विजय दिवस कब और क्यों मनाया जाता है ?

तू शहीद हुआ 

तो न जाने  कैसे तेरी माँ सोई होगी। 

एक बात तय है 

तुझे लगने वाली गोली सौ बार रोई होगी। 

शत शत नमन कारगिल , एक अटल विजय 

श्री अटल बिहारी वाजपेयी, पूर्व प्रधानमंत्री 

आज 26 जुलाई का वो गौरव पूर्ण दिन है जिस दिन हमारी भारतीय सेना ने कारगिल की पहाड़ियों से पाकिस्तानी सैनिकों और घुसपैठियों को बुरी तरह से हराकर भगाया था। हमारी सेना के पास काम संसाधनों और बुरी परिस्थितियाँ थी, उसके बावजूद हमारी सेना के अदम्य सहस और पराक्रम के आगे पाकिस्तानी फ़ौज और पाकिस्तानी आतंकवादी टिक नहीं पाए। उन्हें दुम दबाकर भागना पड़ा।

तभी कहा जाता है

योद्धा पैदा नहीं होते,

वो भारतीय सेना में बनते हैं। 

और उसी उपलक्ष्य में हम प्रति वर्ष 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस के रूप में मनाते हैं और उस दिन  वीर सैनिकों को नाम आँखों से याद करते हैं तथा उनकी महान शहादत को नमन करते हैं।

है नमन उनको की जिनके सामने बौना हिमालय

महान कवि कुमार विश्वास

कारगिल युध्द की शुरुआत 

कारगिल युद्ध की पृष्ठभूमि तभी बनने लगी थी फरवरी 1999 में जब प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी लाहौर बस यात्रा पर गए और जब भारत और पाकिस्तान के बीच लाहौर एग्रीमेंट हुआ जिसमे कुछ बातों पर दोनों देशों में सहमति बनी थी जैसे

परमाणु हथियारों के इस्तेमाल से दोनों देश दूर रहेंगे।

किसी भी तरह के संघर्ष से दूर रहेंगे।

सभी विवादों का निपटारा शांतिपूर्ण तरीके से होगा।

पर ऐसा हुआ नहीं।

अब आपके दिमाग में ये प्रश्न भी आ रहा होगा की कारगिल के भारतीय चौकियों पर पाकिस्तानी फ़ौज का कब्ज़ा कैसे हो गया ? हमारी सेना क्या कर रही थी ?

तो आपका ये जानना बेहद जरुरी है कि भारत और पाकिस्तान सीमा पर कुछ पोस्ट बहुत उचाई पर हैं जहा से नवंबर दिसंबर में सर्दियों में बर्फ गिरने लगती है तो दोनों देशों की सेनाएं पीछे हट जाती हैं  गर्मी आती है मई महीने में तो फौजें वापस अपने पोस्ट पर जाती हैं। पर 1999 के फ़रवरी और मई के बिच में जब भारतीय सेना अपने पोस्ट पर नहीं थी तब पाकिस्तानी फ़ौज ने उन पोस्ट्स कर कब्ज़ा कर लिया। जब गरखुन गाँव का एक चरवाहा ताशी नामग्याल अपनी भेड़े और एक चरा रहा था तब उसकी एक एक खो गयी। एक को खोजने के लिए ताशी नामग्याल पहाड़ी पर ऊपर गया तो उसने कुछ लोगों को हथियारों के साथ पहाड़ी पर चढ़ते देखा जो उसे अजीब लगा।  उसने इसकी सुचना भारतीय सेना को दी तब भारतीय फ़ौज की एक टुकड़ी को पेट्रोलिंग के लिए भेजा गया। और ये घुसपैठ को सच पाया गया।

पाकिस्तानी फ़ौज का भारतीय चौकियों पर कब्ज़ा करने का मुख्य उद्देश्य कश्मीर का लेह लद्दाख से संपर्क को तोडना था क्योंकि वो चौकियाँ ऊंचाई पर थी जिस से श्री नगर को लेह से जोड़ने वाली सड़क राष्ट्रीय राजमार्ग 1 D (NH1D) पर नजर रखना आसान था। ये राजमार्ग भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण था। अगर इसपर पाकिस्तान का कब्ज़ा होने का मतलब था कश्मीर का लेह लद्दाख से संपर्क टूटना। और भारतीय चौकियाँ जिस पर पाकिस्तानी फ़ौज ने घुसपैठ करके कब्ज़ा कर लिया था इस राजमार्ग पर नजर रखे हुए थे।

इस राजमार्ग के महत्व का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं की इसी राजमार्ग से सियाचिन पर सेना का मूवमेंट होता था। इस राजमार्ग भारत के हाथ से निकलने का मतलब था भारत का लेह लद्दाख और सियाचिन से हाथ धोना।

 

फिर भारतीय सेना ने ऑपरेशन स्टार्ट किया जिसे नाम दिया गया

थल सेना – ऑपरेशन विजय

वायु सेना – ऑपरेशन सफ़ेद सागर।

 

26 जुलाई को विजय के रूप में क्यों मनाते हैं ?

करीब दो महीने तक चली इस युद्ध का समापन 26 जुलाई 1999 को हुआ। इसीलिए प्रति वर्ष 26  विजय दिवस के रूप में मनाते हैं।

कारगिल युद्ध घटना चक्र

2 मई 1999 – ताशी  नामग्याल नामक चरवाहे ने भारतीय सेना को घुसपैठ की जानकारी दी।

5 मई 1999 – एक भारतीय सैनिक टुकड़ी पेट्रोलिंग के लिए गयी जिसमे 5  वीरगति को प्राप्त हुए।

10 मई 1999  – द्रास, काकसर और मुश्कोह  सेक्टर में पाकिस्तानी घुसपैठियों को देखा गया।

26  मई 1999 – भारतीय वायुसेना ने ऑपरेशन सफ़ेद सागर की शुरुआत की।

26 जुलाई 1999 – कारगिल युद्ध समाप्त हुआ और ऑपरेशन विजय  सफल हुआ।

सैनिकों का बलिदान नहीं भूलेगा हिंदुस्तान

कारगिल युद्ध के घटनाक्रम को देखकर लगता है की कारगिल विजय बहुत आसान था पर इसके पीछे की कहानी हमारे सैनिकों के अदम्य साहस, देशभक्ति और ओज से पूर्ण तथा उनके बलिदानों की कहानी है। इस युद्ध में 500  से ज्यादा भारतीय वीर गति को प्राप्त हुए तथा 1500  के करीब घायल हुए।

हमारे वीर सैनिकों का बलिदान व्यर्थ नहीं गया और हमारा देश कारगिल युद्ध जीत गया।  ऑपरेशन विजय को सफल बनाने में हमारे हर एक सैनिक का योगदान था। उन्हें सम्मान भी मिला जो की हमारा कर्त्तव्य था। कुछ असाधारण वीरता दिखाने वाले जवानों को बड़े बड़े सैन्य पुरष्कारों द्वारा सम्मानित किया गया। किसी को मरणोपरांत तो किसी को जीवित अवस्था में।

इनमें से प्रमुख नाम हैं।

1 . लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडेय –           परमवीर चक्र (मरणोपरांत)

2 . कैप्टेन विक्रम बत्रा –              परमवीर चक्र (मरणोपरांत)

कैप्टेन विक्रम बत्रा का एक कोट बहुत प्रचलित हुआ था ” ये दिल माँगे मोर ” जो बाद में पेप्सी का  स्लोगन भी बना।

3 . ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव –              परमवीर चक्र

4 . राइफल मैन संजय कुमार –                    परमवीर चक्र

ऐसे और भी बहुत सैनिक थे जिन्हे महावीर चक्र, वीर चक्र आदि पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।

 

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