राजा दाहिर की कहानी – एक हीरो जिसे भुला दिया गया

राजा दाहिर, सिंध का एक ऐसा हिन्दू राजा जिसने 33 वर्षों तक युध्द लड़ते और उन्हें करारी शिकश्त देते हुए सिंध और पुरे हिंदुस्तान को मुस्लिम आक्रांताओं से बचाये रखा। अंत में कुछ बौद्ध गवर्नरों और कबीलों की गद्दारी की वजह से युद्ध मैदान में वीर गति को प्राप्त हुआ। उसके मरने के बाद ही सिंध पर अरब का कब्ज़ा हो सका और सिंध की विजय ने अरबों  के लिए हिंदुस्तान के दरवाजे खोल दिए। आगे का इतिहास हम सब को पता है किस तरह से हमारा देश अरबों और तुर्कों से लड़ता रहा। वीर पैदा होते रहे, साथ ही साथ गद्दार  भी पैदा होते रहे, वर्ना हम गुलाम  कैसे होते?

आज की पीढ़ी को  क्या पता है राजा दाहिर कौन हैं? क्या हमें हमारे इतिहास की पुस्तकों में राजा दाहिर के बारे में पढ़ाया जाता है? राजा दाहिर को हमने बिलकुल भुला दिया। उनकी जगह हम उनके बारे में पढ़ते हैं जिन्होंने हमारे देश को लुटा,  पढ़ते हैं बल्कि हमारे सिलेबस में  उनका महिमामंडन होता है। पता नहीं हमारी सरकारों की क्या  मज़बूरी है?  उनकी चाहे जो मज़बूरी हो, पर हमारा कर्तव्य बनता है की हम उनके बारे में पढ़ें और लोगों को पढ़ाएं। राजा दाहिर के बारे में  पूरी जानकारी के लिए पढ़ें। 

आज मैं उसी राजा दाहिर की कहानी (Raja Dahir ki kahani) सुनाने वाला हु। क्या  आपको पता है राजा दाहिर सेन कौन थे (Raja Dahir Sen Kaun The)? वो हैं राजा दाहिर (Raja Dahir a National Hero) जिनके बारे में हमें अपने इतिहास में कुछ भी नहीं पढ़ाया जाता है। एक ऐसा राजा जिसने तीन बार युद्ध में अरब को हराकर हिंदुस्तान को मुस्लिम आक्रांताओं  से बचाये रखा। पर जब कुछ लोगों की गद्दारी की वजह से उन्हें  हार का  सामना करना पड़ा और  वीर गति को प्राप्त हुए तब भी हमने उसको हीरो बना दिया जिसने उन्हें न सिर्फ धोखे से हराया बल्कि सिंध पर इतने अत्याचार किये की मानवता शर्मसार हो जाये।

अनुक्रम

  • राजा दाहिर की कहानी (Raja Dahir ki Kahani)
  • राजा दाहिर की बेटियाँ (Raja Dahir Daughter)
  • राजा दाहिर और इमाम हुसैन (Raja Dahir and Imam Hussain)

राजा दाहिर की कहानी (Raja Dahir ki Kahani)

भारत वर्ष में इस्लामी शाशन का प्रवेश 712 ईस्वी में राजा दाहिर की पराजय और राजा दाहिर की मृत्यु  के बाद सिंध के रस्ते हुआ। लगभग 33 वर्ष लड़ाइयां लड़ते लड़ते , बार बार अरबों को युद्ध में हराते हुए अन्तत: कुछ स्थानीय कबीलों और बौद्ध गवर्नरों की गद्दारी से युद्ध में राजा दाहिर वीर गति को प्राप्त हुए।

युद्ध क्षेत्र में जाते हुए राजा दाहिर ने कहा था “

“मै खुली लड़ाई में अरबों से लड़ने जा रहा हूँ और अपने पुरे सामर्थ्य के साथ लडूंगा। अगर मैं उन्हें कुचल देता हूँ तो मेरे साम्राज्य की नीव और मजबूत हो जाएगी लेकिन अगर मुझे सम्मान के साथ वीर गति प्राप्त हुई तो यह  अरब की किताबों में लिखा जायेगा। इसके बारे में महान से महान लोग बात करेंगे। दुनिया के अन्य राजा  इसके बारे में बात करेंगे।और कहा जायेगा कि सिंध के राजा दाहिर ने अपने देश के दुश्मन से लड़ते हुए अपनी अनमोल जिंदगी का बलिदान कर दिया। ” 

अफ़सोस की आज राजा दाहिर की महानता को याद नहीं किया जाता।
राजा दाहिर सिंध प्रान्त के आखिरी हिन्दू राजा थे जिनका जन्म 663 ईस्वी में सिंध  के अलोर में हुआ था। ये जगह आज रोहरी के नाम से जाना जाता है। इनके पिता का नाम चच तथा माता का नाम रानी सुहानदी था। चच की  मृत्यु के बाद 679 ईस्वी में महाराज दाहिर सेन सिंध के राजा बने। राजा दाहिर को शाशन सँभालने के साथ ही कई विरोधों का सामना करना पड़ा। उनके पिता द्वारा किये गए शासन से सिंधु देश के गुर्जर, जाट, लोहना और ब्राह्मण समाज नाराज था। इसके प्रमुख कारणों में  एक उनके पिता द्वारा बौद्ध धर्म को राज धर्म का दर्जा दिया जाना था। राजा दाहिर ने सबको साथ लेकर चलने का निश्चय किया और सिंध देश का राज धर्म सनातन हिन्दू वैदिक धर्म कर दिया।
दोस्तों क्या इस महान राजा के साथ ऐसा हुआ? नहीं। हमने राजा दाहिर के महान इतिहास (Raja Dahir Sen Great History) को भुला दिया। 

 राजा दाहिर के राज में सिंध देश बहुत संपन्न देश था। उसका व्यापर समुद्री रास्तों द्वारा पुरे  विश्व से था। सिंध का देवल बंदरगाह व्यापर का मुख्या केंद्र था। इराक ईरान से व्यापर इसी बंदरगाह से होता था। सिंध की सम्पन्नता और सिंध का भारत में प्रवेश करने का द्वार होना अरब देश को आकर्षित करता था। अरब अपने साम्राज्य का विस्तार कर रहे थे। उनलोगो ने ईरान, इराक, सीरिया, उत्तर अफ्रीका, स्पेन जैसे देशों को जीत लिया था। साथ ही साथ वो इस्लाम का प्रसार भी कर रहे थे। उनकी नजर भारत पर थी जिसके लिए लिए सिंध को जितना बहुत जरुरी था क्युकी सिंध ही भारत का प्रवेश द्वार था। सिंध पर कब्ज़ा किये बिना भारत जितने का और इतने बड़े देश में इस्लाम का प्रसार संभव नहीं था।

अरब का सिंध पर आक्रमण

तभी देवल बंदरगाह पर समुद्री लुटेरों ने अरब  के एक जहाज को लूट लिया। खलीफा उमर के अरब गवर्नर बसरा अल हज्जाज इब्न युसूफ (Basra Al Hajjaj Ibn Yusuf) ने मुआवजा माँगा जिसे राजा दाहिर ने ये कहकर इंकार कर दिया की समुद्री लुटेरों पर उनका नियंत्रण नहीं है। अरब खलीफा गुस्से से पागल हो गया। सिंध पर आक्रमण का सिलसिला चालू हो गया। पर राजा दाहिर के कुशल नेतृत्व और असाधारण युद्ध कौशल से हर बार अरब खलीफा की फ़ौज को हार का सामना करना पड़ा। 711 ईस्वी तक अरब फौजें राजा दाहिर को हरा नहीं पायी।

मोहम्मद बिन कासिम का सिंध पर आक्रमण 

712 ईस्वी में अरब शासक ने ये जिम्मेदारी मोहम्मद बिन कासिम (Mohammad Bin Qasim) को सौंपी। मोहम्मद  बिन कासिम ने सबसे पहले देवल बंदरगाह पर कब्ज़ा किया और लोगो का कत्लेआम करना शुरू किया। बच्चे, बूढ़े, जवान, औरतें किसी को नहीं बख्सा गया। पर राजा दाहिर सेन के रहते मोहम्मद बिन कासिम के लिए सिंधु नदी को पर करना असंभव था। इसलिए उसने हैदरपुर के बौद्ध राज्यपपाल मोक्षवास, देवल के राजा ज्ञान बुद्ध तथा जाट, गुर्जर और लोहना कबीलों को अपनी तरफ मिलाया। इसके बाद अरब सेना ने इरनकोट और राव नगर पर हमला करके जीत लिया। अंत में उसका मुकाबला राजा दाहिर  सेन से हुआ। कई दिनों तक लम्बे युद्ध चलने के बाद अरब सेना पराजय के कगार पर थी। 

युद्ध में पराजय निश्चित देखकर अरब सैनिकों ने सो रहे सिंध के सैनिकों पर धोखे से  हमला कर दिया। युद्ध कई दिनों तक चला। इस बार  भी अरब सेना को परास्त होना पड़ा।

राजा दाहिर की युद्ध भूमि में वीर गति  

बार बार पराजय से तंग आकर मोहम्मद बिन कासिम ने एक धोखे की साजिश रची। अपने कुछ सैनिकों को हिन्दू औरतों के वेश में राजा दाहिर में भेजा। वो औरतें (सैनिक) रोती बिलखती राजा दाहिर से मुस्लिम सैनिकों  उन्हें बचाने की गुहार लगाई। राजा दाहिर ने इन महिलाओं को सुरक्षित स्थान पर भेजने के बाद उस स्थान की ओर बढ़ गए जहा से उनकी रोने की आवाज आ रही थी। युध्द भूमि में वो अकेले पद गए जहाँ उनके हाथी पर बाण चलाये गए। जिस से वो खाई में गिर गया। राजा दाहिर अकेले बहुत वीरता से लड़े पर अंत में वीर गति को प्राप्त हुए। वो अपने मातृभूमि की रक्षा करते सदा के लिए मातृभूमि की गोद में सो गए। इधर औरतों के वेश महल में घुसे सैनिक अपने असली रूप में आ गए और कत्लेआम मचाना  शुरू किया। 

मोहम्मद बिन कासिम ने अंत में राजा दाहिर के सर काटकर खलीफा को भेट किया।  

राजा दाहिर की बेटियाँ (Raja Dahir Daughters)

राजा दाहिर की मृत्यु के बाद मोहम्मद बिन कासिम की सेना सिंध की और बढ़ी और राजमहल में घुसने का प्रयास किया। यहाँ भी  उनका स्वागत रानी लाडो और राजकुमारी सूर्य और परमाल के साथ महल के बाकि औरतों ने तीरों और भालों से किया। अरब सेना के लिए औरतों का युद्ध कौशल नया अनुभव था। अरब बहुत प्रयास करके भी  महल में घुस नहीं पाए। पर रानी को मोक्षवास के गद्दारी की भनक नहीं थी। इसी का फायदा उठाकर मोक्षवास महल में घुस गया तथा रात में चोरी से महल का दरवाजा खोल दिया जिस से अरब सैनिक महल में प्रवेश कर गए। रानी और बाकि औरतों ने जौहर की अग्नि में अपनी जान दे दी।

पर राजा की दो बेटियां पीछे रह गयी। उन्हे बंदी बना लिया गया। मोहम्मद बिन कासिम ने सोचा की इन राजकुमारियों को खलीफा को भेंट किया जाये। (इसी से बचने के लिए बाकि औरतों ने जौहर  कुंड में जान दी थी।) दोनों राजकुमारियों सूर्य और परमाल के ह्रदय में प्रतिशोध  की ज्वाला धधक रही थी।  उन्हें एक अवसर की तलाश थी। अब उन्हें अवसर मिला। राजकुमारियों को खलीफा के सामने पेश किया गया।  उनके रूप सौंदर्य को देखकर  खलीफा की ऑंखें चौंधिया गयी। ऐसी सुंदरता उसने पहले कभी नहीं देखी थी।

मोहम्मद बिन कासिम की मौत (Daith of Mohammad Bin Kasim)

जैसे ही उसने राजकुमारी को हाथ लगाया, राजकुमारी अचानक से पीछे हट गयी। रोते हुए बोली “महाराज हम आपके लायक नहीं है। आपके पास भेजने से पहले मोहम्मद बिन कासिम ने हमें तीन दिनों तक अपने साथ रखा। ” इस बात से खलीफा की ऑंखें गुस्से से लाल हो गयी। आँखों से अंगारे बरसने लगे। उसने तुरंत कासिम को बोरी में सिलकर लाने का हुक्म दिया। रास्ते में मोहम्मद बिन कासिम की दम  घुटने से मौत हो गयी। उसके बाद दोनों वीरांगनाओं ने भी “जय सिंध और जय दाहिर (Jai Sindh and Jai Dahir) कहते हुए अपनी जान दे दी। उनका प्रतिशोध पूरा हो चूका था। 

जौहर (Jauhar) – जब कोई मुस्लिम आक्रांता किसी हिन्दू राज्य पर आक्रमण करता था और जीत लेता था तो औरतें अपनी इज्जत बचाने और मुस्लिम सैनिकों के हाथ न आने पाए इसलिए अग्नि कुंड में कूद कर जान दे देती थी। 

राजा दाहिर और इमाम हुसैन (Raja Dahir and Imam Hussain)

राजा दाहिर का इस्लाम पर भी बहुत बड़ा उपकार रहा है। पैगम्बर मोहम्मद की मौत के बाद अरब कबीलों में खलीफा बनने की लड़ाई शुरू हो गयी। पैगम्बर मोहम्मद के खानदान के लोगों के खून के प्यासे  गए थे जिन्हें किसी भी कीमत पर इस्लाम का झंडाबरदार बनना था, पैगम्बर का उत्तराधिकारी बनना था। खलीफा  अल हज्जाज इब्न युसूफ ने पैगम्बर मोहम्मद के वंशजों को ढूंढ कर मारने  चलाई थी जिसमे उसने इमाम हुसैन (Imam Hussain) को मार भी दिया था। पर राजा दाहिर ने हुसैन एबीएन अली को शरण दी थी और उनकी रक्षा की थी जो पैगम्बर मोहम्मद के  वंशज थे। जिन्हे बाद में  पकड़ कर मौत के घाट उतर दिया गया था। 

उम्मीद है दोस्तों आपको Raja Dahir a National Hero की कहानी अच्छी लगी होगी। हमारे देश ने उन्हें भुला दिया है पर हमारा ये कर्त्तव्य है कि हम  रखे। अपने दिल में रखें  प्रेरणा ले। 

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