने उनके न्यायप्रियता की कहानी सुनी तो उन्हें शंका हुई। और उन्होंने उनकी परीक्षा लेनी चाही। देवराज इंद्र और अग्नि देव ने मिलकर एक योजना बनाई। देवराज इंद्र ने बाज का और अग्नि देव ने कबूतर का रूप बनाया और परीक्षा लेने चले। 

एक दिन महाराज शिवि अपने महल के बगीचे में बैठे हुए थे। तभी उनकी गोद में एक घायल कबूतर गिरा। कबूतर का पीछा करते एक बाज भी आया। बाज ने शिवि से कहा की महाराज कबूतर मेरा भोजन है। इसे मुझे सौंप दीजिये। महाराज शिवि ने कहा कि ये कबूतर मेरी शरण में आया है और मैं अपने शरण में आये किसी भी जीव के प्राणों की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध हूँ। तब बाज ने कहा की महाराज ये मेरा आहार है और किसी के आहार को छीनना धर्म नहीं है। इसपर शिवि ने बाज को उसके आहार  व्यवस्था करने की बात कही तो बाज ने कहा की महाराज आप इस कबूतर के बराबर का मांस हमें दे दीजिये। हमें  और कुछ नहीं चाहिए। 

महाराज शिवि ने निश्चय किया की कबूतर की जगह वो अपना मांस उस बाज को खिलाएंगे। क्योंकि शिवि अपने राज्य के किसी और प्राणी को मरने नहीं दे सकते थे। 

वहां एक तराजू मंगाया गया। उस तराजू पर एक तरफ कबूतर को बैठाया गया और दूसरी तरफ महाराज शिवि अपने शरीर से मांस काटकर  रखते थे। पर हर बार कबूतर का पलड़ा भारी रहता था। अंत में तराजू के दूसरे पलड़े पर महाराज शिवि स्वयं बैठ गए। तब दूसरा पलड़ा भारी हो गया। 

अब देवराज इंद्र और अग्नि देव की शंका दूर हुई और वो अपने असली रूप में आये। दोनों महाराज शिवि की दानवीरता और न्यायप्रियता से प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद दिया और चले गए। 

4. #राजा मोरध्वज की कहानी 

एक बार अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण से कहा की हे भगवान आपका मुझसे बड़ा भक्त हमसे बड़ा दानी कौन है? भगवान ने कहा चलो देखते हैं। 

भगवान श्री कृष्ण और यमराज एक ब्राह्मण और सिंह  बनाकर  राजा मोरध्वज के दरबार में पहुँच गए। वहाँ जाकर भगवान ने मोरध्वज से कहा, “हे राजन, हमने आपके दानवीरता की कहानिया बहुत सुनी है। ” सुना है आपके दरबार से कोई खाली हाथ नहीं लौटा है। 

राजा ने कहा की हे ब्राह्मण देव ये नारायण की कृपा है की हमारे दरबार से कोई खाली हाथ  नहीं लौटा। मैं आपकी सेवा  करके स्वयं को धन्य महसूस करूँगा। कहिये क्या सेवा कर सकता हूँ। 

ब्राह्मण वेश में भगवान ने कहा की हे राजन हमें बस हमारे भोजन की व्यवस्था कर दीजिये। हम ब्राह्मण तो सात्विक भोजन कर लेंगे परन्तु हमारे साथ सिंह राज भी हैं तो उनके लिए आपको मांसाहार की व्यवस्था करनी होगी। 

राजा सोच में पड़ गए। एक धार्मिक राजा, नारायण का बड़ा भक्त जो मांसाहार के बारे में सोचता भी नहीं हो, वो कैसे मांसाहार की व्यवस्था कर सकता था।

बहुत सोचने के बाद राजा ने स्वयं को सिंह राज के सामने पेश करने का प्रस्ताव रखा। परन्तु भगवान नें कहा की हे राजन आपके मांस खाकर सिंह राज तृप्त नहीं होंगे। इन्हे किसी बूढ़े इंसान या जानवर का मांस नहीं चाहिए। आप अपने बेटे ताम्रध्वज का मांस इनके सामने रख सकते हैं।  परन्तु पुत्र को भोजन बनते  देख कर माता पिता की आंखों में आंसू नहीं आना चाहिए। 

इतना सुनकर पूरा दरबार आश्चर्यचकित हो गया। राजा को भी धक्का लगा। परन्तु राजा ने अपनी कीर्ति और कर्तव्य को ध्यान में रख कर राज दरबार में ही अपने बेटे को चीरकर सिंह राज के सामने रख दिया।

सिंहराज ने आगे बढ़कर ताम्रध्वज का दाया भाग खा लिया। तभी ताम्रध्वज की माता की बायीं आंख से आंसू टपक पड़े।

भगवान ने पूछा रानी की आँखों में आंसू क्यों? रानी ने कहा “सिंह राज ने मेरे पुत्र के दांये भाग को खा लिया पर बाएं भाग को नहीं खाया इसीलिए बायीं आँख से आँसूं निकल गए। 

तभी भगवान नें राजा मोरध्वज को अपने असली रूप का दर्शन कराया और कहा की आपके इस दानवीरता का फल मिल चूका है। 

राजा मोरध्वज ने देखा तो उनका बेटा जीवित खड़ा था। 

5. #महर्षि दधीचि की हड्डियों का वज्र 

एक बार इन्द्र लोक पर व्रतासुर नामक एक राक्षस ने कब्ज़ा कर लिया। उसने सभी देवताओं को देवलोक से बहार निकाल  दिया। इंद्र समेत सभी देव ब्रह्मा जी के पास गए। ब्रह्मा जी ने उन्हें एक उपाय बताया। कहा की व्रतासुर का वध केवल  वज्र से हो सकता है जो वज्र महर्षि दधीचि के अस्थियों से बना हो। 

इन्द्र ने एक बार महर्षि दधीचि का अपमान किया था। इस कारण उन्हें दधीचि के पास जाने में संकोच हो रहा था। 

इन्द्र महर्षि दधीचि से ब्रह्म ज्ञान लेना चाहते थे।  पर महर्षि दधीचि को इंद्र इस ज्ञान के लिए सुयोग्य नहीं लगे इसलिए महर्षि ने इंद्र को ब्रह्म ज्ञान देने से इंकार कर दिया। इंद्र को क्रोध आया और किसी को भी ये ज्ञान देने पर सर धड़ दे अलग करने की धमकी दी। पर महर्षि दधीचि ने कहा की कोई भी अगर सुयोग्य मिले तो मैं ये ज्ञान अवश्य दूंगा। 

बाद में अश्विनीकुमार महर्षि दधीचि के पास ब्रह्म विद्या लेने आये। दधीचि नें उन्हें ब्रह्म विद्या पाने के योग्य पाकर  विद्या दी। उन्होंने अश्विनीकुमारों को इन्द्र द्वारा कही गई बातें बताईं। तब अश्विनीकुमारों ने महर्षि दधीचि के अश्व का सिर लगाकर ब्रह्म विद्या प्राप्त कर ली। इन्द्र को जब यह जानकारी मिली तो वह पृथ्वी लोक में आये और अपनी घोषणा के अनुसार महर्षि दधीचि का सिर धड़ से अलग कर दिया। अश्विनीकुमारों ने महर्षि के असली सिर को फिर से लगा दिया। इन्द्र ने अश्विनीकुमारों को इन्द्रलोक से निकाल दिया। 

इसी कारण इन्द्र को महर्षि दधीचि के पास जाने में संकोच हो रहा था। परन्तु अंत में देवलोक की रक्षा के लिए अपने संकोच को त्याग कर इंद्र  दधीचि के पास पहुंच गए। 

महर्षि दधीचि को जब सारी बातें पता चली तो वो ख़ुशी ख़ुशी राजी हो गए।

उनकी हड्डियों वज्र जिस से व्रतासुर का वध हुआ। 

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